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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 71 of 811

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Page 71

[ सर्गः ६ ] सारकाण्डम् ५५

कपीश्वराः समायान्तु नानाश्रमनिवासिनः । नगरीं शोभायामासुर्नानाचित्रध्वजैरलंैः ॥ २३ ॥
पताकाभिर्मनोज्ञाभिश्च हेमदण्डैर्मनोरमैः । सुगन्धारूपामशाम सुगन्धं रूपमाविशम् ॥ २४ ॥
यः प्रमाणे मध्यदेशे कन्यकाः स्वलंकृतिः । तिष्ठन्तु षोडश गजाः स्वर्णदण्डैर्विभूषिताः ॥ २५ ॥
चतुर्दन्तः समायातु ऐरावतकुलोद्भवः । नानातीर्थोदकैः पूर्णाः स्वर्णकुम्भाः सहस्त्रशः ॥ २६ ॥
स्थाप्यन्तां तत्र वैदूर्यचामराणि छविानि च । श्वेतच्छत्रं रत्नदण्डं मुक्तामणिविराजितम् ॥ २७ ॥
दिव्यमाल्यानि वस्त्राणि दिव्याान्याभरणानि च । मुनयः संस्कृतास्तत्र तिष्ठन्तु कुशपाणयः ॥ २८ ॥
नर्तक्यो वारमुख्याश्च गायका वैदिकास्तथा । नानावादित्रकुशला वादयन्तु नृपांगणे ॥ २९ ॥
हस्त्यश्वपदरक्षातां बहिस्तिष्ठन्तु मायधुाः । नगरे यानि तिष्ठन्ति देवनायतनानि च ॥ ३० ॥
तेषु प्रवर्त्यतां पूजा नानावैलिभिरुहृताः । राजानः शीघ्रमायान्तु नानोपायनपाणयः ॥ ३१ ॥
इत्यादिश्य वसिष्ठस्तु रथेन रघुनन्दनम् । गत्वा सम्मानितस्तेन सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥ ३२ ॥
निमित्तमात्रस्त्वं राम श्वो गमिष्यसि दण्डकान् । चतुर्दश समास्तत्र स्थित्वा महत्य खरवधम् ॥ ३३ ॥
बंधुना सीतया सार्धं ततो राज्यं करिष्यसि । लौकिकं शास्त्रमान्दव्यं स्त्रीकुरुष्व पितुर्वचः । ३४ ॥
अद्य त्वं सीतया सार्धमुपवासं यथाविधि । कृत्वा शुचिर्भूमिदायी भव राम जितेन्द्रियः ॥ ३५ ॥
इत्युक्त्वा रथमूहूढो दृष्ट्वा रामं सलक्ष्मणम् । जानकीं चापि स गुरुर्ययौ राजगृहं पुनः ॥ ३६ ॥
कौसल्या च सुमित्रा च रामराज्याभिषेचनम् । मुखांग्रपं श्रुत्वा भ्रातृरोगस्थान्स्नेहमन्वितौ ॥ ३७ ॥
चक्रतुः पूजनं देव्यास्तदिष्टोपशमस्पृहे । बलिदानैः शांतिपाठैर्मुनिष्टदममन्विते । ३८ ।
अथापरूहे संधभ्या दास्या पुत्री तु मंथरा । शोभितां नगरीं दृष्ट्वा पृष्ट्वा वृद्धां पथि स्थिताम् ॥ ३९ ॥

सुनकर राजा दशरथ सनाथ हुए ॥ २१ ॥ वदा मन्त्राय नामक राज्याभिषेकक वास्ते सब सामग्री जुटवायी और प्रसन्नतापूर्वक दूतका भेजकर राजाज्ञाका सम्भाषण कराया ॥ उस समय आश्रमोंमे रहनेवाले अनेक कपीश्वर भी वहाँ आ पहुंचे। उन्होंने चित्र विचित्र ध्वजा, पताका और लाउगोंसे नगरीको सजाया। स्थान स्थानपर उत्तम तथा मनोहर मण्डप सजाय स्थापित किये गये। उस देखि में मन्त्री मण्डलोको आज्ञा दी कि सबही ही सुगन्धक बस्तूरियोंसे अलंकृत कराओ और सब वार वारांगना रंगारत जुल्प्य उत्तम भूषण तथा जो अढिस अनुकूल सांगोके इर्य मध्यस्थलपर उपस्थित रहन चाहिये। वहां अनेक तीर्थोंके जलसे परिपूर्ण घट रक्खे ॥ २२-२६ ॥ तज था नौ वांधवबर, मन्त्री और मणिशाम सुशोभित रत्नजटित दण्डवाला श्वेत छत्र सुन्दर मालायें, सुन्दर वस्त्र तथा दिव्य आभूषण भी तैयार रहे। स्नान आदि संस्कारोंसे मस्कृत मुनोजन हाथमे कुशा लिये हुए तैयार रहें ॥ २७ ॥ २८ ॥ नर्तकियाँ, वेण्यायें, गायक, वेदघोष करनेवाले विप्र तथा नाना प्रकार बाजा बजानेमें कुशल शिल्प मिलकर राजमहलके सामने गाना-बजाना प्रारम्भ कर दें ॥ २९ ॥ हाथी, घोडे, रथ और पैदल सेना कवच धारण करके बाहर खड़ी रहे। नगरमें जहाँ जहाँ देवालय हैं, वहाँ-वहाँ अनेक सामग्रियोंसे प्रेमपूर्वक पूजा का जाय और सब राज भेंट लेकर उपस्थित हों ॥ ३० ॥ ३१ ॥ इस प्रकार कहकर वशिष्ठ रथपर सवार हुए और रघुनन्दन रामके पास गये। रामने उनका आदरपूर्वक आसन दिया तब मुनि ने उन्हें सब वृत्तान्त सुनाते हुए कहा - ॥ ३२ ॥ हे राम ! तुम निमित्तमात्र हो। कल तुम दण्डकवनको चले जाओगे। वहाँ चौदह वर्ष रहकर राक्षसोंको मारोगे। उसके पश्चात् भाई लक्ष्मण तथा सीताके साथ प्रसन्नतापूर्वक राज्य करोगे। अतएव शास्त्रव्यवहार निभानेके लिए पिताके वचनको मान लो ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ आज तुम सीताके साथ पवित्रतापूर्वक विधिवत् फलाहारस रहो और भूमीपर शयन करो ॥ ३५ ॥ ऐसा कह वशिष्ठ राम-लक्ष्मण तथा सीता से मिलकर गुरुदेव रथपर सवार हुए और वहाँसे राजमहलको चल दिये ॥ ३६ ॥ तदनन्तर कौसल्या और सुमित्रा गुरुदेवके मुखसे रामके राज्याभिषेककी आज्ञा सुनकर भी स्नेहवश वियोगकी उत्कण्ठी इच्छासे मुनियोंकी मण्डली समेत पूजाद्रव्यो तथा शान्तिपाठोंसे देवीका पूजन करने लगीं ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ इसके पश्चात् छतपर चढ़ी दासीपुत्री मंथराने नगरको सुशोभित देखकर रास्तेकी एक बुढ़ियासे इसका