श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in contextसर्गः २० ] गव्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५२३
सुमेधासदृशी यत्र मे श्वश्रूः स्नेहवर्धिनी। विद्रुहः शमुग यत्र विवादो यत्र गाधिनः ॥७७॥
लक्ष्मणो यत्र मे मन्त्री सरयूश्च मे नदी। पार्षदा छत्रपाद्याश्च चतुरन्तो गजो महान् ॥७८॥
द्विजेच्छानुरूपं यत्र मन्नं मेऽङ्गुष्ठितं सदा। इदं वैकुण्ठसदृशं गृहं यत्राणिमागुणः ॥७९॥
चिन्तामणिलकारो हृदये यत्र वर्तते । एकादश सहस्राणि वर्षाण्यायुश्चिरं मम । ८० ।
अनशं मे शिरच्छेदं केषामप्यवनीभृताम्। एष मया सुख भुक्तमिह जन्मनि भूयसः ॥८१॥
नाऽल्पा बाष्पपुरिवाऽस्ति सुगेच्छा मम भूतले । जनएवायतारो ऽयं पूर्णकाममया धृतः ॥८२॥
भूतनाम्भावनाय चे तेऽंशादेव मया धृताः । यदन तु बने पूर्वं सीतया बन्धुना यया ॥८३॥
तच्च लोकोपदेशार्थं भूभारहरणाय च । जनोपदेशः कीदृक् म कृतस्तं प्रवदाम्यहम् ॥८४॥
पितुर्वचो मानमीय यद्यप्यनिशश्रमप्रदम् । पुत्रैग्गिपूपदशार्थं मया वाक्यं पितुः कृतम् ॥८५॥
न तदा कि मया कृते पितुर्वाक्य बल मयि । तथापि लोकशिक्षार्थ तद्वाक्यं पालित मया ॥८६॥
न हन्तव्या मया क्रोशाद्दुष्टाकि कैकयी तदा । तथा मा मंथरा चापि मे गञ्जे विघ्नकारिणी ॥८७॥
कि तदा कुंठिता शक्तिः कैकेयीमंथराबधे । स्त्रीहत्या नैव कर्तव्या चेति सर्वान्युशिक्षितम् ॥८८॥
सापत्नमातृवाक्यं तु पालनीयं स्वमातृवत् । स्वसुखार्थं वधोऽन्यस्य न कर्तव्यो जनेरिति ॥८९॥
उपदेष्टुं मया नैव कैकेयीमंथरे हते । न बहुदिंसा कर्तव्या परराज्यं न काङ्क्षयेत् । ९० ॥
अहमूंपदिशंश्चित्यं जनान्द्यधर्तो न म । मृते पितर्यपि ह्यंतं न तद्राज्यं स्वतान्मया ॥९१॥
राज्यासक्ता नरा भूम्यां भोगासक्ता भवन्तुन । उपदेष्टुं जनेभ्यस्त्वहं पूर्वं वनं गतः । ९२ ।
मातृपितृसुहृत्पुत्रस्नेहाद्कर्मिक न कामयेत् । इत्थ मयोपदिष्टास्त्यक्तः स्नेहस्तदा द्विजाः । ९३ ॥
माता है, जहाँ कि मैं सदा सावधान रहता हूँ ॥७६॥ स्मरण हटाने का रास्ता जहाँ पास है विरह जैसे समुद्र है, विश्वामित्र जैसे विवादाता गुरु हैं । ७७॥ लक्ष्मण जैसे मन्त्री, सरयू जैसी नदी है, अङ्गादि वीर अह्रक्षक हैं, बड़ा भारी चतुरंग्रन्त हाथी है ॥ ७८ ॥ दूसरा इष्ट गुण करना तथा अङ्गुष्ठित व्रत है वैकुण्ठके समान सुन्दर भवन है ॥ ७९ ॥ चिन्तामणि ज्ञेय अनुसार सदा हृदयपर रहता है, ग्यारह हजार वर्षोंकी लम्बा आयु है ॥ ८० । किसी भी राजाके सामने झुकना यह मस्तक है। यहाँ जो सुख है, सो क्या अन्यत्र मिल सकता है ? हे विप्रा ! इस संसारमें मैंने जिन सुखोंका भोग किया है, सो बतला दिया ॥ ८१ ॥ अब मेरे हृदयमें किसी प्रकारका भी सुखभोग करने की वासना शेष नहीं रह गयी है। इसीलिये मैंने पूर्णरूपसे इस अवतारको धारण किया था, भूत मात्रोंके लिये अनन्त रोग जो अंश बाकी रह गये थे, उनके समत यह अवतार लिया है। जो बाल्यावस्थामें तथा भरतके साथ वनकी यात्रा की थी वह दुःख भोगनेके लिए नहीं। बल्कि दुनियाँके लोगोंको उपदेश देनेके लिए की थी। उसमें मैंने संसारके लोगोंको कौन-सा उपदेश दिया है, सो भी बतला रहा हूँ । ८२-८४ । चाहे बाक्यशय परिश्रमसाध्य हो, फिर भी पिताकी बात माननी चाहिये। यह उपदेश देनेके लिए मैंने उस समय पिताकी आज्ञाका पालन किया था ॥८५॥ क्या पिताकी बात टालनेकी सामर्थ्य मुझमे नहीं था ? था, पर लोकशिक्ष के लिये उनकी बात मान ली थी ॥८६॥ क्या उस समय दुष्टा कैकेयी तथा राज्यातिलवमे विघ्न डालने वाली पापिनी मन्थराके वध करने-का पराक्रम मुझमे नहीं था ? था, पर उनको दण्ड न देकर मैंने संसारको यह शिक्षा दी कि स्त्रीका वध कभी भी न करना चाहिए और अपनी सौतली माँको बाक,का भी उसी तरह पालन करना चाहिए, जैसे लोग अपनी सगी माताका करते हैं। दूसरे मुझे लोगोंको यह भी उपदेश देना था कि अपने सुखके लिए परायेका वध न करना चाहिए। इससे कैकेयी और मन्थराको नही मारा ॥ ८७-८९॥ अपने भाईकी हिंसान करे जोर दूसरेका राज्य न हड़पना चाहे। यह उपदेश देनहूं.क लिये मैंने परारार माँक नहीं उठारो, उन्हें नहीं मारना चाहा। पिताके स्वर्गवासी हो जानेपर भी मैंने उस राज्यको नहीं स्वीकार किया । ९० । ९१ ॥ राज्यमें आसक्त लोग सर्वथा विलासी न हो जायें, यह उपदेश देनेके लिए ही मैं वनको गया था । ९२ ॥ माता, पिता, मित्र,
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