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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 695 of 811

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Page 695

सर्गः १०] प्रबोधकाव्यम् १७९

तावच्च शीतला गौरी स्नातव्या भूतलेऽमये । मीनाक्षीह तु नारीभिः पूजनीया च जानकी ॥९०॥
तृतीया या तु चैत्रस्य सितपक्षेऽथवा तथा । वैशाखशुक्लपक्षे या तृतीयाऽक्षय्यसंज्ञिका ॥९१॥
नारी या शीतलागौरींनैतन्नानपरायणा अन्यत्र मा करोत्वेवंनपोसिद्धिर्नान्यादिने कदा ॥९२॥
त्रिंशच्च तिथयः पुष्याश्चैत्रमासे महत्तमाः । तथापि हि विशेषोऽत्र तिथीनां वर्ण्यते मया ॥९३॥
चैत्रमासे कृष्णपक्षे पंचमी दशमी तथा । एकादशी द्वादशी च शिवरात्रिस्तथा तथा ॥९४॥
एताः शुभर्भवेत्कृष्णे महापातकनाशनाः । इदानीं चैत्रमासस्य भिक्षपक्षोद्भवाः शुभाः ॥९५॥
वर्ण्यन्ते तिथयः श्रेष्ठा नराणां हितकाम्यया । संवत्सरप्रतिपद्भारभ्य वज्रमीदिनम् ॥९६॥
यावत्ताबच्छुभाः शस्ताः स्नानदानादिकर्मणि । यत्कृतं च प्रतिपदि स्नानादानादिकं द्विज् ॥९७.
द्वितीयायां च तम्परोक्तं द्विगुणं नात्र संशयः । यत्कृतं च द्वितीयायां भक्त्या स्नानादिकं वरैः ॥९८॥
द्विगुणं तत्तृतीयायां चैत्रमासे नृपोत्तम । एवं सप्तांशु तिथयः शुल्काभ्यासमर्थाः शुभाः ॥९९॥
अत्र विशेषो ज्ञातव्यो यथा क्षीरादिसुखप्रदान् । यथा क्षीरादपि प्रोक्तं दध्नस्तु नवनीतकम् ॥१००॥
नवनीताद्घृतं यद्वत्तथाऽत्र निशिनिर्णयः । चैत्रश्च मत्सु मासानां तत्र पक्षः सितो वरः ॥१०१॥
सितपक्षे च चैत्रस्य यावत्सा नवमी तिथिः । तावदेकैकशः श्रेष्ठा नराशु नवमी वरा ॥१०२॥
यस्यां जातं रामचन्द्र धर्मस्थापनणाय हि । तस्मात्सर्वार्थदा या ब्रूया कर्मणेनेकसक्षमा ।१०३।
तस्यां दत्तं हुतं जप्तं यत्किञ्चिच्च कृतं शुभम् । सर्वं तदक्षयं विद्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥१०४॥
प्रतिपद्दिनमारभ्य नवराव्रमुपोषणेत । प्रच्छं सुपुरीम्य पूज चैत्रं कारयन् ॥१०५॥
संवत्सरप्रतिपदि ध्वजाः सौधोपरि स्थिताः । दिव्यवस्त्रेण सम्बध्य मण्डिताश्च मनोरमाः ॥१०६॥

नवमीदिन या तक इस संसारमें शीतला गौरीका निशाम रहता है। इसलिए स्त्रियोंको सुखके लिए सीताताभय जाकर स्नान तथा गौरीका पूजन करना चाहिए ॥८६॥ ९०॥ चैत्रशुक्लपक्ष तृतीया तथा वैशाखशुक्लकी तृतीया ये दोनों तृतीया अक्षय्यसंज्ञक माना गया है ॥९१॥ अथवा जो लोग शीतला गौरीका व्रत कर रही हो, उसे चाहिये कि इन दोनों तिथियोंको स्नान नभ त्यागे । इतर विचार और किसी अन्य दिनमें ऐसा करना वर्जित है ॥९२॥ वैसे तो चैत्रमासकी तीसों तिथियाँ पवित्र हैं । फिर भी इनमें जो विशेषता है, उसे मैं तुमको सुनाता हूँ ॥९३॥ चैत्र कृष्णपक्षका पंचमी दशमी एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, अमावास्या, ये चैत्र कृष्णपक्षकी तिथियाँ बड़ी पवित्र और महान् पापको नाश करनेवाली कही गया है। अब मैं चैत्रके शुक्लपक्षकी शुभ तिथियोंको गिनता हूँ ॥९४॥ ९५॥ इससे मनुष्योंका बड़ा कल्याण होगा। यह मेरा दृढ़ विश्वास है। संवत्सर-प्रतिपदा (प्रतिपद्) से लेकर नवमी पर्यन्त जितनी तिथियाँ हैं, वे सब स्नान-दान और कर्मोंमें शुभ कही गई हैं। उनमें भी प्रतिपदाको स्नान-दान आदि कर्मोंका जो फल शास्त्रमें कहा गया है उससे द्वितीय द्विगुणित फलदायक होता है। द्वितीयाको जो फल कहा है, उससे तृतीयामें द्विगुणित फल होता है। इस तरह नवमी तिथि पर्यन्त सब तिथियाँ शुभ हैं। इनमें इस प्रकारका विशेषत: है कि जैसे ऊँखका रस प्रथम मीठा होकर आदिसे श्रेष्ठतर क्रममें मीठा होता है। जैसे गोसे दूध होता है, दूधसे दही तैयार होता है, दही से मक्खन निकलता है और मक्खनसे घी तैयार होता है। उसी तरह यहाँ तिथियोंका भी निर्णय होता है। पहले तो सब मासोंमें चैत्रमास ही श्रेष्ठ है। उनमें भी शुक्लपक्ष श्रेष्ठ है और शुक्लपक्षमें भी प्रतिपदासे लेकर नवमी तकका तिथियाँ श्रेष्ठ हैं। उनमें भी नवमी तिथि सर्व-प्रधान तिथि है ॥९६-१०३॥ नवमी तिथिका धर्मकी रक्षाका करनेके लिए रामका जन्म हुआ था, इसीसे यह तिथि समस्त कर्मोंको नष्ट करनेवाला माना गयी है ।१०३। उसमें जो कुछ दान दिया जाता, हवन किया जाता, तप किया जाता अथवा जो कोई भी शुभ कर्म किया जाता है, वह सब अक्षय होता है; इसमें संशय कोई करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥१०४॥ इसलिए साधक चाहिये कि प्रतिपदा तिथिसे लेकर नौ रात्रितक उपवास करके रामचन्द्रजीका पूजन करें ॥१०५॥ संवत्सरकी प्रतिपदाको मकानके ऊपर दिव्य वस्त्र