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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 545 of 811

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Page 545

सर्गः २१] गद्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५२९

समाययौ ब्रह्मचारी द्वितीयो गाधिजाश्रमात् ।
तं दृष्ट्वा पूर्ववद्रामः प्रत्युद्गम्य द्विजोत्तमम् ॥५१॥
आसनेऽन्ये चोपवेश्य पूजयामास सादरम् ।
ततस्तत्पुरतः स्थित्वा स प्रचच्छ रघूत्तमः ॥५२॥
यदर्थं श्रामितोऽसि त्वं तन्ममाज्ञापयन् इतः ।
तद्राघववचः श्रुत्वा ब्रह्मचारी बभाषिवान् ५३।
राम त्वां गाधिजेनार्त्तं प्रेषणाऽस्मि जवेन हि ।
यत्कर्त्तारौ महायज्ञं विश्वामित्रोऽस्ति राघव । ५४ ।
त्वं तेनाकारितश्चासि प्रस्थानं कुरु सत्वरम् ।
ब्रह्मचारिणोस्तद्वाक्यमृषयोः स रघूत्तमः । ५५।
श्रुत्वा विहस्य प्रोवाच द्विताभ्यां वै तथेति च
तदाश्चर्यं जनाः प्रापुः शृण्वन्ते नु परस्परम् ५६।
कथंमयोमयोः सक्तं रामो गच्छति सत्वरौः ।
केचिदूचु गघवाय किमशक्य तथाऽत्र हि । ५७।
यथा स्त्रीणां वने पूर्वं यथाऽस्माकं हि दर्शनम् ।
यथा गतोऽस्ति लङ्कायाः पुनः भरतदर्शने ॥५८
भिन्नरूपेण रामेण सर्वेषामर्पितं पृथक् ।
तद्वदत्रापि द्विविधा भूत्वा गन्ता न तन्मयी । ५९।
किमाश्चर्यमिदं चाद्य किमशक्यं परात्मनि ।
एवं वदत्सु पौरेषु लक्ष्मणं प्राह राघवः । ६०॥
अद्यैवाहं गमिष्यामि मे जनान्तं च बहिः ।
वासो गेहानि नेयानि बहिः सेनां प्रबोधय ॥६१।
आज्ञापनीयं वाद्यानां ध्वनिं कर्तुं हे सेवकान् ।
तद्राघववच श्रुत्वा तथेत्युक्तवां स लक्ष्मणः ॥६२॥
कारयामास वाद्यानां ध्वनिं तूर्णं भृशमान् ।
सँश्च प्रचोदयामास वहिर्वासोगृहाण्यपि ॥६३।
नेतुमाज्ञापयामासुर्देतास्ते निन्युरादरात् ।
ततो रामोऽपि विप्राभ्यां गृहं गत्वा विदेहजाम् ॥६४॥
सर्वं वृत्तं निवेद्याशु कृत्वा विप्रैर्हि भोजनम् ।
सीतां च करिणीपृष्ठे बंधूनाऽऽरोहयन् प्रभुः ॥६५॥
पुष्पके पौरनारीश्च करिण्युर्मिलादिकाः ।
समारोप्य-तुरागमः स्वयं तस्यां गजोपरि । ६६॥
लक्ष्मणाद्या गजेष्वेव ते समारुरुहुस्तदा ।
निनेदुश्चाथ वाद्यानि ननृतुर्नार्योऽपिचः ॥६७॥


ब्राह्मण कह ही रहा था कि इतनेमें एक दूसरा ब्रह्मचारी विश्वामित्रके आश्रमसे आ पहुँचा । पहलेकी तरह रामने उसका भी स्वागत किया । ४८-५१॥ उस एक दूसरे आसनपर बिठाकर श्रीयुत उसको भी उसी तरह पूजा की । इसके अनन्तर उसके भी आगे बैठकर उन्होंने कहा कि जिस कामके लिए आपने कष्ट किया हो, मुझे आज्ञा दीजिए। रामकी बात सुनकर ब्रह्मचारीने कहा -॥ ५२ ॥ ५३ ॥ हे राम ! मुझे विश्वामित्र-जीने आपके पास भेजा है। वे एक महायज्ञ करना चाहते हैं। उसमें उन्होंने आपको बुलाया है, इसलिए आप शीघ्र प्रस्थान कीजिए। रघूत्तम राम उन दोनों ब्रह्मचारियोंके सन्देश सुनकर मुस्कराए ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ उन दोनोंसे कहा - अच्छा चलेंगे'। इस बातको सुनकर सभाके लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे परस्पर कहने लगे--॥ ५६ ॥ राम इन दोनोंके साथ जाकर कैसे उन दोनों यज्ञोंमें सम्मिलित हो सकेंगे। किसीने कहा कि रामके लिए असम्भव कौन सा काम है, वे क्या नहीं कर सकते ? ॥ ५७॥ जैसे वनमें उन्होंने उन हजारों स्त्रियोंको हजारों रूपोंमें दर्शन दिया था। जिस प्रकार लंकासे लौटकर आनेपर भरत-मिलापके समय प्रत्येक मनुष्यसे मिले थे ॥ ५८ ॥ उसी तरह इस समय भी राम अपना दो रूप बनाकर दोनों जगह चले जायेंगे ॥ ५९ ॥ इसमें आश्चर्य करनेकी बात ही कौन-सी है, जिनका आत्मा इतने ऊँचे दर्जेपर पहुँच गयी है और जो साक्षात् परमात्मा है, उनके लिए असम्भव कोई काम नहीं है। इस तरह लोग आपसमें बातचीत कर रहे थे, तभी रामने लक्ष्मणसे कहा-॥ ६० ॥ लक्ष्मण ! आज ही भोजन करनेके पश्चात् हमलोग बाहर चलेंगे तम्बू कनात आदि भेजवा दो और सेना भी तैयार करवाओ ॥ ६१ ॥ वाद्य बजानेके लिए सेवकोंको आज्ञा दे दो। रामकी आज्ञा सुनकर लक्ष्मणने "एवमस्तु" कहा । ६२ । तत्काल उन्होंने तूर्योको सुदुरी बजानेकी आज्ञा दी। लक्ष्मणके आज्ञानुसार सेवक सब सामान ठीक करने लगे। इसके अनन्तर राम उन दोनों ब्रह्मचारियोंके साथ सीताके महलोंमें गये ॥६३॥ ६४॥ जानकीजी को भी निमन्त्रणका समाचार सुनाया और दोनों ब्राह्मणोंके साथ भोजन किया। फिर बन्धुओंके साथ सीताको हाथीपर सवार कराया। बाकी पुरवासिनी नारियोंको पुष्पक विमानपर एवं ऊर्मिलादिको हाथीपर बिठाया। उन सबको सवारियोंपर बिठाकर स्वयं भी एक हाथीपर सवार हुए और लक्ष्मणादि भी हाथीपर बैठे, इस समय विविध प्रकारके बाजे बजने लगे और