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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 62 of 811

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Page 62
९६आनन्दरामायणे[सर्गः ५

मुद्गल उवाच

इत्थं सा वदती विप्र ददर्शाकाशसंप्लवम् । विमानं सुन्दरं शुभ्रं विष्णुरूपधरैर्नरैः ॥१०॥
अथ सा तद्विमानस्थैर्विमानं काशिसंनिभा । पुण्यशीलसुशीलाभ्यांस्तरो गणसेविता ॥११॥
तद्विमानं तदाऽऽपश्यद्व्रतदंतः सविस्मयः । पपात दण्डवद्भूमी दृष्ट्वा तौ पुण्यरूपिणौ ॥१२॥
पुण्यशीलसुशीलौ च समुत्थाप्याथतं द्विजम् । समभ्यनन्दयन् वाणीं प्रोचतुर्धर्मसंयुताम् ॥१३॥

गणावूचतुः

साधु साधु द्विजश्रेष्ठ यस्त्वं विष्णुरतः सदा । दीनानुकंपी धर्मज्ञो विष्णुव्रतपरायणः ॥१४॥
श्रावस्त्यास्त्वया होमकृत् कार्त्तिकव्रतम् । तत्र तस्यार्धदानेन पुण्यं द्विगुण्यमागतम् ॥१५॥
सम्पुष्टस्यार्धभागेन यदस्याः पूर्वकर्मजम् । जन्मान्तरशतोद्भूतं पापं तद्विलयं गतम् ॥१६॥
स्नानेनैव गतं पापं यदस्याः पूर्वकर्मजम् । हरिजाग्रत्त्वांरीश विमानेदमहागतम् ॥१७॥
वैकुण्ठं नीयते साधो नानाभोगयुता त्वियम् । दीपदानभवैः पुण्यैस्तैजसं रूपमाथिता ॥१८॥
तुलसीपूजनार्थश्च कार्त्तिकव्रतकैः शुभैः । विष्णुसान्निध्यगा जाता त्वया दत्तः कृपानिधे ॥१९॥
त्वमप्यस्य भवस्यान्ते भार्यया सह यास्यसि । वैकुण्ठभुवनं विष्णोः सान्निध्यं च सरूपताम् ॥२०॥
ते धन्याः कृतपुण्यास्ते तेषां च सफलो भवः । यैरेकचित्तवृत्तिनो विष्णुर्भक्त्या त्वया यथा ॥२१॥
सम्यगारराधितो विष्णुः किं न यच्छति देहिनाम् । औत्तानपादिर्वैनेय ध्रुवत्वे स्थापितः पुरा ॥२२॥
यन्नामस्मरणादेव दन्तिनो यान्ति सद्गतिम् । ग्राहगृहीतो नागेन्द्रो यन्नामस्मरणाद्युग ॥२३॥
विमुक्तः संनिधिं प्राप्तो जानीह्य जयसंज्ञकः । ग्राहोऽप्य विजयो जाम्ता श्रीविष्णोश्चितनादभूत् ।
एतन्मवाऽर्चिता विष्णुस्तत्सान्निध्यं प्रदास्यति । बह्वन्यदग्मष्ट्राणि भार्याद्वययुतस्य ते ॥२४॥


भावका काम किया है ॥ ९ ॥ मुद्गल मुनि कहने लगे कि इस प्रकार कह ही रही थी कि आकाशमार्गमे विष्णुरूपधारी गणांसे युक्त एक सुन्दर विमान उतर रहा है ॥ १० ॥ बादम विमानमे बैठे हुए पुण्यशील तथा सुशीत आदिने काशीका विमानपर बैठा लिया और मणगण उनका सेवा करने लगे ॥ ११ ॥ व्रतदत्तको वह विमान देखकर बडा आश्चर्य हुआ और उसने पुण्यवान् तथा पुण्यरूपित मुनीशको देखकर उसके चरणाम दण्डवत् प्रणाम किया ॥ १२ ॥ उन दोनोंने भी उस विप्रको उठाकर तथा अभिनन्दन करके धर्मयुक्त वाणीमे कहा ॥ १३ ॥ गण कहने लगे — हे द्विजश्रेष्ठ बहुत-बहुत, तुम धन्य हो। तुम दीनांपर दया करते हो, धर्मका जानने हो और सदा विष्णुभक्तिम रत रहत हुए विष्णुके व्रतमे तत्पर रहते हो ॥ १४ ॥ तुमने जो वैश्वानस ही कार्त्तिकमासका व्रत करके आज उस पुण्यका आधा फल दान दिया है, इससे तुम्हारा पुण्य दुगुना हो गया है ॥ १५ ॥ तुम्हारे आज पुण्यसे इसके सैकड़ो जन्मके पापकर्मोंका नाश हो गया ॥ १६ ॥ तुम्हारे कराये हुए हरिव्रतोद्युक्त जलके स्नानसे ही इसके पूर्वमे किये हुए सब पाप दूर हो गये हैं। अब दिव्य-जागरणके पुण्यसे इसके लिए यह विमान आया है ॥ १७ ॥ हे साधो! तुम्हारे दानके पुण्यसे इस तेजस्वी रूप धारण करनेवालीको हम विविध सुख भोगनेके लिए वैकुण्ठ ले जा रहे हैं ॥ १८ ॥ हे कृपानिधे ! तुम्हारे दिये हुए तुलसीपूजन तथा कार्त्तिकव्रतके पुण्यसे यह विष्णुभगवान्‌के सान्निध्यको प्राप्त हुई है ॥ १९ ॥ तुम भी इस जन्मके अन्तमे स्त्रीसहित वैकुण्ठमे जाकर विष्णुके सान्निध्य तथा सरूपताको प्राप्त होगे ॥ २० ॥ हे व्रतदत्त ! वे लोग धन्य हैं और वह धर्मात्मा तथा सफ़ल जन्मवाले हैं, जिन्होंने कि तुम्हारी तरह विष्णुकी आराधना की है ॥ २१ ॥ सम्यक्भाँति पूजित विष्णुभगवान् मनुष्योंको क्या नहीं देते ? उत्तान पूर्वसमयमें राजा उत्तानपादके पुत्रको ध्रुवपदपर स्थापित किया ॥ २२ ॥ जिनके नामस्मरणमात्रसे ही मनुष्य सद्गतिको प्राप्त हो जाता है । प्राचीन समयमे मकरसे पकड़ा हुआ गजेन्द्र जिसके नामका स्मरण करके मुक्त होकर विष्णुके सान्निध्यको प्राप्त हुआ और जय नामका द्वारपाल बना। ग्राह भी विष्णुका चिन्तन करके विजय नामका द्वारपाल बना था ॥ २३ ॥ २४ ॥ इसी प्रकार तुमने भी विष्णुभगवान्‌का पूजन किया है।