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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 667 of 811

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Page 667

सर्गः ७ ] मनोहरकाण्डम् ३८१


राम रामेति रामेति ये वदन्ति जना भुवि ।
महापातकिनस्तेऽपि मुक्तिं यान्ति न संशयः ॥ ९५॥

रामचन्द्रेतिमंत्रोऽस्ति वागस्ति वशवर्तिनी ।
तथापि निरये घोरे पतन्तीत्यद्भुतं महत् ॥ ९६॥

श्रीरामनामामृतमंत्रयंत्रौषधी चेन्मनसि प्रविष्टा ।
हलाहलं वा प्रलयानल वा मृत्योर्मुखं वा विशतो कुतो भीः ॥ ९७॥

आसने च तथा निद्राकाले भोजनकर्मणि ।
क्रीडने गमने नित्यं राममेव विचिन्तयेत् ॥ ९८॥

श्रूणीयाः कीर्त्तनीयाश्चिन्तनीयः सदा नरैः ।
गेयश्च रामो भूतेशयो राम एवावनीतले ॥ ९९॥

स्वर्गे सुराणाममृतं पय ऽस्ति परमं शुभम् ।
रामनामामृतं भूम्यां क्षयं नाप्नोति वै कदा ॥ १००॥

गोपीचन्दनलिप्ताङ्गो राममुद्राङ्कितो नरः ।
रामनामोच्चारकश्च तुलसीकाष्ठमालिकः ॥ १०१॥

शंखचक्रगदापद्मधारको राममन्मनाः ।
यस्येदृशं स नरो धन्यो नैवात्र कदाचन ॥ १०२॥

स एव पुरुषो धन्यो यो रामनाम सदा जपेत् ।
स एव पुरुषो निन्द्यश्च यन्न रामं स्मरेच्च यः ॥ १०३॥

ये नराः शिवमङ्गीकृत्य निन्दन्ति राघवम् ।
पूर्वञ्च शृगालास्तेऽपि नरा ज्ञेयाश्चावनीतले । १०४॥

राम एव हरो ज्ञेयः शिव एव रघूत्तमः ।
उभयोर्नास्ति भेदस्त्व भेदबुद्धि नार्की नरः ॥ १०५॥

रामशङ्करयोश्च भिन्नत्वं येन मानितम् ।
अजागलस्तनवत् तस्य जन्म वृथा गतम् ॥ १०६॥

शंभोश्च हृदयं रामो रामस्य हृदयं शिवः ।
नैवानयोः कर्त्तनीयं कुतर्काद्वैधैर्नरैः । १०७॥

रामेति द्वयक्षरं नाम ये वदन्ति त्वहर्निशम् ।
न कस्यापि भय तेषां जीवन्मुक्ताश्च ते नराः ॥ १०८॥

राममुद्राङ्कितं दृष्ट्वा नरं ते यमकिङ्कराः ।
पलायन्ते दश दिशः सिंहं दृष्ट्वा गजा यथा । १०९

ललाटे पृष्ठदेशे च हृदयाग्रे तथोदरे ।
हृदये भुजयोश्चै हि मस्तके त्विति वै नराः ॥ ११०॥


रहते हैं, वे पुरुष धन्य हैं ॥ ९१-९४ ॥ जो लोग उस महाराज रामका यह नाम जपते हैं वे महापातकी होते हुए भी मुक्तिको प्राप्त होते हैं ॥ ९५ ॥ जिनके पास 'रामचन्द्र' यह मन्त्र है और वाणी अपने वशमें है, फिर भी वे घोर घोर नरकमें पड़ते हैं, यह महान् आश्चर्यकी बात है ॥ ९६॥ श्रीरामके मन्त्रका अनुसन्धान-बीजकी सञ्जीवनी यदि मनमें बैठ गई तो हलाहल विष, प्रलयाग्न्य और मृत्युके मुखमें भी घुस जानेका कोई भय नहीं रह जाता ॥ ९७॥ लोगोंको चाहिये कि उठते, बैठते, सोते, खाते, पीते, खेलते, कूदते या कहीं आते-जाते समय एकमात्र रामका ध्यान करें ॥ ९८॥ सदा उन्हींके गुणाणुवाद सुनें, उन्हींके चरित्रका कीर्त्तन करें और उन्हींका गुण गावें ॥ ९९ । स्वर्गमें जिस प्रकार अमृत परम मङ्गलकारी है; उसीके सदृश भूमण्डलपर कभी भी नष्ट न होनेवाला रामनामरूपी अमृत है ॥ १००॥ जो मनुष्य गोपीचन्दन लगावे, राममुद्रामे अङ्कित रहते, रामनामका उच्चारण करके तुलसी (काष्ठ) की माला पहनता, शङ्ख, चक्र, गदा और पद्मका चिह्न धारण करता और मनमें सब समय रामका स्मरण करता है। ऐसे प्राणी जहाँपर रहते हैं, वह स्थान और वे मनुष्य धन्य हैं ॥ १०१ ॥ १०२ ॥ वही पुरुष सब प्रकारसे प्रशंसाके योग्य बन सकता है, जो सदा रामनामका जप किया करता है और वही पुरुष निन्दाका भाजन है, जो सदा रामचन्द्रजीका स्मरण नहीं करता ॥ १०३॥ जो मनुष्य शिवजीकी भक्ति करके रामचन्द्रजीकी निन्दा करता है, उसे इस भूमण्डलमें गधा समझना चाहिये ॥ १०४। राम ही शिव हैं और शिव ही राम हैं। इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। जो प्राणी इनमें कोई भेदभाव मानता है, वह नरकगामी होता है ॥ १०५ ॥ इस संसारमें जिसने राम और शिवमें कोई भेद माना तो बकरीके गलग-स्तनक समान उसका जीवन वृथा गया ॥ १०६॥ शिवजीके हृदय राम हैं और रामके हृदय शिवजी हैं । लोगोंको चाहिये कि विविध प्रकारके कुतर्कोंमें पड़कर इनमें कोई भेद न मानें । १०७॥ जो लोग रात-दिन 'राम' ये दो अक्षर कहा करते हैं, उन्हें किसीका भय नहीं रह जाता और वे प्राणी जीवन्मुक्त हो जाते हैं ॥ १०८॥ राममुद्रासे चिह्नित मनुष्यको देखकर यमके दूत उसी तरह दसो दिशाओंमें भाग जाते हैं, जैसे सिंहको देखकर हाथी भाग खड़े होते हैं । १०९॥ अतएव लोगोंका यह परम कर्तव्य है कि गोपीचन्दनसे अङ्कित राममुद्रा धारण करें । क्योंकि राममुद्रा महान् श्रेष्ठ वस्तु है और सब प्रकारके