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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 577 of 811

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Page 577

सर्गः २ ] मनोहरकाण्डम् ५६१

अद्य तद्वचनं निशायां बुद्धिमत्तम । श्रुत्वा विचार्य पश्चान्मां प्रष्टव्यं यत्तु रोचते ॥ ५ ॥
तथेति रामवचनमन्वे गत्वा निजं निजम् । गेहं ते स्वस्थचित्ताश्च स्वस्त्रीभिर्मन्त्रकादिषु ॥ ६ ॥
दूतवाक्ये दत्तकर्णा रात्रौ तच्छ्रुन्निद्रिताः । नावचं गमहस्ताश्च सार्द्धयामे सदीवकाः ॥ ७ ॥
धृतशस्त्रा दण्डहस्ता नानावाहनसंस्थिताः । गजेषु दुन्दुभीन्घ्नन्तः तथा वाद्यान्यनेकशः ॥ ८ ॥
धृत्व्या पृथक् पृथङ्नानायान्येषु मंगुलानि हि । राजमार्गेशु सर्वत्र दीर्घशब्दानुदीरयन् ॥ ९ ॥
हे जनाः शृण्वत सर्व्वे किं मोहेन विनिद्रिताः । नेयं निद्रा सर्व्वार्चाना कश्चाऽनर्थो भविष्यति ॥ १०॥
स्वस्थचित्तास्सवय सर्व्वे शृण्वन्तु श्रूयतां वचः । नवद्वाराण्ययोध्यायामेकं तु लघु वर्त्तते ॥ ११॥
१मगज्ये भयं नेति कारणाद्द्वाररक्षकैः । दीयन्ते वा न दीयन्ते कवाटादीनि वै तदा ॥ १२॥
मार्गला शृङ्खलादीनि मन्ति द्वारेषु को जनः । कृष्णवर्जो महाँश्चोरो याम्यादाशायं स्थितस्त्विति ॥ १३॥
श्रूयते न कदा दृष्टः केनापि भुवि सांप्रतं । एव सत्यपि नोपेक्षा रोगशान्त्यै प्रकार्यते ॥ १४॥
गुप्तरूपास्तस्य दूताः साकेते विचरन्ति हि । न ह्यप्रत्ते कदाऽस्माभिनगरा द्वेष संस्थितः ॥ १५॥
आगतश्चेद्वरी दूतोऽप्येके दुर्गे तदा क्षणात् । भेदं कृत्वा तु सर्वत्र दुर्गपालो निहन्यते ॥ १६॥
इत्थं भनं महाऽस्माभिसन्नसन्त्रप्पां सहस्रशः । वर्त्तन्ते पादूताश्च नानावेषधरा जनाः ॥ १७॥
जीवेच्चयं चिरं राजा एवं सत्यपि नो भयम् । अयोध्यायां जायते हि तद्वलं को वदिष्यति ॥ १८॥
एभिर्हूतैस्तस्य शत्रु आत्मारामस्य चात्र हि । कर्त्तव्यं प्रभोः किं हि सच्चिदानन्दरूपिणः ॥ १९॥
तेषां भय तु युष्माकं दुर्बलानां सदाऽस्ति हि । अजापुत्रो दुर्बलोऽत्र बल्यर्थे दीयने जनैः ॥ २०॥
दत्तो बलिस्तु सिंहस्य कदा केन श्रुतोऽत्र न । अतो यूयं हीनबलाः किं निशायां विनिद्रिताः ॥ २१॥

रहते हैं, सो क्या आप नहीं जानते ? अस्तु, जो समय गया सो गया। आज सब लोग रातको ध्यानसे मेरे दूतोंकी बातें सुनें और उनपर विचार करें। इसके बाद जो आप लोगोंको इच्छा हो सो पूछिएगा ॥ ४ ॥ ५ ॥
"तथास्तु" कहकर वे सब अपने अपने घर गये और अपना अपना स्त्रिय के साथ पलङ्गपर पड़े-पड़े जागते हुए रामके दूतोंके वचनपर कान लगाय रहे । ३॥ पहर रात बीतनेपर हाथीपर दीपक लिये, दण्ड तथा अनेक प्रकारके शस्त्र धारण किय, एक हाथीपर दुन्दुभी तथा विविध प्रकारके बाज बजाते हुए गलियो तथा राजमार्गोंपर घूमते और उन बाजोंका घोर निनाद करते हुए वे दूत जाय और कहने लगे—॥ ६-९ ॥
हे पुरवासियो क्या तुम मोहनिद्रामें पड़े सो रहे हो ? यह नींद अच्छी नहीं है। इससे कभी बड़ा भारी अनर्थ हो जायगा। आज तुम लोग स्वस्थ चित्तसे मेरा बात सुनो। इस अयोध्यामें कुल नौ द्वार हैं और एक छोटा सा दसवाँ द्वार भी है। १० ॥ ११ ॥ रामके राज्यमें कोई भय नहीं है। इस ख्यालसे द्वारपाल कभी द्वार बन्द करते हैं, कभी नहीं भी बन्द करते। १२॥ इन द्वारोंमें न कोई अर्गलादण्ड हैं और न जंजीरें ही लगीं हैं। सुनते हैं कि नगरके दक्षिण ओर कोई एक काला चोर रहता है, किन्तु इस नगरमें आज तक उसे किसीने नहीं देखा। यह होते हुए भी रोगशान्तिके विषयमें उपेक्षा न करनी चाहिए ॥ १३ ॥ १४ ॥ उसके दूत गुप्तरूपसे अयोध्या में घूमते रहते हैं। यदि हम लोग असावधान रहे और उसका एक भी दूत किसीम घुस आया तो वह क्षणभरके भीतर हमारा भेद लेकर सब दुर्गपालोंको मार डालेगा। १५ ॥ १६ ॥ हमने यह भी सुना है कि उस चोरके हजारों दूत नाना प्रकारके वेष धारण करके घूमते हैं ॥ १७ ॥ हमारे राजा राम चिरञ्जीव हों। जिनके प्रतापसे उस शत्रुओंके इतना करनेपर भी कोई भय नहीं है उन रामके बलका वर्णन कौन कर सकता है। १८। शत्रूके दूत इन आत्माराम और सच्चिदानन्दरूप रामका क्या कर सकते हैं? ॥ १९॥ हाँ, उन दूतोंसे यदि कुछ भय है तो वह तुम्हारे जैसे दुर्बलोंको है संसारी लोग दुर्बल जीव बकरेका ही बलिदान करते हैं ॥ २० । आज तक कहीं यह नहीं सुना गया किसीने सिंहकी बलि दी हो। इस प्रकार निर्बल होकर भी तुम लोग रातको सो रहे हो ? ॥ २१ ॥