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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 689 of 811

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Page 689

सर्गः १० ] | मनोहरकाण्डम् | ६७१

निवारयति तत् शीघ्रं रामनाम वरं ततः अयमेव सदा जप्यो रामेति द्वयक्षरो मनुः ॥१९३॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे
उत्तरार्द्धे विशेषकालपरत्वेन पूजाविस्तारो नवमः सर्गः ॥ ९ ॥


दशमः सर्गः

( अयोध्यामें चैत्रमासकी महिमाका वर्णन )

श्रीरामदास उवाच

एवं शिष्य त्वया पूर्वं ये ये प्रश्नाः कृताः शुभाः । श्रीरामविषये ते ते मयोक्ताः परसादरात् ॥ १ ॥
इदानीं ते पुनः श्रोतुमिच्छाऽस्ति तां वदस्व माम् । यद्यम्पृच्छसि भो वत्स तत्सर्वं ते वदाम्यहम् ॥२॥

श्रीमहादेव उवाच

एवं गुरोर्वचः श्रुत्वा विष्णुदासोऽब्रवीन्पुनः ।

विष्णुदास उवाच

गुरो त्वयाऽयोध्यायां चैत्रमासफलं महत् ॥३॥
प्रोक्तं तद्विस्तरेणाथ कथयस्व ममांतिकम् । किं दानं किं फलं तत्र कमुद्दिश्य चरेद्व्रतम् ॥४॥
को विधिश्च कदारंभः सर्वं विस्तरतो वद । यत्सरय्वां रामतीर्थे स्नातव्यं चेति कीर्तितम् ॥५॥

श्रीरामदास उवाच

साधु साधु महाप्राज्ञ शुभः प्रश्नः कृतस्त्वया । अधुना चैत्रमासस्य महिमा प्रोच्यते मया ॥६॥
मासानां प्रथमो मासश्चैत्रमासः प्रकीर्त्यते । मातेव सर्वजीवानां सदैवष्टफलप्रदः ॥७॥
दानयज्ञव्रतसमः सर्वपापप्रणाशनः । धर्मसारः क्रियासारस्तपःसारः सदार्चितः ॥८॥
विद्यानां वेदविद्येव मंत्राणां प्रणवो यथा । भूरुहाणां सुरतरुर्धेनूनां कामधेनुवत् ॥९॥


इसलिए रामनाम सर्वश्रेष्ठ मंत्र है । अतएव लोगोंको चाहिए कि 'राम' इस दो अक्षरके मंत्रको सदैव जपते रहें ॥ १९२ ॥ १९३॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥

श्रीरामदास बोले—इस तरह हे शिष्य ! अबतक तुमने हमसे रामविषयक जो-जो प्रश्न किये, मैने उनका उत्तर आदरपूर्वक दिया ॥ १ ॥ अब तुम्हें जो कुछ सुनना हो, सो कहो । हे वत्स ! हमसे तुम जो भी पूछोगे, वह सब मैं तुम्हें बतलाऊँगा ॥ २ ॥ श्रीशिवजी बोले—अपने गुरुके इन वचनोंको सुनकर विष्णुदास फिर बोले । विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! आप अयोध्यामे चैत्रमासका बड़ा फल कह आये हैं । अब उसे विस्तारपूर्वक कहिए । उसमें क्या दान करना चाहिए, इसके करनेसे क्या फल होता है और किस उद्देश्यसे वह व्रत किया जाता है। इस व्रतको करनेकी क्या विधि है। इसे कब आरम्भ करना चाहिए। यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइए । सरयूके रामतीर्थमें स्नान करना चाहिए, यह जो आप कह चुके हैं । इसका भी विधि-विधान बता दीजिए ॥ ३-५॥ श्रीरामदासने कहा-ठीक है, हे महाबुद्धिमान् शिष्य ! तुमने बहुत ही सुन्दर प्रश्न किया है। अब मैं चैत्रमासकी महिमा बतला रहा हूँ ॥ ६ ॥ सब मासोंमें चैत्रमास वर्षका सर्वप्रथम मास माना गया है। यह मास सब प्राणियोंका माताके समान हितकारी है और सबका अभीष्ट फल देता है ॥ ७ ॥ यह समस्त दानों यज्ञों और व्रतोंके समान फलदायक है। यह सब धर्मोंका सार, समस्त क्रियाओंका सार और सब प्रकारकी तपस्याओका सार है ॥ ८ ॥ यह मास सब विद्याओंमें (वेदविद्याके समान, सब मन्त्रोंमें प्रणव ( ॐकार ) मन्त्रके समान, वृक्षोंमें पारिजातके समान, गोओमें काम-