श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in contextसर्गः २० ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२१
नेदृशं तत्र भोक्ष्यामि सुखं शृणुत विस्तरात् । कारागृहस्थितिः पित्रोर्जन्मन्दावेव मे भवेत् ॥४३॥
मातृपितृविहीनश्च तदा स्थास्यामि शैशवे । परकीये नन्दगेहे वृद्धिं गच्छामि गोकुले ॥४४॥
गोपवेषस्य किं सौख्यं गोरक्षे भ्रमणं मम । स्त्रीगोनागाश्वपश्यादि बहूँस्तत्र निहन्म्यहम् ॥४५॥
देवपत्नीवरान्कुर्यां वस्त्रौघमयनादिकम् । जनार्यचोरि दुष्कर्म कृत्वाहं गोकुले ततः ॥४६॥
मथुरायां हनिष्यामि सजं कंसमातुलम् । तत्र दास्या रतिं कुर्यां नैष्ठुर्यं गोपिकादिषु ॥४७॥
सङ्कोचा गोपिकाः सर्वा रामो बन्धुर्मोक्ष्यति । अन्यच्च बाल्यवनशयान्मे हि पराश्रयः ॥४८॥
न पराश्रयतो दुःखं किञ्चिदस्ति जगत्त्रये । ततोऽहं स्वस्थलं त्यक्त्वा तटाके सागरस्य च ॥४९।
स्थास्यामि स्वल्पकालं हि चिरकालं न मे स्थितिः । न स्थलं मध्यदेशे हि न राज्यं मे भविष्यति ॥५०।
विना राज्येन किं सौख्यं परभावप्रवर्त्तिनः । छत्रादिराज्यभोगाश्च तस्मिन्न जन्मनि मे न हि ॥५१।
बह्वर्णामेकदेस्तदाङ्गं मे भविष्यति । सदा कामा सुखं देयं दुःखं कासां तदा मया ॥५२।
एवं मदा व्यग्रचित्तस्तासां रंजनकर्मणि । सङ्ग का सुस्वप्नानांऽपि निशया भ्रमणो मम ।५३।
घटिकायां च षट्त्रिंशच्छयनाद्गेहानि हि । पञ्चेटन्पञ्चविंशांग्रैर्गेहानि तदा मम ।५४।
शेषावि गंतु नैवास्ति कालो भानुदयेष्यति । विप्रदट्टीमयी रात्रिश्चत्वेवं मे मा यिष्यति ॥५५॥
बदा मे भ्रमतो रात्री कुतो निद्रा कुत सुखम् । यदा भवेन्निद्रावृद्धिः किंचिद्विठो तदाऽऽनुयाम् ॥५६॥
यस्येच्छाऽत्यन्तदुःखं हि हि मे ऽनेन नरेण हि । कर्त्तव्या बह्वयः पत्न्यो द्रष्टव्यं तत्फलं ततः ॥५७॥
एवं भवेन्न मे सौख्यं द्वापरे कृष्णजन्मनि । भविष्यत्यवतारश्च ममापिविधिणोद्यतः ॥५८॥
अवतार लिये ॥४१॥ लेकिन उन छहोंमें मुझे सुखका नाम भी नहीं मिला। आगे द्वापर युगमें इस पृथ्वीपर गोकुलमें कृष्णरूप में अवतार लूंगा ॥४२॥ लेकिन ऐसा सुख उस अवतारमें भी नहीं पा सकूंगा। सुनिए, उस अवतारका विशेप विस्तारपूर्वक आप लोगोंको बतलाता हूँ। जन्मके पहले ही मेर माता पिता कारागारम रहेंगे ॥४३॥ शैशव समयमें ही माता-पितासे वियुक्त होकर एक अन्य व्यक्ति (नन्द) के घर गोकुलमें रहकर पहूंगा। उस गोपवेषमें गौओंके पीछे-पीछे घूमनेमे मुझे क्या सुख मिलेगा ? फिर गो (वत्सासुर), स्त्री (पूतना), नाग (कालिया), अश्व (केशी) तथा पक्षी (बकासुर) को मारूँगा ॥४४॥४५॥ देवस्त्रियोंके वरदानरू पश्चशोभन आदि (वस्त्र) हरूँगा। फिर गोकुलमें चोरी आदि दुष्कर्म कर लेनेके बाद मथुरा जाकर हाथी कुवलयापीडके साथ मामा कंसको मारूँगा। वहाँ मुझे गोपिकांके साथ निष्ठुरई करके दासी (कुब्जा) के साथ विलास भी करना पड़ेगा ॥४६॥४७॥ जिन गोपियोंको मैंने भोग होगा, भविष्यमें बलभद्रजी उन्हें भोगेंगे। फिर बाल्यवयसके वयमे मुझे परान्त भी होना पड़ेगा ॥४८॥ पराश्रयसे बढ़कर संसारमें और कोई दुःख नहीं हो सकता। फिर समुद्रके किनारे अपना निवासस्थान बनाकर कुछ दिनों तक वहां ही रहूँगा। यह निश्चित है कि उस अवतारम भी मैं अधिक दिनतक संसारमे न रहूँगा। मध्य देशमें निवासस्थान न रहनेके कारण मेरे पास कोई राज्य भी नहीं रहेगा ॥४९॥५०॥ राज्यरहित होकर दूसरेकी आज्ञामें रहनमे भला क्या सुख मिल सकता है ? उस जन्ममे राजाओंको उपभोग्य वस्तुएं छत्र चमर आदि भी मेरे पास नहीं रहेगे ॥५१॥ बहुत सी स्त्रियोंके बीच मेरा अकेला शरीर रहेगा। उस समय रात-दिन यही चिन्ता रहा करेगी कि इनमेंसे किसे सुख दें और किसे दुःख। सदा मुझे उनका अनुहार करना पड़ेगा। भला रातभर एक घरसे दूसरे घरकी दौड़ मारनमें मुझे क्या सुख मिल सकता है ? ॥५२॥५३॥ उस समय एक घड़ीमें पाँच सौ छतीह घरोंका चक्कर लगानेपर भी अट्ठाईस घर छूट जायेंगे और यही सोचना पड़ेगा कि सूर्योदयका समय हो रहा है, अब किसीके यहाँ जानेका समय नहीं है। इस तरह तीस वर्षोंकी रातें बीतेंगी ॥५४॥५५॥ उस समय रातभर घूमनेमें निद्रा तथा सुख क्योंकर मिल सकेगा ? हाँ, जब रात कुछ बड़ी होगी तो चाहे बड़ी आधी घड़ी सोनेके लिये समय मिल जाय ॥५६॥ जिस मनुष्यको संसारमें दुःख भोगनेकी इच्छा हो, वह कई स्त्रियोंको रख ले और फिर देख उसका फल ॥५७॥ भाव यह है कि मुझे उस अवतारमें भी कुछ सुख