श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 720 of 811
Read in contextसर्गः १२] मनोहरकाण्डम् ७०३
तर्हि तत्र विचित्रान्नैरैस्तृप्तिं प्राप्स्यसि वै क्षणात् । तत्तस्या वचनं श्रुत्वा शबरीं प्राह राघवः ॥१२॥
अहमत्रैव तिष्ठामि प्रतीक्षार्थं कुशस्य च । तापस्य स्तरणादीनां संत्वरस्व वनवासिनि ॥१३॥
गच्छ त्वमेव तां दुर्गां स्त्रीभ्यं वृत्तं निवेदय । तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा त्वरान्विता ॥१४॥
स्त्रीर्गत्वा शबरी प्राह शृणुध्वं वचनं मम । गता गजोपपन्नाश्चे शूशूर्णं कर्तुमागतः ॥१५॥
अविदूरे पद्वनेऽके सुखासीनः स्थितोऽस्ति हि । तैनाहं प्रेषिताऽम्यद्य शुश्रावार्थे जगन्मनः ॥१६॥
युष्माकं कथितं वृत्तं तस्य गच्छाम्यहं पुनः । शबर्यास्तद्वचः श्रुत्वा ताश्चार्यैः प्रश्वयान्विताः ॥१७॥
अभिनन्द्य निजैर्वाक्यैः शबरीं तां मुहुर्मुहुः । परस्परं तदा प्रोचुस्ता वार्योः साऽग्रो मुदा ॥१८॥
धन्योऽद्य दिवसोऽस्माकं यस्मिन् राघवदर्शनम् । भविष्वति वरान्नैश्च तोषयामो रघूत्तमम् ॥१९॥
आदौ दुर्गां पूजयित्वा नैवेद्यं तां निवेद्य च । ततः समर्च्य रामाय माशयामञ्च वयं ततः ॥२०॥
इति संमन्त्र्य तां नार्यो रूपसालङ्कारशोभिताः । पीनकीर्णश्रोणिबिम्बो वराङ्ख्या मृगलोचनाः ॥२१॥
विप्रक्षत्रियवैश्यानां शूद्राणां चापि वेगतः । नैवेद्यपात्रैस्तां दुर्गां ययुर्नूपुरनिःस्वनाः ॥२२॥
एतस्मिन्नन्तरे देवी स्वालयस्य समन्ततः । कपाटानि दृढं बद्ध्वा तूष्णीमामाद्रिरीऽद्रजा ॥२३॥
ततस्ता द्वारमासाद्य द्वागं बद्धं निरीक्ष्य च । बभ्रमुः सर्वद्वाराणि न मार्गं लेभिरे स्त्रियः ॥२४॥
तदाऽऽश्चर्यमनाः सर्वा द्वारदेशे स्थिताः क्षणम् । तावदेवालयच्छिद्रो निर्गतः शुश्रुवुः स्त्रियः ॥२५॥
अहमेषात्र श्रीराद्धम्नि गतः साक्षात्महेश्वरः । ये भिन्ने मानयन्त्यत्र मां सीतां राघव हरम् ॥२६॥
ते कोटिकल्पपर्यन्तं पच्यन्ते रौरवेषु हि । अतो गृहद्विमो नार्यो मन्नाथं च जगत्प्रभुम् ॥२७॥
दोषयन्नं वरान्नैश्च तत्तेषेण त्वहं गतः । तुष्टा भवामि गच्छध्वं तृषितं तं रघूत्तमम् ॥२८॥
इति वार्यो वचः श्रुत्वा हैम्वत्या विस्मयान्विताः । दुद्रुवुर्जगदामिन्यः शबरीचर णानुगाः ॥२९॥
किनारे एक दुर्गा मन्दिर है ॥ १० ॥ आज मङ्गलवार है, इसलिए वहाँ बहुत-सी स्त्रियें आयी होंगी। यदि मेरे साथ यहाँ चलें तो आपका नाना प्रकारके विचित्र अन्न खानेको मिलेगा, जिससे आप क्षणभरमें तृप्त हो जायेंगे । शबरीकी सलाह सुनकर रामने उत्तर दिया कि मैं यहाँ कुश आदिकी प्रतीक्षा करता हुआ बैठता हूँ। हे वनवासिनि ! तू ही जाकर उन स्त्रियोंको मेरा हाल सुना दे। रामके आज्ञानुसार शबरी तुरन्त चल पड़ी ॥ ११-१४ ॥ उनने वहाँ पहुँचकर उन स्त्रियोंसे कहा-कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् रामचन्द्र यहाँ विश्राम कर रहे हैं। पास ही पद्मकल्पमें धूप/छायामें बैठे हैं। उन्होंने आप लोगोंको यह सन्देश सुनानेके लिये मुझे भेजा है ॥ १५ ॥ १६ ॥ अब आप लोग जाकर कुछ करें, यह कहकर मैं रामचन्द्रजीको सुना दूँ । शबरीकी बात सुनी तो विस्मित भावसे उन्होंने शबरीका धन्यवाद दिया और कहा- ॥ १७ ॥ १८ ॥ हमारे लिए आजका दिन धन्य है, जिससे श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन प्राप्त होगा और हम मनचाहे व्यंजनोंसे उन्हें सन्तुष्ट करेंगी ॥ १९ ॥ हम पहले दुर्गाजीकी पूजा करके उनको नैवेद्य चढ़ावेंगी। उसके बाद रामको भोजन कराकर स्वयं भोजन करेंगी ॥ २० ॥ यह सुनकर सुवर्णके अलंकारोसे अलंकृत, पीछे कण्ठे पहने, सुन्दर मुख एवं मृगीके समान नेत्रवाली, के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रक घरोंकी स्त्रियें तुरन्त हाथोमे नैवेद्यके पात्र लेकर नूपुरकी मनोहर ध्वनि करती हुई चल पड़ीं ॥ २१ ॥ २२ ॥ उधर दुर्गाजीने चारों ओरसे मन्दिरका फाटक बन्द कर लिया और भीतर चुपचाप बैठ गयीं ॥ २३ ॥ वे स्त्रियाँ मन्दिरम पहुँची तो द्वार बन्द पाया । एक-एक करके वे सब द्वारोंपर घूम आयीं। लेकिन किसी तरफसे भी उन्हें भीतर जानेका मार्ग नहीं मिला ॥ २४ ॥ ऐसी अवस्था में वे विस्मित होकर वहीं बैठ गयीं। थोड़ी देर बाद मन्दिरके भीतरसे यह वाणी सुनायी दी, जिसे उन स्त्रियोंने सुना - २५ ॥ मैं ही सीता हूँ और राम साक्षात् शिव हैं। जो हममें और सीतामें, राममें तथा शिवमे भेद मानते हैं, वे करोड़ों कल्पपर्यन्त रौरव नरकमें सड़ते हैं। इस कारण हे स्त्रियो ! पहले मुझलोग अच्छे-अच्छे अन्नोंसे अघाले मेरे प्रभु रामको प्रसन्न करो। उनके जो बचें, सो लाकर मेरी पूजा करो। इससे मैं प्रसन्न होऊँगी। अच्छा, अब तुम लोग जाओ। रामचन्द्रजी भूखे-प्यासे बैठे हैं ॥२६-२८॥