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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 495 of 811

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Page 495

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१

सकृन्न मक्षिपोपेन भर्तुरारोग्यहेतवे । मोदकानपि दास्यामि विघ्नेशाय महात्मने ॥८८॥
मन्दवारे करिष्यामि भवेत्वहमपोषणम् । नोपभोक्ष्यामि मधुरं नोपभोक्ष्यामि वै घृतम् ॥८९॥
तैलाभ्यङ्गविहीनाऽहं सदा स्वप्स्यामि भूतले । जीवत्वयं रोगहीनो भर्ता मे शरदां शतम् ॥९०॥
एवं सा व्याहरद्देवी वासरे वासरे वने । तदा चागादृषिः कश्चिन्महात्मा देवलाह्वयः ॥९१॥
वैशाखमासे घर्मार्त्तः स ययौ तस्य वै गृहे । तदा ते भार्यया प्रोक्तं वैद्योऽयं गृहमागतः ॥९२॥
तेन ते रोगहानिः स्यात्स्यातिथ्यं करोम्यहम् । यद्याह पथ्यमिच्छ्वं मां नोचेन्नैव करोम्यहम् ॥९३॥
शान्त्या त्वां धर्मविन्मुखं भिषग्व्याजेन वञ्चितम् । तस्यातिथ्यं तु वै कर्तुं दत्ताऽऽज्ञा वै पुरा त्वया ॥९४॥
तस्य पत्नी तदा तुष्टा पूजयामास मा मुनिम् । पादावनेजनं कृत्वा तज्जलं मूर्ध्नि तेऽवहत् । ९५॥
पातुं तुभ्यं ददौ वीर्यं त्वामुक्त्वा भेषजं त्विति पानकं च ददौ तस्मै घर्मार्त्ताय महात्मने ॥९६॥
दिव्यान्नैर्भोजयामास सुगन्धव्यजने ददौ । त्वयाऽनुज्ञापिता साय धर्मतापं व्यशारयत् ॥९७॥
स प्रातःकदिते सूर्ये मुनिर्भाग्यान्तरं ययौ । अथ नाल्पेन कालेन सन्निपातोऽभवत्तव ॥९८॥
त्रिकटु मुश्व आधाय्मा भर्त्तारंङ्गुलिमव्यदन् । कफेन दन्तपङ्क्तिभ्यां मीलित्वाभ्यां दृढं तदा ॥९९॥
ते वक्त्रेऽङ्गुलिखण्डं तस्थितमभवन्निबोधतत् । गङपित्ताङ्गुले स्तस्याः पश्चात्त्वं सं गतः पुरा ॥१००॥
शय्यायां सुमनोहायां स्मरन्तां पुश्चलीं हृदि । मृतं विज्ञाय भर्त्तारं भार्या कांतिमता तव ॥१०१॥
विक्रीन्वा वलये स्वे त्वां गृहीत्वा चन्दनं बहु । चक्रे चितिंतनेन माध्वी मध्ये कृत्वा पतिं तदा ॥१०२॥
समालिङ्ग्य भुजाभ्यां ते पादौ चालिङ्ग्य पादयोः । मुखे मुखं निजं कृत्वा हृदये हृदयं तथा ॥१०३॥
गुह्ये कृत्वा तु गुह्यं स्वमेवं सा रायमागता । दाहयामास कल्याणी भर्तुरैहिकजान्वितम् ॥
आत्मना सह तन्वी ज्वलितं जातवेदसि । १०४ ।
एवं वरा सा ललना पतिव्रता ददाम ने सुखमित्युदी ।
विसृज्य देहं सहसा प्रयाथ पर्ति जयत्युच्च सुरादिरोद्यम् ॥१०५॥


और चण्डिकाके समीप यह प्रार्थना करता- हे देवि ! यदि मेरे पतिदेव शीघ्र अच्छे हो जायें तो मैं महिषके रक्त और मांससे मिला हुआ अन्न आपका समर्पण करूंगी वा देत यदि अच्छे हो जायें तो मैं गणेशजीको लड्डू चढ़ाऊंगी और प्रत्येक शनिवारको व्रत करूंगी । मैं मिठाई, मट्ठा छोड़ दूंगी, घी भी नहीं खाऊँगी, शरीरमे तेल और उबटन लगाना त्याग दूंगी और सदा जमीनपर सोऊंगी। लेकिन मेरे पतिदेव रोगमुक्त हो जायें और संवदा वर्ष जीवित रहें ॥८८-९०॥ इसतरह वह नित्य मानना माना करती थी । इसी बीच एक दिन महात्मा देवल ऋषि सहसा उसके घर पहुंचे। वह वैशाखका महीना था; स्तम्भको स्त्री पतिके पास आकर कहने लगी कि एक कोई वैद्य देवात् मेरे घर आ गया है। यह अवश्य किसी उपायसे आपका रोग नष्ट कर देगा। आप यदि आज्ञा दें तो मैं उसकी सेवा करूँ, नहीं तो नहीं ॥ ९१-९३ ॥ स्तम्भ (तुम) ने सेवा करनेकी आज्ञा दे दी। स्त्रीने प्रसन्न मनसे देवलकी पूजा की। इनके चरण धोकर उस जलको माथे चढ़ाया और थोड़ा-सा जल दवाके व्याजसे स्तम्भ (तुम) को भी पिला दिया। फिर उन देवल ऋषिको उसने शर्बत पिलाया। अच्छे-अच्छे पकवान बनाकर भोजन कराया और तुम्हारे कहनेसे उनकी पंखा भी झलकर उनका सन्ताप दूर किया ॥ ९४-९७ ॥ रातभर देवलऋषि उनके घर रहे और सवेरे दूसरे गाँवको चले गये। थोड़े दिन बाद स्तम्भको (तुमको) सन्निपात हो गया। स्त्रीने त्रिकटु (सोंठ, मिर्च, पीपल) का काढा बनाकर स्तम्भके (तुम्हारे) मुखमें दिया, इतनेमें कफके प्रकोपसे दांत अकड़ गये और तुमने स्त्रीकी एक ऊँगली काट ली। तुम्हारे मुखमें वह कोमल उँगली पड़ी ही रही और तुम्हारी मृत्यु हो गयी ॥ ९८-१०० ॥ मरणकालमें शय्यापर पड़े हुए उसी पुंश्चली वेश्याका स्मरण करते-करते तुमने प्राण त्याग दिया। जब उस सतीने जाना कि तुम्हारी मृत्यु हो गयी है तो अपने दोनों कङ्कण बेचकर बहुत-सी चन्दनकी लकड़ी खरीदी और उसकी चिता बनायी। फिर दोनों भुजाओंसे भुजायें पैरसे पैर, मुखसे मुख तथा हृदयसे