श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 759 of 811
Read in context७४२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १६
पञ्चामृतैस्तु संस्नाप्य रुद्रांश्याः परिकल्पयेत् । ततस्तु कुसुमैः पूजा शतपत्रादिभिः शुभैः ॥४९॥
चन्दनं च सकर्पूरं रुद्रेभ्यो लेपनं वरम् । दशांगधूपमाद्यञ्च दीपनीराजयैत्ततः ॥५०॥
नैवेद्यं विविधं दद्यात्ताम्बूलैर्नैव संयुतम् । एकादश पताकास्तु पटैः सुपरिकल्पयेत् ॥५१॥
या या यस्मै समुद्दिष्टा पताका च सुशोभना । तस्य तस्यैव रूपं तु तस्यामेव प्रकल्पयेत् ॥५२॥
एवं कृते विधाने च सुपताकासुशोभनैः । प्रातःकाले तु राजेन्द्र जागरंवि द्विजोत्तमः ॥५३॥
कृतस्नानो नदीतोये होमं कुर्यात्समाहितः । पयसेन तु साज्येन तथैव तिलसर्पिषा ॥५४॥
अयुतं हवनं कृत्वा पुनः पूजां प्रकल्पयन् । पताका हनुमद्द्वारे तस्यैव च निधापयेत् ॥५५॥
राजद्वारे तु संप्रोक्तौ गोपेन्द्रोपापणे न्यसेत् । नलनोलस्तथा के च शिवद्वारे तु विन्यसेत् ॥५६॥
तारस्य सत्वराद्यादि मैन्दस्य त्रातडस्य च । ग्रामद्वाह्येषुदिक्षु मार्गेषु स्थापयेद्बुधः ॥५७॥
जलस्थाने जाम्बवतो दधिवक्त्रो चतुष्पथे । श्वपचन्वरगां दिव्यां महावाद्यादिमंगलीः ॥५८॥
द्वारदेशे जनानां च रुद्रमूर्त्तिं विलेपयेत् विचित्रौ पश्चरंगैश्च ग्राममूर्तेश्च वेष्टयेत् ॥५९॥
प्रत्यहं कारयेद्विद्वान् भक्त्या ब्राह्मणभोजनम् । द्विजेभ्य स्त्रिऋत्विग्भ्यो मालकाराणि भूरिशः ॥६०॥
छत्राणि कारयेच्च पादुकाश्च त्रिदोषनः । धेनुं पयस्विनीं दद्यादाचार्याय सवत्सकाम् ॥६१॥
सदक्षिणां सुवस्त्रां च मालकार्या गुणान्विताम् । द्विजाय महिषीं दद्यात्तथैव पृथगीरने ॥६२॥
अन्येभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च मन्न धान्यानि भूरिशः । लवणं मधुरं देयं तैलं च सगुडं तथा ॥६३॥
शय्यादानानि भूरिणि छत्राणि विविधानि च । एतत्कृत्वा विधानं च राजा क्षेममवाप्नुयात् ॥६४॥
रुद्र एवात्र निर्दिष्टो जपः सर्वैः सुखप्रदः । अथवा द्वान शाम्नं मानवशोक इति स्फुटम् ॥६५॥
इति हनुमत्पताकाभिधानं व्रतम् ।
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे
हनुमत्पताकापन्न नाम षोडश सर्गः ॥ १६ ॥
वानरोंको स्थापित करे ॥ ४८ । तदनन्तर उन रुद्रांका पञ्चामृतसे स्नान कराय और शतपत्र आदिके फूलोंसे विधिवत् पूजन करे। कपूर मिले हुए चन्दनका लेप, दशाङ्ग धूपका आघ्राण और नीराजन करे। फिर ताम्बूलके साथ विविध प्रकारके नैवेद्य समर्पित करे और सूक्ष्म वस्त्रसे ग्यारह पताका बनवावे। जो पताका जिस रुद्रके लिए निर्धारित की गयी हो, उसम उसका चित्र बनवावे ॥ ४९–५२ ॥ ये विधियाँ करनेके अनन्तर सुन्दर पताका आदि समर्पित करे। वह ब्राह्मण सवेरे उठे और नदीके जलमें स्नान करके सावध- नतापूर्वक तिल और घी मिले खीरसे अग्निहोत्रमें दस हजार आहुतियाँ दे। इसके बाद फिर उन सबकी पूजा करे। हनुमान्जीके द्वारपर हनुमान्जी की पताका नरेन्द्र या सुग्रीवकी पताका, आपण (बाजार) में शुषेणकी और शिवद्वारपर नल-नीलकी पताका स्थापित करे। ५३–५६॥ तार, तरस, मैन्द और अङ्गदकी पताकाओंको ग्रामके बाहर चारों दिशाओंमें स्थापित करे ।५७। जलस्थानपर जाम्बवान् और चौराहेपर दधिवक्त्रकी पताकाको विविध वाद्यों की ध्वनिके साथ स्थापित करे। मनुष्योंके द्वारदेशपर पाँच रंगोंसे चित्रित रुद्रमूर्ति बनाये और ग्राममूसाम उसे परिवेष्टित करे । ५८ ॥ ५९ ॥ समझदार लोगोंको चाहिए कि प्रतिदिन ब्राह्मणोंको अच्छी तरह भोजन करावें और ऋत्विजोंको विविध आभूषण और वस्त्र दान दे ॥ ६० ॥ छत्र, पादुका तथा दूध देनेवाली सवत्सा गो आचार्यको दे। उस गौके साथ पर्याप्त दक्षिणा, अलंकार, वस्त्र आदि भी दे। उस यज्ञमें जो ब्राह्मण ब्रह्मा बना हो, उसे एक भैंसका दान दे ॥ ६१ । ६२ । इसके अतिरिक्त और जितने ब्राह्मण हों, उन्हें भी शय्यादान और छत्र आदि दे। जो राजा इस विधानसे रुद्रयज्ञ करता है, उसका सब प्रकारसे कल्याण होता है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ इस विधानमें रुद्रमन्त्र अथवा "मानस्तोके" यह मन्त्र जपना लाभकारी होता है । ६५ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेज-पाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥