श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 601 of 811
Read in contextसर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५८५
चतुर्थः सर्गः
( लघुरामोतोभद्रका विस्तार )
श्रीविष्णुदास उवाच
स्वामिंस्त्वया रामनाम्नामष्टोत्तरसहस्रकम् । भद्रमुक्तं तथा चाष्टोत्तरशतमनुत्तमम् ॥ १ ॥
रामनाम्नां भद्रमुक्तं रामचन्द्रप्रपूजने । तत्कीदृशे ते तु भद्रे लेखनीये मनोरमे ॥ २ ॥
ते मां विस्तरतो ब्रूहि यथाऽहं वेद्मि तत्त्वतः । तयोर्ये ये विशेषाश्च भद्रयोस्तेऽपि मां वद ॥ ३ ॥
श्रीरामदास उवाच
शृणु शिष्य प्रवक्ष्यामि भद्राणां रचनाः शुभाः । यथा पृष्टा त्वया मह्यं रामनाम्नां मनोहराः ॥ ४ ॥
अष्टोत्तरशतं रामलिङ्गतोभद्रमुत्तमम् । आदौ मया विस्तरेण कथ्यते तन्निशामय ॥ ५ ॥
अत्रोपास्या राममुद्रा रुद्रश्चोपासकः स्मृतः । श्रीरामालिङ्गतोभद्रमत एतौच्यते बुधैः ॥ ६ ॥
तिर्यगूर्ध्वे वदा रेखा द्वे शते रेखयाधिके । तत्रादौ कृष्णपरिधिस्ततो रक्तः सितस्ततः ॥ ७ ॥
ततः पीतश्च परिधि कोणेन्दुस्त्रिपदः स्मृतः । चन्द्राग्रे शृङ्खला कृष्णा स्मृता द्वादशपादिका ॥ ८ ॥
हरिता च ततो वल्ली त्रयोविंशत्यदात्मिका । ततः पीता शृङ्खला च स्मृता द्वादशपादिका ॥ ९ ॥
विंशत्पादभवं भद्रं रक्तं वापी सिता ततः । त्रयोदशपदा ज्ञेया लिंगं षड्विंशपादजम् ॥ १० ॥
कृष्णाश्चतुष्पदो मूर्द्धा नाभिर्युग्मपदः स्मृतः । मूलस्कन्धौ षट्पदजौ पार्श्वं तुर्यपदात्मके ॥ ११ ॥
ततो रक्तश्च परिधिर्मर्यादाख्योऽर्कपादजः । ततो मुद्रा तुर्यतुर्यभूमियादमिता स्मृता ॥ १२ ॥
ततो मर्यादापरिधिर्लिंगमुद्राः पुनः पुनः । एवं हरा नव ज्ञेया मुद्राश्चाष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ १३ ॥
परिधयः षोडशैव हान्ते लिंगोर्ध्वपार्श्वके । निर्णेयं भद्रं नवपदैः पीतं वा हरितं क्वचित् ॥ १४ ॥
रक्तभद्रोर्ध्वतः शेषपदानि यानि सन्ति हि । पयेच्छ विचित्ररङ्गैश्च शृङ्खलार्थं नियोजयेत् ॥ १५ ॥
विष्णुदासने कहा—हे स्वामिन् ! आपने हमें रामनामका अष्टोत्तर सहस्रका भद्र ( आसन ) और अष्टोत्तरशत नामका भद्र रामचन्द्रकी पूजाके प्रसङ्गमें बतलाया है। उन भद्रोंको किस प्रकार बनाना चाहिए, यह हमें विस्तारपूर्वक बतलाइए। जिससे कि मैं ठीक तरहसे समझ सकूँ। उनकी जो विशेषतायें हों सो भी हमें बतला दीजिए। १-३॥ श्रीरामदास बोले—हे शिष्य ! उन भद्रोंकी रचनाका प्रकार जिस तरह तुमने पूछा है, सो मैं पहले अष्टात्तरशत रामलिङ्गतोभद्रका रचनाप्रकार विस्तारपूर्वक बतला रहा हूँ, सुनो ॥ ४ । ५ ॥ इसमें राममुद्रा उपास्य है और रुद्र उपासक हैं। इसी कारण लोग इसे रामलिङ्गतोभद्र कहते हैं ॥ ६ ॥ वह भद्र बनानेवालेको चाहिए कि सीधी और बंदी दो सौ रेखाएँ खींचे। उसमें पहलेकी परिधि काली, फिर लाल, फिर सफेद रक्वे ॥ ७ ॥ इसके बादकी परिधि पीली और फिर कोणमें त्रिपद चन्द्रका आकार बनाये। चन्द्रमाके आगे काले रङ्गकी ऐसी शृङ्खला बनाये, जिसमें द्वादश पाद ( कोष्ठक ) विद्यमान हों। फिर हरे रङ्गकी तेईस पदकी वल्ली बनाये। फिर द्वादश पदकी पीली शृङ्खला रक्खे ॥ ८ ॥ ९ ॥ फिर बीस पादका भद्र बनाये। तदनन्तर सफेद रङ्गकी वापिका निर्माण करे। जिसके तेईस पाद बने हों। फिर छब्बीस पादका लिंग बनाये फिर चार पाद । कोष्ठक का काले रङ्गने मस्तक बनाये, फिर दो पादकी नाभि बनाये। उसके दो मूल स्कन्ध छः छः पादोंके बनाये और चार पादका पार्श्वभाग बनाये। फिर बारह पादकी मर्यादा बनाये, जो लाल रङ्गसे रही हो। फिर चार-चार पादोंकी मुद्रा बनाये। फिर मर्यादाकी परिधि एवं लिङ्गामुद्रा बनाये। इसी तरह नौ शिव एवं आठ मुद्रायें बनाये ॥ १०-१३ ॥ फिर लिंगके ऊपर और बगलमें सोलह परिधियोंकी रचना करे। फिर नौ पादका कहीं पीले और कहीं हरे रङ्गके भद्र बनावे ॥ १४ । रक्त भद्रके ऊपर जितने भी चरण हों, उनकी शृङ्खलाके लिए चित्र-