श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 771 of 811
Read in context७५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १८
दास्यामि दर्शनं तेऽहं द्वापरे कृष्णरूपधृक् । तत्सत्यं वचनं चाद्य कृतं त्वत्सेतुहेतुतः ॥३८॥
इत्यर्जुनं कपिर्यद्वदत्यीक्षात्तदग्रतः ।
बटुर्देवाभवत्कृष्णः पीतवासा घनप्रभः ॥३९॥
तद्दर्शनोर्ध्वरोमाऽभूत्प्रणनामाञ्जनीसुतः ।
आलिङ्गितोऽपि कृष्णेन स मेने कृतकृत्यताम् ॥४०॥
चक्रं ययौ यथास्थानं श्रीकृष्णस्याज्ञया तदा । सागरेण स्वकल्लोलैः शरसेतुर्विलोपितः ॥४१॥
तदार्जुनो गर्वहीनो मेने कृष्णेन जीवितः ।
कृष्णस्तदाऽर्जुनं प्राह त्वया रामेण स्पर्द्धितम् ॥४२॥
हनूमता धनुर्विद्या तवातोऽत्र मृषा कृता ।
यत्प्रतापादिति शिरा न्न्याऽपि वायुनन्दनः । ४३।
रामेण स्पर्द्धितं यस्मात्तस्मादर्जुन संजितः । अतः परं वीतगर्वस्त्वं मां भज निरन्तरम् ॥४४॥
इत्युक्त्वा मारुतिं पृष्ट्वाऽर्जुनेन तत्पुरं ययौ ।
अतः कपिध्वजश्चेति जनैरर्जुन ईर्यते ॥४५॥
इति भाविकथा पृष्टा त्वया साऽपि मयोदिता ।
किमग्रे श्रोतुकामोऽसि संपृच्छस्व वदामि ते ॥४६॥
विष्णुदास उवाच
गुरोऽधुना राघवस्य वैकुण्ठारोहणोत्सवम् ।
मां वदस्व सविस्तारं येनाहं तोषमाप्नुयाम् ॥४७॥
श्रीरामदास उवाच
पूर्णकांडं त्वावाद्याहं वदिष्यामि शृणुष्व तत् ।
सहायताके लिए ही यहाँ आये हैं। यही रूप धारण करके त्रेतामें रामने हमें वरदान दिया था कि द्वापरके अन्तमें मैं तुम्हें कृष्णरूपसे दर्शन दूंगा। आपके सेतुके बहाने इन्होंने अपना वरदान भी आज पूरा कर दिया ॥३७॥ ३८। हनुमानजी अर्जुनसे ऐसा कह ही रहे थे कि इतनेमें भगवान् अपने बटुरूपको त्यागकर कृष्ण बन गये। उस समय वे पीले वस्त्र पहने थे और नवनीरदके समान उनका श्याम शरीर था। उस कृष्णचन्द्रजीका दर्शन करते ही हनुमान्जीके रोंगटे खड़े हो गये और उन्होंने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। जब श्रीकृष्णने हनुमान्जीको उठाकर अपने हृदयसे लगाया, तब हनुमान्जीने अपनेको कृतकृत्य मान लिया ॥३९॥४०॥ श्रीकृष्णके आज्ञानुसार चक्र सेतुसे निकलकर अपने स्थानको चला गया और अर्जुनका बनाया सेतु भी समुद्रकी तरंगोंमें लुप्त हो गया ॥४१॥ इस तरह अर्जुनका गर्व नष्ट हो गया और उन्होंने समझा कि कृष्णने हमें जीवित रख लिया। कुछ देर बाद श्रीकृष्णजीने अर्जुनसे कहा कि तुमने रामके साथ स्पर्धा की थी। इसलिए हनुमान्जीने तुम्हारी धनुर्विद्याको व्यर्थ कर दिया था! इसी प्रकार हे पवनसुत! तुमने भी रामसे स्पर्धा की थी। इसी कारण तुम अर्जुनसे परास्त हुए। तुम्हारा गर्व नष्ट हो गया। अब भ्रातृत्वके साथ मेरा भजन करो। ऐसा कह और हनुमान्जीसे पूछकर श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ हस्तिनापुर चले गये। हे शिष्य, इसी कारण अर्जुन कपिध्वज कहे जाते हैं ॥४२-४५॥ यद्यपि तुमने हमसे यह भविष्यकी कथा पूछी थी, फिर भी मैंने कह सुनाया। अब आगे क्या सुनना चाहते हो सो बताओ। मैं तुमको सुनाऊँ ॥४६॥ विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! अब मैं रामचन्द्रजीके वैकुण्ठारोहणका वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ। सो आप विस्तारपूर्वक हमें बताइए, जिससे हमारे हृदयको सन्तोष हो। श्रीरामदासने कहा—माने मैं तुमसे पूर्णकांड कहनेवाला हूँ। उसमें भगवानके वैकुण्ठारोहणका वृत्तांत तुम्हे अच्छी तरह सुननेको मिलेगा ॥४७॥