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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 672 of 811

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Page 672
१८६आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

वेदार्थज्ञानतुल्याया द्वितीयायाः फलं शृणु । प्रत्यक्षरं तु लभते गायत्रीशतजं फलम् ॥४०॥
ये तूपयोगिनः शास्त्रादुत्पन्थेस्तेऽपि भवति हि । नेष्यत्यर्कफलदा ज्ञेया व्यवधानाच्च पादशः ॥४१॥
वेदोपनिषदामर्थं ज्ञानाधिक्याय येऽपठन् । प्रदीपं सर्वविद्यानां यो विद्वान्न्यायविस्तरम् ॥४२॥
वेदार्थज्ञानतुल्यं तु फलं तस्य प्रकीर्तितम् केवलं हेतुविद्यार्थं तु यः पठेन्न्यायविस्तरम् ॥४३॥
हेतुवादादतो भ्रष्टान्नज्ञार्था नैव यः पठेत् । स शृगालो भवेदेव षष्टितः शतसंख्यया ॥४४॥
वर्षाणि नात्र सन्देहः वृथाभाषणतत्परः । ब्राह्मं वैष्णवं मात्स्यं कौर्मं भागवतं तथा ॥४५॥
आदित्यं गरुडं स्कान्दं मार्कण्डेयमथाष्टमम् । अग्न्यग्न्याण्डलैङ्गानि ब्रह्मवैवर्तमेव च ॥४६॥
भविष्योत्तरमाग्नेयं पाद्मं वामनमेव च । वाराहं चैव वायव्यमष्टादशानि वै त्विति ॥४७॥
महापुराणान्येतानि रामायणभवानि हि । रामायणात्पुराणानि व्यासेन खण्डितानि हि ॥४८॥
अतः पुराण नामाभूदेतेषां जगतीतले । आदौ कृतानि यान्यत्र तेषां ज्येष्ठत्वसूचकः ॥४९॥
महाशब्दः प्रोच्यते हि वैष्णवादिषु षट्त्रिषु । पुराणानां तु सर्वेषां फल शिष्य ब्रवीम्यहम् ॥५०॥
वेदतुल्यफलं पाठे श्रवणे च तदधिकम् । अर्थश्रवणतश्चास्य पुण्यं दशगुणं स्मृतम् ॥५१॥
वक्तुः स्याद् द्विगुणं पुण्यं व्याख्यातुश्च शताधिकम् । अन्यान्युपपुराणानि मन्ति तेषां फलं शृणु ॥५२॥
विष्णुधर्मोत्तरं शैवं बृहन्नारदमेव च । भगवतीपुराणं च लघुनारदमथ च ॥५३॥
भविष्यत्पर्वषष्ठं म्यात्तन्त्रं भागवतं तथा । अष्टमं नारसिंहं स्यात्पुराणं रेणुकाभिधम् ॥५४॥
दशमं तत्समाप्तं स्याद्वायुप्रोक्तं तथैव च । नन्दिरोक्तं द्वादशं स्यानंथा पाशुपताभिधम् ॥५५॥
यमनाग्दसंवादस्तथा हंसपुराणकम् । विनायकरूपुराणं च बृहद्ब्रह्मांडरमेव च ॥५६॥
पुण्यं विष्णुरहस्यं स्यादिति ह्यष्टादशानि वै । एतान्युपपुराणानि पुराणार्थफलानि च ॥५७॥

फल मिलता है ॥ ३९ ॥ जब ज्ञान बढ़ जाता है तो देने आप से आप वेद का अर्थ ज्ञात हो जाना है, मीमांसा-शास्त्रके दो प्रकार हैं, एक कर्मपरक दूसरा ब्रह्मपरक ॥३६॥ इन दोनोंमें पहला अर्थात् कर्मका मार्ग बतलानेवाले मीमांसाका अध्ययन करनेसे वेदार्थज्ञानका पुण्य प्राप्त होता है और दूसरे ब्रह्मपरक मीमांसाको पढ़नेसे जो पुण्य होता है, उसे सुनो। उत्तर मीमांसाका अध्ययन करनेवाला, प्र पा जितने अक्षरोंको पढ़ता है, प्रत्येक अक्षरसे उसे सौ गायत्रीके जपका पुण्य प्राप्त होता है, ४०॥ ऐसे लोग बड़े ही उपयोगी विद्वान् होते हैं और ग्रन्थोंकी उत्पत्ति उन्ही लोगोंसे होती है ॥४१॥ जो मनुष्य वेदों और उपनिषदोंके अर्थक न्याय विद्याओ के प्रदीपस्वरूप न्याय-शास्त्र पढ़ते हैं, उन्हें वेदार्थज्ञ नके तुल्य फल मिलता है। किन्तु जो केवल जीविकाके लिये न्यायशास्त्रका अध्ययन करता है और केवल हेतुवादमे मग्न रहकर ब्रह्मज्ञान साके निमित्त नहीं पढ़ता। वह वृथा मनुष्य न्यायके जितने अक्षर पढ़े रहता है, उतने ही वर्षों तक शृगाल हो-होकर जन्म लेता है। इसमें कोई संशय नही है। अब पुराणोंका विधान है वैष्णव मात्स्य, कूर्म, भागवत, । ४२-४५ । आदित्य, गरुड़ स्कन्द, मार्कण्डेय, ब्रह्म, ब्रह्माण्ड, लिङ्ग, ब्रह्मवैवर्त, भविष्योत्तर, अ ग्न्य, पद्म वामन, वाराह और वायु ये अष्टादश महापुराण हैं ॥ ४६ ॥ ४७ । ये सभी महापुराण रामायणसे ही उत्पन्न हुए हैं। किन्तु व्यासजीने रामायण ओ पुराण इन दोनोंमेंसे बहुतसे अंग काट दिये हैं ॥ ४८॥ इसी कारण इनका पुराण यह नाम पड़ा है। सबसे पहिले जो पुराण बनाये गये, उनका ज्येष्ठसूचक महाशब्द है। हे शिष्य । अब मै तुम्हे पुराणोंके पाठका फल सुना रहा हूँ ॥ ४६ ॥ ५० । पुराणोंका पाठ करनेसे वेदपाठका फल मिलता है और उन्हें सुननेमे उससे आधा फल मिला करता है। किन्तु पुराणोंके अर्थका श्रवण करनेमें उससे दसगुना अधिक फल होता है ॥५१॥ वक्ताको दुगुना और व्याख्या करनेवालेको सौगुना पुण्य होता है। इनके अतिरिक्त अठारह उपपुराण भी हैं। अब सबका नाम सुनो— ॥ ५२ ॥ विष्णुधर्मोत्तर, शैव, बृहन्नारद, भगवतीपुराण लघुनारद भविष्यत्का छठाँ पर्व, भागवत, नरसिंह, रेणुका ॥ ५३ ॥ ५४ ॥ दसवाँ तत्त्वसार वायु द्वारा कहा हुआ ग्यारहवाँ, नन्दी द्वारा कहा हुआ बारहवाँ पाशुपत, यम और नारदका सम्वाद, हंसपुराण, विनायकपुराण, बृहद्ब्रह्माण्ड और पवित्र