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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 75 of 811

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Page 75

सर्गः ६] सारकाण्डम् ५९

सुमन्त्रोऽपि पुरीं गत्वा नृपं वृत्तं न्यवेदयत् । सोऽपि राजा राघवेति जपन्स्वं जीवितं जहा ॥९१॥
नृपं मृतं गुरुर्ज्ञात्वा तैलद्रोण्यां विधाय तम् । युधाजित्नगराद्दूतैः कैकेय्यास्तनयावुभौ ॥९२॥
आनयामास भरतशत्रुघ्नौ वेगवत्तरैः । तावुभावपि वेगेन स्वां पुरीं प्रविवेशतुः ॥९३॥
मात्रा यदादितं श्रुत्वा विस्मयं परमं ययतुः । मत्वा पितरं वह्निं ददौ सन्नृपभक्तये ॥९४॥
त्रीण्येव मात्रस्ताश्च नग्मुर्न स्वामिना दिवम् । पितुरूर्ध्वकार्यादि कर्म कृत्वा सविस्तरम् ॥९५॥
मंथरां ताडयामास मातुरग्रे पुनः पुनः । प्रार्थितोऽप्यभिषेकार्थं राज्यमंगीचकार न ॥९६॥
ततो मंत्रिजनैः साकं मातृभिः पुरवासिभिः । परावर्तयितुं रामं ययौ स भरतस्तदा ॥९७॥
गुहेन मानितश्चापि भारद्वाजाश्रमं ययौ । तपोबलेन भूस्र्वर्गं निर्माय मग्न मुनिः ॥९८॥
ससैन्यं पूजयामास तं नत्वा भरतोऽपि यः । मुनिप्रदर्शितनपथा चित्रकूटव्रजं ययौ ॥९९॥
दृष्ट्वा रामं तु शालास्थं सीतया लक्ष्मणेन स्थितम् । नत्वा तेन लिंगितश्च सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥१००॥
रामः श्रुत्वा मृतं तातं गत्वा मंदाकिनीं नदीम् । स्नात्वा तिलांजलिं दत्त्वा ययौ शालां निजाग्रणीं १०१॥
ततस्तं प्रार्थयामास भ्रातो गुरुणा सह राज्यं राघवश्चापि नेत्युवाच पुनः पुनः । १०२॥
प्रायोपवेशनं तत्र दर्भेषु भरतस्तदा । चकार निग्रहं तस्य ज्ञात्वा गुरुमचोदयत् ॥१०३॥
रामाज्ञया गुरुश्चाह भरतं राघवेत्तरा । भूभारहरणार्थाय विष्णुः साक्षादुपङ्गतः ॥१०४॥
अत्र जाताऽस्ति देवानां वचनाद्रावणादिकान् । हंतुं गच्छति रामोऽद्य मा त्वं निग्रहमाचर ॥१०५॥
तेनो ज्ञात्वा हरिं रामं भरतो राममब्रवीत् । राज्यार्थं पादुके देहि तयोः सेवां करोम्यहम् ॥१०६॥
जटावल्कलधारी च वसामि नगराद्बहिः । शताब्दां तव राजेंद्र वर्षाणि च चतुर्दश ॥१०७॥


...ध्याय करन लग = ॥९०॥ उधर सुमन्त्रने अवधपुरमें जाकर राजा दशरथका सब वृत्तान्त सुनाया। राजाने भी 'हा राघव हा राघव' करते-करते प्राण छोड़ दिये ॥ ९१ ॥ तब गुरु वसिष्ठने मृत राजाके शरीरको तेलके नादमें रखवा दिया और युधाजित्‌के नगरमें दूतके द्वारा दोनों पुत्र भरत शत्रुघ्नको दूतोंके द्वारा तुरन्त बुलवाया। वे दोनों भाई अपने नगरमें आये तथ माताके मुंहसे सब सुनकर उन विस्मयमन लगे। भरतने पिताके शरीरका सरयू नदीके बांधपर अग्निसंस्कार किया । ९२-९४ । और सुमित्रादि माताएं स्वामीके साथ स्वर्गलोकको नहीं गयीं। भरतने पिताकी उत्तरक्रिया विस्तार सहित की ॥ ९५ । तदनन्तर भरत शत्रुघ्नने माताके सामने मंथराको बारम्बार पीटा और माताके बहुत कहनेपर भी भरतने राज्य नहीं स्वीकार किया ॥ ९६ ॥ अनन्तर वे मन्त्रियों, माताओं तथा पुरवापि के साथ रामको लौटा लानेके हेतु वनको गये ॥ ९७ । रास्तेमें भरत निषादराज द्वारा सम्मानित होकर भारद्वाजके आश्रमपर पधारे । मुनिने अपने तपोबलसे पृथिवीपर स्वर्गकी रचना करके सेना सहित भरतका सत्कार किया । तदनन्तर भरत उनको प्रणाम करके उनके बतलाये हुए रास्तेसे चित्रकूटमें अपने बड़े भाई रामके पास गये ॥ ९८ ॥ ९९ । पर्णशालामें सीता तथा लक्ष्मण सहित रामको देखकर भरतने उन्हें प्रणाम किया तदनन्तर रामसे आलिङ्गित होकर उन्होंने सब वृत्तान्त उन्हें कह सुनाया ॥१००॥ पिताकी मृत्यु सुनकर राम मन्दाकिनी नदीपर गये। वहाँ स्नान करके तिलाञ्जलि दी और भरतपर कृपिन अपनी पर्णशालामें लौट आये १०१॥ गुरु वशिष्ठको साथ लेकर भरतने रामसे राज्य स्वीकार करनेके लिये बारम्बार प्रार्थना की। तिसपर भी राम उसका बार-बार अस्वीकार ही करत गये ॥१०२॥ तब भरत कुशके आसनपर बैठकर अनशन (उपवास) करने लगे। उनकी दृढता तथा असङ्कोच देखकर रामने गुरु वसिष्ठसे भरतको समझानेके लिय कहा ॥ १०३॥ रामकी आज्ञासे गुरुने भरतको समझाते हुए कहा कि ये विष्णुभगवान् भूतलपर राम भूभार हरण करनेके लिये इस पृथ्वीपर अवतरे हैं। ये देवताओंके अनुरोधसे रावण आदिको मारने जा रहे हैं। इस कारण तुम हठ मत करो । १०४ । १०५ ॥ तब भरत रामको साक्षात् ईश्वर जानकर उनसे बोले-हे राम! राजकार्य करनेके लिए आप अपनी खड़ाऊँ दे दें। जटावल्कलधारी मैं उनकी नित्य सेवा पूजा करता हुआ शहरके बाहर रहूँगा । परन्तु हे राजेन्द्र ! यदि आप