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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 518 of 811

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Page 518

५०१ ] आनन्दरामायणे [ सर्गः १७

एकदा स वनं यातो मृगयार्थं स्वसेनया । ततो दृष्ट्वा मृगं राजा मृगपृष्ठे ह्यद्रुदुवे ॥८८॥
एकाकी हयमारूढो देशान्देशान्तरं ययौ एवं हि गच्छतस्तस्य मृगोऽन्तर्धानमन्वगात् ।८९।
ततः सोऽतितृषाक्रान्तः प्रययौ वै जलाशयम् । तत्र पीत्वा जलं स्वच्छं स राजा साममन्तके ॥९०॥
अज्ञात्वा स्वगुरोर्वेश्म भृगोराश्रममाययौ । तत्र तां वदतां सामग्न्यङ्कां भृगोः सुताम् ।९१।
दृष्ट्वा चन्द्राननां राजा सोऽभूत्कामविमोहितः । ततस्तां प्रार्थयामास रम्यार्थे साऽब्रवीन्नृपम् ।९२।
स्वत्रशा नून नैवाहं ताताधीनाऽस्मि साम्प्रतम् । बहिर्भूतोऽद्य गुरुरन्तस्त्वया वेद्योऽहं नृपम् ९३॥
यदि मामिच्छसि त्वं हि तर्हि तं स्वगुरुं भृगुम् । प्रार्थयित्वा मज सुखं मां पत्नीं त्वं विधाप च । ९४ ।
इत्युक्तोऽपि तया राजा दण्डस्तां कामपीडितः । भुक्त्वा सुखं बलादेव जगाम नगरीं निजाम् ॥९५।
ततोऽरजस्का सा बाला दृष्ट्वा तातं समागतम् । श्रावन्ती सकलं वृत्तं श्रावयामास विह्वला ॥९६।
तद्वृत्तं स मुनिः श्रुत्वाऽक्ष्णोः क्रुद्धो जलं कुधा । अब्रवीन्मत्सुतां बालां मां नयन् रक्तलोचनः ॥९७।
दण्डेन सह दण्डस्य राज्यं वै शतयोजनम् । भस्मस्य भगवाद्दर्ष मद्वाक्याच्च समन्ततः ।९८॥
हीनोदकं तथा वास्तु तथा नष्टचरानरम् । इति तच्छापमाकर्ण्य तात सम्प्रार्थ्य बालिका ॥९९॥
प्रार्थयामास शापस्य सप्तावधिं विनयान्विता । ततो भृगुः सुतामाह यदा यास्यति कुंभजः ॥१००॥
मुनिः काश्यास्तूर्णं देशं तदाऽयं मजलो भवेत् । देशस्याऽस्य दासं हि करिष्यति मुनीश्वरः ॥१०१॥
अरण्यं दण्डकादीहि जातं तस्मान्तदा नराः । अमुं देशं वदिष्यन्ति दण्डकारण्यमेव हि ॥१०२॥
यदा भविष्यत्यग्रेऽत्र रामागमनमुत्तमम् । भविष्यन्ति तदाऽग्रेऽत्र नानाक्षेत्राणि दण्डके ॥१०३॥
रामप्रसादात् क्षेत्राणि भविष्यन्ति ततो जनाः । रामक्षेत्राभिधं सदा वदिष्यन्ति हि दण्डकम् ॥१०४॥
मुनिराप्रप्रसादाच्च देशोऽयं पुनःपुनः । भविष्यत्युत्तमं पुण्यंः सौख्यदश्च मनोरमः ॥१०५।

रुवे—इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न दण्डक नामका एक बड़ा भारी राजा था। वह सदा पापकर्मम रत रहा करता था ॥८१-८७॥ एक बार वह शिकार खेलनेके लिए अपनो सेनाके साथ वनमें गया। वहाँ एक मृगके पीछे राजाने अपना घोड़ा दौड़ाया। वह अकेला ही उस मृगके पीछे पीछे भागता हुआ देशान्तरमें आ पहुंचा और वहाँ वह मृग गायब हो गया। इसके बाद बहुत प्यासा वह राजा एक जलाशयके तटपर गया। वहाँ जल पिया, किन्तु उस यह नहीं ज्ञात हुआ कि मैं अपने गुरु भृगुके आश्रमपर पहुंच गया हूँ। वहाँ भृगुकी कन्या थी। जिसका कि अभी रजोधर्म नष्ट हुआ था उस चन्द्रमाके सदृश मुखवाली (चन्द्रानना) कन्याको देख-कर राजा काममोहित हो गया और उसके समीप जाकर रतिके लिए प्रार्थना की। कन्याने उत्तर दिया कि हे राजन् ! मैं स्वातन्त्र नहीं हूँ। इस समय मेरे ऊपर पिताका अधिकार है और भृगु (मेरे पिता) इस समय कही बाहर गये हुए हैं मैं बापको जानता हूँ ॥८८-९३। यदि आप मुझे चाहते हों तो अपने गुरु (भृगु) के जाकर कहें और मुझे अपनी पत्नी बनाकर आनन्दके साथ भोग करें। उसके ऐसा कहनेपर भी राजाने एक न सुनी और हठात् उसके साथ भोग करके अपनी नगरीको लौट गया। इसके अनन्तर जब उसके पिता भृगु घर आये तो विलाप करती हुई उस अरजस्का कन्याने सारा समाचार कह सुनाया। इस वृत्तान्तको सुनते ही भृगु मार क्रोधके लाल हो गये और अञ्जलीमें जल भरकर कन्याको सान्त्वन देते हुए उन्होंने शाप दिया कि दण्डकके साथ-साथ उसका सौ योजन राज्य चारों ओरसे जलकर भस्म हो जाय ॥९४-९८॥ उतनी जगहपर जल भी न रहे और न कोई जीव ही निवास करे इस प्रकार शाप सुनकर कन्याने विनय-पूर्वक प्रार्थना की कि अपने इस शापकी अवधि भी नियत कर दीजिये। कन्याके प्रार्थना करनेपर भृगुने कहा कि जब अगस्त्य महर्षि काशी छोड़कर विन्ध्यके उस पार चले जायेंगे। उस समय वह स्थान सजल हो जायगा और वहाँ बड़े-बड़े ऋषि निवास करेंगे। राजा दण्डकके दुराचारसे उस देशकी ऐसी दशा हुई है। इसीलिए लोग उसे दण्डकारण्य कहा करेंगे ॥९९-१०२॥ आगे चलकर जब रामचन्द्रजी इस देशमें जायेंगे तो उसमें कितने ही क्षेत्र बन जायेंगे और तबसे लोग उसो दंडकारण्यको रामक्षेत्रके नामसे पुकारेंगे ॥१०३॥ १०४॥ अगस्त्य