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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 56 of 811

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Page 56

४० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

उन्मील्य नयने वृन्दां हृदि दृष्ट्वाऽब्रवीद्गुरुः । तिष्ठ त्वं बालिके ह्यत्र मा भयं कुरु सर्वथा ॥९१॥
इत्युक्त्वा पुरतो दृष्ट्वा राक्षसौ मुनिसत्तमः । निर्भर्त्सयन्तौ हुंकारैः क्रोधेन महता वृतः ॥९२॥
तौ तहुंकारस्रस्तौ पलायनपरौ तदा । तत्सामर्थ्यं मुनेर्दृष्ट्वा सा विस्मयावृता ॥९३॥
प्रणम्य दण्डवद्भूतौ मुनिं वचनमब्रवीत् ।
वृन्दोवाच
रक्षिताऽद्य त्वया घोराद्भयादस्मान्कृपानिधे । ९४॥
किंचिद्विज्ञप्तुमिच्छामि कृपया तद्वदस्व यत् । जलंधरो हि मे भर्ता रुद्रं योद्धुं गतः प्रभो ॥९५॥
स तत्रास्ते कथं युद्धे तन्मे कथय सुव्रत । मुनिस्तद्वाक्यमाकर्ण्य कृपयोर्ध्वमवैक्षत ॥९६॥
तावत्कपा समायातौ तं प्रणम्याग्रतः स्थितौ । उत्तमाङ्गाभूलतासंज्ञाप्रयुक्तौ भगनांतरात् ॥९७॥
गत्वा क्षणाद्गोदारस्य वानरावग्रतः स्थितौ । शिरःकरद्वयञ्चैव दृष्ट्वाऽन्विततनयस्य सा ॥९८॥
पपात मूर्च्छिता भूमौ भर्तृव्यसनदुःखिता । कमंडलुजलैः सिक्त्वा मुनिनाऽऽश्वासिता तदा ॥९९॥
रुदित्वा सुचिरं वृन्दा तं मुनिं वाक्यमब्रवीत् ।
वृन्दोवाच
कृपानिधे मुनिश्रेष्ठ जीवयैनं मुने प्रियम् ॥१००॥
त्वमेवास्य पुनः शक्तो जीवनाय मदो दम ।
मुनिरुवाच
नायं जीवयितुं शक्यो रुद्रेण निहतो युधि ॥१०१॥
तथापि स्वकृपाविष्टः पुनः संजीवयाम्यहम् । इत्युक्त्वान्तर्दधे यावत्तावत्सागरनन्दनः ॥१०२॥
हृदाश्लिष्य तद्वक्त्रं चुचुंब प्रीतमानसः । अथ वृन्दाऽपि भर्तारं दृष्ट्वा हर्षितमानसा ॥१०३॥
रेमे तद्वनमध्यस्था तद्युक्ता बहुवासरम् कदाचित्सुरतास्यान्ते दृष्ट्वा विष्णुं समेव हि ॥१०४॥

लगाम् उनके गलम डालकर भयभीतभावसे कहने लगी हे मुने ! आपकी शरणमें आया हुई मुझ अबलाकी रक्षा करिए । उनके इस आर्त बचनको सुना तो ध्यान छोड़कर मुनिने उसे अपने हृदयसे लिपटी हुई पाया । तब वे उससे कहने लगे-बालिके ! तुम यहीं निर्भय होकर रहो । ॥८-९१ ॥ उसे इस प्रकार समझाकर मुनिश्रेष्ठने डराने तथा हुंकार करते हुए उन दोनों राक्षसोंको अपने सामने देखा तब क्रुद्ध होकर वे भी हुंकार करने लगे । उनके हुंकारसे त्रस्त होकर वे दोनों राक्षस भाग गये मुनिके इस अद्भुत सामर्थ्यको देखा तो वृन्दा आश्चर्यचकित होकर भूमिपर दण्डवत् प्रणाम करके कहने लगी, वृन्दा बोली हे कृपानिधे ! मुझ नापन इस घोर संकटसे बचा लिया । अब मै आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ । सो कृपा करके कहिये । हे प्रभो ! मेरा पति जलंधर शिवजीसे युद्ध करने गया है । हे सुव्रत ! वह वहाँ किस दशामें है, यह मुझे बताइए । मुनिने उसको बात सुनकर कृपापूर्वक ऊपरकी ओर देखा तो ऊपरसे दो बन्दर आये और मुनिको प्रणाम करके सामने खड़े हो गये । उनके हाथों में वृन्दाने अन्चितनय जलन्धरका कठा सिर, हाथ तथा धड़ देखा । यह देखनेके साथ ही वह पतिवियोगके दुःखसे दुःखित तथा मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। तब मुनिने उसने मुँहपर कमण्डलुका जल छिड़का और सचेत करके शांत किया ॥ ९२-९९ ॥ बहुत समय तक रोनेके वाद वृन्दा कहने लगी – हे कृपानिधे ! हे मुनिश्रेष्ठ ! आप मेरे प्रिय पतिको जीवित कर दें ॥ १०० ॥ मेरी समझमें आप ही इसको जिलानेमें समर्थ हैं। मुनि बोले - युद्धमें शिवजीके द्वारा निहत जलन्धरको जीवित करना असम्भव है । फिर भी तुमपर दया करके मै इसे जीवित करता हूँ। ऐसा कहकर वे अन्तर्धान हो गये। इतनेमें सागरनन्दन जलन्धर प्रगट हो गया और आनन्दसे वृन्दाका आलिङ्गन करके मुख चुम्बन करने लगा। वृन्दाने भी अपने पतिको देखा ही प्रसन्न होकर उस वनमें बहुत दिनोंतक उसके साथ रमण करती रही । एक दिन सम्भोगके अनन्तर उसी जलन्धरको विष्णु के रूप में