श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in context| ७२४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १४ |
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अकृतान्यत्र तस्माद्धि कर्तव्यं यत्नतस्त्विदम् । कृत्वा रमानामतभद्रं या पूजा मानवर्भुवि ॥९२॥
सा देव्यै तोषदा ज्ञेया तस्मान्कार्या प्रयत्नतः । पूर्वोक्तानि दैवतानि तान्येवात्र विचिन्तयेत् ॥९३॥
आवाहयेच्च मुद्रार्यां जानकीं रघुनन्दनम् । अन्यच्चशृणुष्व भो शिष्य सीतारामप्रपूजने ॥९४॥
रमानामतौभद्रं च कार्यं वा मानवर्भुवि । तच्चापि पूर्ववत्सर्वं कर्तव्यं मानवैर्धिया ॥९५॥
इदं सीतारामयोश्च पूजनाथं प्रकल्पयेत् रामनाम्ना रमानाम्ना इदं भद्रं महच्छुभम् ।९६॥
यत्र द्वयोर्नामनी च रमा रामेति चोभभे । रमागभतो भद्रं च तस्माच्छ्रेष्ठं प्रकल्पयेत् । ९७ ।
रामभद्रोक्तान्त्येव दैवतान्यत्र विनितेयेत् एवं शिष्य त्वया पृष्ट यद्यत्तसन्मयोदितम् । ९८॥
का तेऽन्यास्ति स्पृहा श्रोतुं वद तां तद्वदाम्यहम् ।
विष्णुदास उवाच
कवचं लक्ष्मणस्यापि पठनीयमिति स्मृतम् ॥९९ ।
पुरा गुरो त्वया तच्च मां वदश्व मविस्तरात् । भरतस्यापि कवचं शत्रुघ्नस्य तथा वद ॥१००॥
श्रीरामदास उवाच
एवमेव सुतीक्ष्णेन पृष्टं च कुंभजन्मना । पुरा तद्विस्तरेणाद्य तवाग्रे कथयाम्यहम् ॥१०१॥
सुतीक्ष्ण उवाच
गुरो त्वया पुरा प्रोक्तं कवचं लक्ष्मणस्य च । पठनीयं जनैश्चेति तन्मामद्य प्रकाशय ॥१०२।
भरतस्यापि कवचं शत्रुघ्नस्य तथा वद ।
अगस्तिरुवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः शृणु । आदौ सौमित्रिकवचं कथ्यतेऽद्य मया शुभम् ॥१०३।
इति श्रीशतकोटिकामचरितांतर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे
सीतारामकवचादिनिरूपणं नाम चतुर्दश सर्गः ॥ १४ ॥
की रचना करें ॥ ९०॥ बिना रमानामतभद्रक दैवपूजन आदि जितना भी कृत्य किया जाता है, वह सब व्यर्थ हो जाया करता है। अतएव रमानामतभद्रकी स्थापना अवश्य करनी चाहिये। रमानामताभद्रमें लग जो पूजन आदि करते हैं, वह सफल होता है ॥९१॥९२। इससे देवी प्रसन्न होती हैं। इस कारण यत्नपूर्वक ऐसा करना चाहिए। पूर्वम जितने देवता कह आये हैं, वे सब इस भद्रमे भी रहेंगे ॥९३॥ हाँ, यह बात अवश्य है कि इस भद्रमे राम और सीताका आवाहन करे। हे शिष्य ! सीतारामके पूजनके विषयम और भी कुछ विशेष बातें हैं। उन्ह कहता हूँ सुनो ॥ ९४ । कोई भी पूजन करते समय रमानामतभद्रकी स्थापना अवश्य करे। उस भद्रमे पूर्वोक्त रीति के अनुसार ही सब बातें रहेंगी ॥९५॥ सीता और रामकी पूजाके निमित्त इसको स्थापना की जाती है और केवल रामतातोभद्र अथवा केवल रामतोभद्रसे यह भद्र श्रेष्ठ है ॥ ९६॥ इस भद्रमें रमा और राम इन दोनोंके नाम आ जाते हैं इसीलिए यह भद्र सर्वश्रेष्ठ माना गया है ॥ ९७ ॥ रामतोभद्रमें कहे हुए ही देवता इस भद्रमें रहेंगे इस तरह हे शिष्य ! तुमने हमसे जो पूछा, वह मैने तुमसे कहा ॥ ९८ । अब क्या सुननेका इच्छा है सो बताओ, मै कहूँ। विष्णुदास बोले-आपने कहा था कि लक्ष्मणके कवचका भी पाठ करना चाहिए। सो उसे भी बताइए ॥९६.११००' श्रीरामदासने कहा कि इस तरह सुतीक्ष्णने भी अगस्त्यजीसे प्रश्न किया था तो उन्होंने सुतीक्ष्णसे जो कुछ कहा था, यहा मै तुमसे कह रहा हूँ ॥ १०१ ॥ सुतीक्ष्णने कहा हे गुरो ! आपने एक बार हमसे कहा था कि लोगोंको लक्ष्मणकवचका भी पाठ करना चाहिए सो कृपा करके आप हमें लक्ष्मणकवच बताइए। उसके साथ साथ भरत तथा शत्रुघ्नकवच भी बतला दीजिए। अगस्त्यने कहा-हे वत्स ! तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है। सावधान होकर सुनो। पहले मै लक्ष्मणकवचका ही वर्णन कर रहा हूँ ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे चतुर्दशः सर्गः । १४ ॥