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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 69 of 811

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Page 69

सर्गः ६ | सारकाण्डम् | ५३

तत्तच्चकार सा साध्वी हास्यक्रीडासनादिकम्। विवाहानन्तरं रामः समा द्वादश सीतया ॥१३१॥
रमयामास साकेते महाक्रीडापुरःसरम्। सहस्रवर्षविज्ञेयं श्रेष्ठं वर्षं कृते युगे ॥१३२
शतवर्षञ्च त्रेतायां द्वापरे दशवर्षजम्। कलेर्मासेन बोद्धव्यं शून्यद्वयान्त्रिदिकक्रमात् ॥१३३॥
एवं श्रीरामचन्द्रेण भोगा भुक्ताः सुरोपमाः। यस्मिन् ऋतौ च यद्रूपं फलपुष्पादिकं शुभम् ॥१३४॥
तत्स्र्वं सर्वदेशमात्रासे साकेतमवस्थिते। अनावृष्टिर्न वै कुत्र तस्कराणां भयं न हि ॥१३५
हिंस्रादीनां भयं नासीदयोध्याविषये प्रिये। युधाजित्नाम कैकेयीभ्राता मग्नमातुलः ॥१३६॥
निनाय भरतं स्वीयराज्ये शत्रुघ्नसंवृतम्। कौतुकेन नृपं पृष्ट्वा कैकेयीं प्रणिपत्य च ॥१३७॥
एवं रामस्य माहात्म्यं बाल्यत्वेऽपि सुखावहम्। ये शृण्वन्ति नरा भक्त्या न तेषामस्त्यमङ्गलम् ॥१३८।
एवं यथा त्वया पृष्टं तथा सर्वं मयोदितम्। रामेण चरितं यच्च नृणां माङ्गल्यदायकम् ॥ १३९।
एवं गिरीन्द्रजे प्रोक्तं बाललीलादिकौतुकम्। रामचन्द्रस्य संक्षेपात्तत्र प्रीत्यै सुखावहम् ॥१४०॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे
रामदिनचर्यावर्णनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठः सर्गः

( रामका दण्डकवनमें प्रवेश )
श्रीशिव उवाच

एवं त्रेतायुगे रामं नगर्यां सीतया सुखम्। क्रीडतं नारदोऽभ्यैद्दे ययावाकाशवर्त्मना ॥१॥
अथ रामो मुनिं पूज्य सीतया लक्ष्मणेन च। शुश्राव वचनं तस्य सुरैर्विज्ञापितं च यत् ॥२॥
निहत्य रावणं युद्धे ततो राज्यं कुरुष्व हि। अंगीकृत्य रघुश्रेष्ठस्तं मुनिं च व्यसर्जयत् ॥३॥
अथ रामोऽब्रवीत्सीतां मम राज्याभिषेचनम्। कर्तुकामोऽस्ति तत्प्राप्तं विघ्नमुत्पाद्य दण्डकम् ॥४॥


आश्रमको चले आते थे । जो काम करनेसे राम प्रसन्न होते थे, पतिव्रता सीता उन-उन हास्य-क्रीड़ा तथा आसनादिका विधान करती थीं । विवाहके बाद रामने बारह वर्ष तक सीताके साथ अयोध्यामे आनन्दपूर्वक विलास किया । कलियुगके हजार वर्षोंके बराबर सत्ययुगका एक वर्ष जानना चाहिये । कलियुगके सौ वर्षोंके बराबर त्रेतायुगका एक वर्ष और कलियुगके बारह वर्षके बराबर द्वापरका एक वर्ष होता है ॥१२५-१३३॥
इस प्रकार श्रीरामचन्द्रने बारह वर्ष तक देवताओंके योग्य भोगोका भोगा। रामचन्द्रजीके अयोध्यामे रहत समय जिस ऋतुमे जो पुष्प-फल आदि होना चाहिए, वह सब नियमसे उत्पन्न हुआ करते थे। कभी अनावृष्टि नहीं हुई और चोरोका भय नहीं रहा । हे प्रिये पार्वती ! उस राज्यमे कभी किसीको हिंसक पशुओका भय नहीं हुआ । एक दिन युधाजित् नामक कैकेयीका भाई तथा भरतका मामा वहा आया और राजासे पूछतया कैकयीको मनाकर शत्रुघ्नसहित भरतको अपने राज्यमे ले गया । ॥१३४-१३७ ॥ बाल्यावस्थासे ही मङ्गलस्वरूप तथा सुखदायक रामके चरित्रको जो मनुष्य भक्तिभावसे सुनता है उसका कभी अमङ्गल नहीं होता । १३८॥
इस प्रकार मनुष्यमात्रके लिए कल्याणकारी श्रीरामचन्द्रका चरित्र मैने तुमको कह सुनाया ॥ १३९॥ १४०॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तगते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये बाळचरित्रे भाषाटीकाया सारकाण्डे रामदिनचर्य्यावर्णनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

श्रीशिवजी बोले—इस तरह अयोध्या नगरीमें सुखपूर्वक सीताके साथ क्रीडा करते हुए रामके पास बारहवें वर्षमें एक दिन आकाशमार्गसे नारद मुनि पधारे , १ ॥ सीता तथा लक्ष्मणके साथ रामने मुनिकी पूजा की और उनके मुखसे देवताओंका यह संदेश सुना कि आप पहले रावणको मारकर पश्चात् राज्य करें रघुश्रेष्ठ रामने भी 'बहुत अच्छा' कहकर उन्ह विदा किया ॥ २ ॥ ३ ॥ तदनन्तर राम सीतासे कहने लगे-हे सीते