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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 51 of 811

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Page 51

सर्गः ४ ] सारकाण्डम् ३५

सुमुहूर्त्ते ततो राजा ह्यश्वस्थरथपत्तिभिः । पौरैर्जानपदैः साकं ययौ करिभिराजनः ॥ ६ ॥
गजः पृष्ठे समाजग्मुर्गजोपरि विराजिताः । रामलक्ष्मणभरतशत्रुघ्नास्ते स्वलंकृताः ॥ ७ ॥
कौसल्याद्या राजदाराः स्नुषाभिस्ताः पृथक् पृथक् । रत्नमाणिक्यमुक्तादिशोभितासु वरासु च ॥ ८ ॥
कारणीषु समारूढा वेष्टिता चेष्टपार्षदैः । धातुकाभिः स्वदासीभिर्ययुर्वस्त्रादिभूषिताः ॥ ९ ॥
आगतं नृपतिं श्रुत्वा जनकः पौरवासिभिः । प्रत्युज्जगाम हर्षेण निनाय नगरीं प्रति ॥ १० ॥
राघवापाणिनादैश्च दुन्दुभीनां महास्वनैः । वरांगनानां नृत्याद्यैर्गायकानां च गायनैः ॥ ११ ॥
मार्ग मार्गं महामोघा रूढस्त्रीणां कदम्बकैः । पुष्पवृष्टिविचित्राभिर्ययौ नृपगृहं नृपः ॥ १२ ॥
ततो गृहाणि रम्याणि पूरितान्यन्नवारिभिः । प्रविवेश नृपश्रेष्ठो जनकेनाभिमानितः ॥ १३ ॥
ततो नानारसुत्सादैर्मिष्टानैर्नृत्यवादवैः । वस्त्रैरभरणैः सर्वान् जामातृं च विशेषतः ॥ १४ ॥
मणिरत्नादिदीपैश्च मुहुर्नीराजनैरपि । जनकः पूजयामास दीपावल्यां महादिने ॥ १५ ॥
दीपोत्सवोर्महापुण्यैर्बलिराज्यं प्रवर्त्तते । आनन्दः मर्त्तलोकानां मंगलानि गृहे गृहे ॥ १६ ॥
अभ्यंगोद्वर्त्तनार्थेय वरपक्वान्नभोजनैः । गोदानदासीदानैश्च हस्त्यश्वरथपत्तिभिः ॥ १७ ॥
चकार तुष्टान् जामातॄन् जनको नृपतिं तथा । नृपपत्नीं स्नुदुहितॄर्योध्यास्यादिकान् क्रमात् ॥ १८ ॥
अतः प्रस्थानमकरोत्पुरिं दशरथो नृपः । ततो राजा दशरथः सैन्येन परिवेष्टितः ॥ १९ ॥
ययौ शनैः शनैर्मार्गं सुहृन्मन्त्रिपुरःसरः । एतस्मिन्नन्तरे मार्गे सीतार्थे धनुषा पुरा ॥ २० ॥
मग्नमाना नृपतयः पूर्ववैरमनुस्मरन् । अमरुयाताः ससैन्यास्ते रुरुधुर्नृपतिं पथि ॥ २१ ॥


देशवासियोंके सहित दीवालीके उत्सवपर बुलाया है ॥ ५ ॥ उनका यह वचन सुनकर राजाने दूतों द्वारा मिथिला चलनेका समाचार सारे गाँवो तथा नगरोंमें कहला दिया ॥ ५ ॥ फिर शुभ मुहूर्त देखकर राजा श्वावारूढ, गजारूढ तथा पैदल सैनिकोको साथ लेकर नगर तथा राष्ट्रके लोगोंके साथ हृष्टपुष्ट सवार होकर चले । ६ । राजाके पीछे सुन्दर अलंकार धारण करके हाथीपर सवार होकर राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चले । ७ ॥ उनके पीछे कौसल्या आदि राजाकी स्त्रियां भी अपनी-अपनी पुत्रवधुओंके साथ रत्न माणिक्य-मोती आदिसे सुशोभित उत्तम हथिनियोंपर अलग-अलग सवार हो बेतधारी सिपाहियों, धाइयों तथा दासियोंसे घिरी हुई वस्त्र आदिसे भूषित होकर चल रहीं ॥ ८ ॥ ९ ॥ राजा दशरथका आगमन सुनकर राजा जनक पुरवासियोंको साथ लेकर स्वागत करनेके लिए गये और राजा दशरथको नगरमें ले आये ॥ १० ॥ रास्तेमें जगह-जगह वाद्योंका घोषनाद और नगाड़ोंका तुमुल निनाद होने लगा, वारांगनाएं नाचने लगीं, गायकोंके गान हान लगे तथा बड़े-बड़े महलोंकी अटारियोंपर स्थित स्त्रियोंके मण्ड फूलोंकी बौछार करने लगे । इस प्रकार राजा दशरथ राजभवनमें पहुंचे ॥ ११ ॥ १२ ॥ पश्चात् जनकसे सम्मानित होकर अन्न-जल आदिसे परिपूर्ण भवनोंमे पधारे ॥ १३ ॥ बादम विशेषरूपसे राजा जनकने सब जामाताओंक विविध उत्सवोस, मिष्ठान्नसे, नृत्यसे, गीतसे, वस्त्रसे, अलंकारस तथा मणिरत्नमय दीपकोंकी आरतीसे दीपावलीके शुभ दिन बारम्बार पूजन तथा सत्कार किया । १४ । १५ ॥ दीपोत्सवके महापुण्यसे राजा बलिको राज्य आरम्भ हुआ था। इससे सब लोगोंकें आनन्द हुआ तथा घर-घर मंगल होने लगा ॥ १६ ॥ राजा जनकने उन जामाताओक शरीरमें तेल और चन्दन आदि लगा तथा गुलाबजल छिड़ककर इत्र आदि लगाया और उन्हें सुन्दर पकवान जिमा तथा हाथी, घोड़े, रथ, गाड़े, प्यादे, दास तथा दासिएँ देकर जराइयों और राजा दशरथको सन्तुष्ट किया। तदनन्तर क्रमशः राजकी, स्त्रियोंको, अयोध्यानिवासियोको और अपनी लडकियोंको भी राजा जनकने यथायोग्य वस्तुएं देकर सन्तुष्ट किया ॥ १७ ॥ १८ ॥ तदनन्तर अब कि राजा दशरथ राजाओं, मन्त्रियों, सेना तथा मित्रोके साथ धीरे-धीरे अयोध्याको जा रहे थे। उसी समय उन राजाओंने जिनका कि सीतास्वयंम्बरमें मानभंग हुआ था, उस बैरका स्मरण करके असंख्य सेनाओंके साथ आकर राजा दशरथका घेर लिया। उनको देखा