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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 504 of 811

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Page 504
४८८आनन्दरामायणे[ सर्गः १६

मदंशुकाः प्रतिगृहं बहुधाऽऽसन्पुरेश्वराः । मदप्सरा यथा स्वर्गस्त्वेक एव मदप्सराः ॥४५॥
एकैव पद्मा वैकुण्ठे गीयते विष्णुवल्लभा । नारीगणां गृहेष्वासंस्तत्पद्माः पृथक् पृथक् ॥ ४६॥
अनशन्यश्चलद्दामा न राजपुरुषाः क्वचित् । गृहे गृहेऽत्र धनदा नाक एकोऽल्पकापतिः ॥४७।
एवं रामो महान् श्रेष्ठः शौर्याद्यैर्गुणशोभनः । सौभाग्यशोभा रूपालयः शौर्योदार्यगुणान्वितः ॥४८॥
विजितानेकसमरः श्रियमप्यपवर्गदाम् । दत्वाऽरिजनवर्गेभ्य उग्रः परपुरंजयः ॥४९॥
अनेकगुणसंपूर्णः पूर्णचन्द्रनिभद्युतिः । मन्त्रावभृथक्लिन्नमूर्द्धजः क्षितिपर्षभः ॥५०॥
प्रजापालनतत्परः कोशपूर्त्यार्णभृद्गुरुः । सर्वदाऽक्षरनक्षत्रयुगलध्यानतत्परः ॥५१॥
विशेषककथालापपारिश्रित्यदिनक्षप । सीताप्रक्षालितपदम्भःक्रीडापरितोषितः ॥५२।
शशास राज्यं धर्मेण बन्धुपुत्रसमन्वित । रामे शासति साकेतपुर्यां राज्यं सुखेन वै ॥५३॥
हृष्टाः पुष्टा प्रजाः सर्वाः फलवन्तोऽभवन्द्नगाः । आमन्मदा सुकुसुमैर्विनम्राः सौरभोदा नृणाम् । ५४॥
एकपत्नीव्रताः सर्वे पुमांसस्तस्य मण्डले । नारीषु काचिन्नेवासीत्पवित्रव्रतधर्मिणी ॥५५॥
अनधीतो न विप्रोऽभून्न शूरो नैव बाहुजः । वंश्योऽनभिज्ञो नैवासीदथोपार्जनकर्मसु ॥५६॥
अनन्यवृत्तयः शूद्रा द्विजशुश्रूषणं प्रति । तस्य राष्ट्रे समभवन्सीतारामास्य भूपतेः ॥५७॥
अविप्लुतब्रह्मचर्य्यास्तद्राष्ट्रे ब्रह्मचारिणः । नित्यं गुरुकुलाधीना वेदग्रहणतत्पराः ॥५८॥

लड़ाई-झगड़ेसे रहित था । स्वर्गमें केवल एक हिरण्यगर्भ (विष्णुभगवान्) रहते हैं, किन्तु रामराज्यके प्रत्येक घर हिरण्यगर्भ थे अर्थात् उनमें सुवर्ण भरे हुए थे स्वर्गमें केवल एक मन्मथ अंशुमान् (सूर्य) हैं, किन्तु रामके राज्यमें प्रत्येक व्यक्ति अंशुमान् (वस्त्र कपड़े पहननेवाले) और बातको कौन कहे, जिनमे ही धोड़ बाँधनेवाले लोग विद्यमान थे। जिस तरह हृदयमे अच्छी-अच्छी अप्सराएं हैं, उसी तरह रामके राज्यमें भी बहुत-सी अच्छी-अच्छी अप्सराएं रहती थीं । ४३-४५ । ऐसा कहा जाता है कि स्वर्गमें केवल एक विष्णुकी प्रिया पद्मा (लक्ष्मी) हैं किन्तु रामके राज्यमं स्त्रियोंसे भी अधिक पद्मापति (पद्मसंख्यक रुपये रखनेवाले) लोग थे । रामके राज्यमे कभी किसी प्रकारका अकाल नहीं पड़ा और ऐसे राजपुरुष नहीं थे, जो कान्तिविहीन रहे हों । स्वर्गमें केवल कुबेर धनद (लेस दसके व्यवहारी) हैं किन्तु रामके राज्यमं असंख्य धनद थे ॥ ४६ । ४७ । इस तरह रामचन्द्र अनेक मद्गुणोंसे युक्त और सर्वश्रेष्ठ थे । रामचन्द्र सौभाग्य, रूप शौर्य और औदार्य आदि गुणोंसे युक्त थे। अनेक युद्धामं उन्होंने विजय पायी थी और संसारकी दरिद्रताको उन्होंने लक्ष्मोंके हाथ सौंप दिया था। उनके वामभागमें सीताजी बैठो रहती थीं । इस कारण उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। वे सबसे उग्र तथा शत्रुओंके नगरको विजय करनेमें सिद्धहस्त थे। अनेक गुणोंके एकत्रित होनेसे वे पूर्ण हो चुके थे और पूर्ण चन्द्रमाके समान उनकी कान्ति थी। सर्वदा अवभृथ (दक्षान्त) स्नान करनेसे उनके केश भीगे रहते थे और सब राजाओमे श्रेष्ठ माने जा चुके थे ॥४८-५०॥ प्रजाका पालन करनेम वे पूर्णतया दत्तचित्त रहते थ और खजानक धनस ब्राह्मणोंको प्रसन्न रखते थे। वे सदा शिवके ध्यानम तत्पर रहते थे। वे सर्वदा शिवजीक। कथाएँ कहन मनते दिन रात बिताने थे । सीता उनके पैर धोया करती थीं । उनके साथ विविध प्रकारकी क्रीड़ायें करनेमे राम प्रसन्न रहत थे ॥ ५१ । ५२ । उन्होंने भाइयो और पुत्रोके साथ रहकर अच्छी तरह राज किया । रामके शासनकालमे प्रजा मुखी तथा हृष्ट-पुष्ट रहती थी और वृक्ष फल-फूलसे लदे रहकर कारण झुक रहने और मनुष्योंको मुखी रखते थे ॥ ५३ । ५४ ॥ उनके राज्यमें सब पुरुष एकपत्नीव्रती थे और स्त्रियोंमें भी कोई ऐसी नहीं थीं, जो अपने पातिव्रतधर्मका पालन न करती हो ॥ ५५ ॥ उस समय कोई ऐसा ब्राह्मण नहीं था, जो बिना पढ़ा हो और कोई क्षत्रिय भी ऐसा नहीं था, जो योद्धा न रहा हो। कोई ऐसा वैश्य नहीं था, जो धन कमानेकी कला-से अनभिज्ञ हो। राजा रामके शासनकालमें राज्य भरके शूद्र और किसी प्रकारकी वृत्ति न करके एकमात्र द्विजों (ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यों) की सेवामें लगे रहते थे। उनके राज्यमें ब्रह्मचर्य्यकी रक्षा करते हुए