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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 533 of 811

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Page 533

सर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१७


दौहित्रार्था कदाचित्तु यथा नेत्रे भुजौ यथा । यथा तौ मणिसूनू च यथाऽहं लक्ष्मणस्तथा ॥१२१॥
तथापि अङ्कौ द्वौ पुत्रौ माऽभूद्भूयोऽपि सन्ततिः । अतः परं पुनः संविन्न जाता दुहितापि वा ॥१२२॥
एकादपि कारणं तत्र कियदिति तदुच्यते मया । तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा जानकीं प्राह राघवः ॥१२३॥
स्वकन्या च मया कस्मै देयाऽत्र जगत्त्रये । मत्समो नृपः कोऽत्र मन्त्रीशाऽर्कनिखण्डनात् ॥१२४॥
यस्य पादौ नृपाः सर्वे शिरसा नम्रतां गताः । को योग्यः सन्न मे जामातुश्चरणेऽमृतात् ॥१२५॥
मद्दानवाणां चरणीं विनाऽहं यस्य वै ददाम् । अतस्त्वं सर्वलोकेऽस्मिन्मातृणाम् परा प्रिये ॥१२६॥
कुशादीनां तु याः कन्याश्चामन्द्रे कन्यकेव नित्यशः । किं यावन्मदङ्गात् प्राप्ताऽसि भुवि ले ॥१२७॥
आश्चर्यं विष्णुमायायास्त्रैलोक्यजननीमिति । पदत्रं दिव्यं काम्यं रूपञ्चेह परात्परम् ॥१२८॥
पौरुषं दृश्यते यच्च तत्त्वं सर्वं समाहितम् । अत्र त्वां पृच्छामि ये च मे पुत्रदुहितारस्त्व ॥१२९॥
यष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् । इति यद्वचनं माने मामन्यं विद्धि नो वरम् ॥१३०॥
एकः स तनयो धन्यः कुलं यस्त्वेषयेन्नृषु । कुलेन्धनाय ते पुत्राः शतशो दुष्टमार्गगाः ॥१३१॥
इति यद्वचनं दीने वसिष्ठे तत्स्मृतं नृपैः । अन्यच्चे कारणं वच्मि यस्मान्न बहवः सुताः ॥१३२॥
मया नैवार्पितास्त्वत्र तच्छृणुष्व शुचिस्मिते । विनोदान्न वदाम्यद्य माऽन्यथा कुरु मद्द्वचः ॥१३३॥
बहुपुत्रैश्च नारीणां तारुण्यं व्याहन्यते न हि । मय्यतो नह तारुण्यच्छेदिनी बहुसन्ततिः ॥१३४॥
न मयाऽत्रापिता भीते शुभं विद्धीति मे प्रिये । यदीच्छाऽस्त्येव बहूनां ने तनयानां विदेहजे ॥१३५॥
तर्हि वै द्वापरे कृष्णरूपेण द्वापरूपिणे । दश पुत्रान् प्रदास्यामि तदा तेषां सुखं भव ॥१३६॥

केवल एक ऐसे पुत्रकी इच्छा करना चाहिए कि जो अपने अनोखे गुणसे कुलको विभूषित कर सके। काठोंकी तरह व्यर्थ जन्म लेनेवाले बहुतसे दुष्ट पुत्रोंसे क्या लाभ ॥१३०॥ बस, ये दोनों चिरञ्जीव रहे। ये मेरे दो नेत्र, दो भुजा, चन्द्र, सूर्य और हमारे तथा लक्ष्मणके सदृश हैं। तुम्हारे दो बेटा तो हो गये हैं, अब और सन्तति न हो यही ठीक है। फिर सात न कहा—अग्रिम हमारा कोई कन्या क्यों नहीं हुई ? ॥१२१॥ १२२। इसका क्या कारण है ? सो हमसे कहिये। सीताका यह प्रश्न सुनकर रामने कहा कि यदि तुम्हारा कन्या होती तो मैं किसको देता ? संसारमें कौन ऐसा है, जो मेरा जामाता बन सके ? हमारे बराबर कौन राजा है, जो सातों द्वीपोंका अधीश्वर है ॥१२३॥ १२४॥ जिसके चरणोंको नृप मस्तक झुकाकर प्रणाम कर सकें। संसारमें कौन ऐसा वर मिल सकता है कि सिवा इसके जिसके पैर से अमृत द्रायता हुआ था। इसी कारण मैंने पुत्रीकी इच्छा नहीं की ॥१२५॥१२६॥ फिर कुश आदिके जो कन्याएँ उत्पन्न हुई हैं, वे क्या तुम्हारी नहीं हैं ? हे सीते ! यौवन के मदसे तुम पागल तो नहीं हो गयीं हो ? ॥१२७॥ आश्चर्यकी बात है कि माता होकर भी ऐसी कटपटाती बात कर रही हो। इस संसारमें जितना स्वास्थ्य दिखता है, वह सब तुम्हारे ही अंगसे प्राप्तमान हुआ है ॥१२८॥ संसारमें जितना भी पुरुषरूप है, वह पर प्रधान उत्पन्न हुआ है। यहाँ जितने पुरुष रूप हैं, वे सब तुम्हारे लड़के और लड़कियाँ हैं ॥१२९॥ शास्त्रमें भी यह बात कही गयी है कि ‘एक ही नहीं, मनुष्यको कई पुत्र उत्पन्न करनेकी इच्छा रखनी चाहिए। सम्भव है कि उनमेंसे कोई ऐसा सपूत निकल आये, जो गयामें श्राद्ध करके कुलका उद्धार करे।’ यह एक साधारण बात है। यह कोई श्रेष्ठ उक्ति नहीं कही जा सकती ॥१३०॥ मेरा रायमें तो अपने कुलका विस्तार करनेवाला केवल एक पुत्र ही। दूषित मार्गपर चलनेवाले काँटेकी तरह उत्पन्न सैकड़ों बेटोंसे कोई लाभ नहीं ॥१३१॥ मैं जिस बातको कह रहा हूँ, बहुवस विद्वानों ने उसे श्रेष्ठ माना है। दूसरा कारण यह बतलाता हूँ कि मैंने तुमसे कई पुत्र क्यों नहीं उत्पन्न किये। हे शुचिस्मिते ! मैं विनोदवश इस बातको कह रहा हूँ। इसे व्यर्थ मत जाने देना, ठीकसे समझना ॥१३२॥ बहुत पुत्रोंके होनेसे स्त्रीका तरुनाई नहीं रह जाती। बहुत सन्तान होनेसे तुम्हारे यौवनका नाश हो जाता ॥१३३॥ १३४॥ यही सोचकर मैंने अधिक सन्तति नहीं उत्पन्न की। यह युक्त स्वरूप जानना। हे विदेहजे ! फिर भी बहुत सन्तान पानेकी ही तुम्हारी इच्छा हो तो द्वापरमें कृष्णरूपसे मैं तुम्हें...