Skip to content
SarvaKosh
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 511 of 811

Read in context
Page 511

सर्गः १९ ]
राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् )
४९५


मृगयायां वारणेन्द्रो नैव हन्यो नृपोत्तमैः । गर्भिणी मृगी शशा हन्तव्या विपिने कदा ॥७२॥
न निद्रितश्च हन्तव्यः पिबन्नीरे वनेचरः । तथा स्वशरणं प्राप्तो विश्वस्तो वा कदाचन ॥७३॥
क्रीडासक्तो वने प्राणी नैव हन्यो नृपोत्तमैः । मांसाशानन्ददृष्टिस्तु संस्थाप्य मृगयां चरेत् ॥७४॥
रात्रौ मित्रेण सहितस्तूर्णंमेव नृपोत्तमः । आत्मानं कम्बलेनैव समाच्छाद्य बहिर्भवेत् ॥७५॥
पुरद्वारस्थितानां च अर्गलादि निरीक्षयेत् । जनानां भाषितं सर्वं श्रोतव्यं हि शुभाशुभम् ॥७६॥
एवं स्वयं प्रगन्तव्यमथवा प्रेषयेज्जनम् । रात्रौ रात्रौ पुरे बुद्ध्या श्रोतव्य मकलेरितम् ॥७७॥
न कार्यः कलहो गेहे गृहकृत्यं सभास्थितैः । न वाच्यमणुमात्रं हि न तूष्णीं ष्ठीवनं चरेत् ॥७८॥
न कण्डूयेच्च शिरो राजा सभायां स्वकरेण वै । श्रुत्वा रिपुसमुत्कर्षं न त्यजेद्धैर्यमात्मनः ॥७९॥
पलायनं न संग्रामाद्राज्ञा कार्यं कदाचन । न द्विषतो निजा पृष्ठिर्दर्शनीया कदाचन ॥८०॥
मोद्गवेन सरेद्राजा नदीं मुग्ध्वा कदापि हि । सेतुं विना नदीं गङ्गां नोत्तीर्या हि कदाचन ॥८१॥
नोत्तीर्या नौकया गङ्गा नदी क्वापि सुतादिभिः । कार्या नैव जलक्रीडा नौकायां स्वसुतैः सह ॥८२॥
न स्थेयं हट्टमध्ये हि तथा नैव चतुष्पथे । न ताडयेन्निजां पत्नीं तथा पुत्रं न ताडयेत् ॥८३॥
स्वमुद्राङ्कितपत्रेण विना केषां पुराद्बहिः । न निर्गमः प्रकर्त्तव्यस्तथैवागमनं नृणाम् ॥८४॥
कर्तुमाज्ञापनीयं न मुद्रापत्राङ्कितं विना । नरण्ये नृन्टन चौरो पथि दार्थं नृपोत्तमैः ॥८५॥
न कार्यं मुण्डनं राज्ञा विना तीर्थं कदाचन । पर्वकाले गृहे नैव स्नातव्यं पार्थिवोत्तमैः ॥८६॥
न पादेन स्पृशेच्चापं न पादेन शरं स्पृशेत् । न निष्क्रीडेन्मक्षिकाभिर्द्विजैर्नादं न वै चरेत् ॥८७॥
न तिष्ठेद्द्वारदेशे वै न स्थास्तव्यं नृपेश्च्युति । राज्ञा मार्गे न वै स्थेयं न खेदं नृपतिर्भजेत् ॥८८॥
तोयानयनमार्गे हि स्त्रीणां स्थेयं नृपेण न । धान्यं समर्थं कर्तुं वै दण्डयेद्द्रव्यमायिन ॥८९॥


चुके। तब राजाके सामने जाय और लोट, तब बराबर रहकर प्रणाम कर । ६९॥ ७०॥ राजाके सामने जोर-जोरसे बात न करे। राजाको चाहिये कि बहु समय कवच धारण किये बिना न बैठे। जब शिकार खेलने जाय तो वहाँ हाथी तथा गर्भिणी मृगीका शिकार न करे ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ जो जीव पानी पी रहा हो, जो सोया हो और जो बाण करके शरण आया हो, ऐसे जीवोंका शिकार कभी न करे। शिकार खेलने जाय, तब ब्राह्मणों दिशाओंका कुछ लोगों का मिथुन करके शिकार खेले। रात्रिके समय अपने किसी मित्रके साथ कम्बल ओढ़कर सङ्कल्प बाहर निकले॥ ७३-७५ ॥ पुरद्वारके कटक में लगे हुए आला-दण्ड आदि देखे। रात्रिमं लोग जो अटपटा बात करें वह २१, उन्हें सावधान मनसे सुने। इस प्रकार प्रत्येक रात्रिको स्वयं जाय या अपन विश्व मपात्र मित्रका भेज दिया कर, जो हर रात्रिम लोगोंकी बातें सुनता रहे। घरमे लड़ाई झगड़ा न करे, सभाम कोई घरू काम-काज न करे। घर से सम्बन्ध रखनेवाली कोई बात भी न करे। सभामें चुपचाप बैठे और थूके नही नसभाम सिर न खजलावे। शत्रु का उत्कर्ष सुनकर धैर्य न छोड़े। राजाको चाहिए कि कभी संग्रामभूमिम भागे नहीं और शत्रूको कभी अपना पीठ न दिखलाये । ७६-८० ॥ राजाको चाहिए कि कभी अपने बाल-बच्चाके साथ नौकापर चढ़कर नदी न पार करे। अपने लड़कोंके साथ नौकापर बैठकर जलक्रीड़ा न करे ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ बाजारम या किसी चौराहापर न बैठे। अपनी स्त्री और पुत्रको न धमकावे। राजाका हुआ मुद्रा पत्र देकर लोगोंको अपने नगरसे बाहर जाने दे। यही नियम नगरके भीतर आनेवालोंके लिए भी रक्खे। वनों तथा रास्ते में चोरी करनेवालोंको ऐसा मौका न मिलने पायें, जिससे वे चोरी कर सकें। ८३-८५ ॥ तीर्थके सिवाय किसी दूसरी जगह राजा मुण्डन न करावे। कोई पर्वकाल आ पहुंचे तो घरपर स्नान न कर, बल्कि किसी तीर्थको चला जाय। धनुष और बाणको पैरसे न छुए। चौपड़ पचीसी आदि न खेले। ब्राह्मणोंके साथ आधा वाद-विवाद न करे। अपने द्वारपर तथा खाली जमीनपर न बैठे। रास्तेम भी कभा न बैठे और किसी तरहका खेद न करे ॥ ८६-८८ ॥ जिस रास्तेसे स्त्रियाँ पानी भरने जाती-आती हों, वहाँ कभी न बैठे। अकीको सस्ते नाममै