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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 610 of 811

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Page 610

५९४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

पुश्चक्रे प्रभुः सर्व्वाः पुरः पुरुष आदिशन्। इत्युक्तं जन्मचाभावात्प्रन्यवापि हि पञ्चमे १४४॥
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मेति श्रुतेर्वचः। एको देवः सर्वभूतेष्विति चैवापरा श्रुतिः॥१४५॥
पुरः सृष्ट्वा परेशोऽन नैन ताभिरतुष्यथ म सृष्ट्वा मानुषीं मुद्रो परं तोषमगात् सः १४६॥
देवताश्चास्सृजत्पूर्वं दृष्टेमों पौरुषीं तनुम्। रूप तादृक्ष सुकृत बतेति श्रूयते स्फुटम् १४७॥
पुरुषं त्वेवाविशन्मात्मेत्याद श्रुतिः स्वयम्। पुग सृष्टैः सर्वभूतैरगृहायः स्वरट् ॥१४८।
श्रद्धावल्लोमणिगण नग दृष्ट्वा मुदं गतः। इत्थस्माभिर्विष्णुतत्व श्रूयते भगवद्वचः ॥१५०।
मुदं करोति देवस्य द्रावयेद्दुःखसञ्चये। इति मुद्रानिरुक्तिश्च मन्त्रशास्त्रेऽपि श्रूयते ॥१५१।
अतः सर्वेषु देहेषु मनुष्याणां नृणाम् स्वर्गापवर्गयोरादाऽधिकारोऽस्मिन्न चेतरे। १५२॥
लोके प्रसिद्धिर्र्यः कश्चिद्राजमुद्राङ्कितो नरः। अधिकारीति मन्यन्ते पूज्यश्चामरादिभिः १५३।
तथान्याङ्कितो जीवोऽधिकार्थं शास्त्रभूमिषु। नान्याभिर्गो विनिर्ज्ञासु शक्यन्ते म्वस्ममनः पदम् १५४॥
तस्मिंश्चैष सोपाधौ पदानि षडि गनि हि । तानि संक्षेपतः सम्यक् प्रदर्श्यन्तेऽवरुद्धये ।१५५॥
अविद्याकामकर्माणि भोक्तृभोगी सुषुप्तिश्च। एतादृशनि न षडानि देहे कारणसञ्ज्ञके । १५६॥
तमोऽज्ञानमविद्येति शब्दा एकार्थवाचिनः। अत्र गुणत्रयो नाव दृश्यते पदमु मो द्विज । १५७।
लिंगे पुर्यष्टकेऽविद्याऽऽकामकर्मत्रयं स्मृतः। न साधनं तु हेतुत्वान्त्रयाणां ग्रहणं कृतम् ॥१५८॥
कार्यमस्त्वेष्वथवान्य नाहकारणे कारणात्मना। कामस्य कर्मणश्चात्र स्थितिस सूक्ष्मरूपता १५९॥
अविद्या या मुख्यतोऽत्र विद्यते कारणात्मना। दृश्यतान्तु न कामोऽत्र कामना वा श्रूयेर्तनम् ॥१६०॥

सुवर्णसे साभा ढाला जाता है ता सब उसमें अपने आप पिघल जाता है यही दृष्टान्त इस निराकार ब्रह्मकी भी
है ॥ १४४ ॥ प्रभुने पहले इन जीवोंको नासृष्ट किया । उस समय उस पुरुषमें समावेश किया । ऐसा कथन अन्य
कहा गया है अन्य स्थान में भी इन पूर्व वाक्यों से नहीं होता उसका ऐसा कहना है ॥ १४५ ॥ श्रुतिका कथन
है कि सब प्राणियोंके अन्तरूप में रहनेवाला एक ही परमात्मा है । दूसरी श्रुति भी इस बातकी पुष्ट करती
हुई कहती है कि वह एक ही परमात्मा है, जो सबतरफ सब प्राणियोंमें विद्यमान रहता है ॥ १४६ ॥ सृष्टिकर्त्तान
पहिले अनेक तरहकी सृष्टियाँ कीं, किन्तु उससे उस ईश्वरको तृप्ति हुई। फिर जब उसने इस मानुषी मुद्राकी
सृष्टि की, तब उसे बडा प्रसन्नता हुई ॥ १४७ ॥ अगणित क्षण करके लिए देवताओंने पुरुषका शरीर देखा
तो इससे सन्तुष्ट होकर बोले कि आपने यह बहुत अच्छा किया जा इसपर सब लोग सन्तोष करते हैं ॥ १४८॥
विस्तारविशाल मुख्य आत्माका ही श्रुतिने पुरुष कहा है उस परमात्माने अग और प्राणियोंकी सृष्टि की, किन्तु
उसका दृश्य प्रसन्न नहीं हुआ और जब उसने इस मानव शरीरका रूप देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुए ।
हे विष्णुदास इस प्रकार इन भगवान् प्रभुका कथन सुनते हैं ॥ १५०॥ वह उन रचनाओंको प्रसन्न
करता हुआ सब दुःखों और पापों को धोने वाला जान फल कहा जाता है इस प्रकार मुद्रांकी निरुक्ति मन्त्रशास्त्र-
में भी की गयी है ॥ १५१ ॥ इसलिए उसने सब देहों में मनुष्यों पर अधिकार दिया है । स्वर्ग और अपवर्गका
अधिकार भी इसी नरजातिका दिया गया है—औरौंकी नहीं ॥ १५२॥ संसारमें भी यह बात प्रसिद्ध है कि
जिस मनुष्यके पास राजाकी मुद्राका प्रमाणपत्र होता है। उसे लोग अधिकारी समझते हैं और उसकी
पूजा करते हैं । १५३ । ईसी प्रकार इस राजमुद्रापदकी मुद्रा से अङ्कित जीव शास्त्रभूमिका अधिकारी
माना जाता है, अन्य योनिके जीव अवश्य-धरता आत्मपद नहीं जान सकते । १५४ ॥ इस आत्मा उपाधिमें कुल
साठ पद हैं । उनकी जानकारी के लिए यहाँ स्वच्छ तरह बतलाते हैं । १५५ । कारणसंज्ञक देहमं अविद्या,
काम, कर्म भोक्ता भोग और सुषुप्तिके स्थान हैं ॥ १५६॥ हे द्विज तम, अज्ञान और अविद्या इन तीनों
शब्दोंका एक ही मतलब है। इसमें इसमें किस गुणका ग्रहण किया जाना मुझे दीखता ॥ १५७॥ सातवें
शरीररूपमें अविद्या, काम और कर्मका ग्रहण किया गया है। फिर भी कारण रूप इन तीनोंको ग्रहण ही
करना पड़ता है ॥ १५८॥ कामणका चाहे कोई कार्य हो वा न हो, वहीं कारणरूपसे रहता ही है।