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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 487 of 811

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Page 487

सर्गः १३ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१

भागाद्राङ्कतवर्णान्स्तद्वाग्रथाथाणान् प्रभो । सारं सारं प्रगृह्याथ यद्यद्रम्यं मनोरमम् ॥ ९४ ॥
कथानकं तेन तेन व्यासेन मुनिनाऽत्र हि । अष्टादश पुराणानि तथोपपुराणानि च ॥ ९५ ॥
कृतान्यन्येऽपि मुनयः षट्शास्त्रादीन्यनेकशः । अग्रे सर्वं करिष्यन्ति सारं रम्यं प्रगृह्य च ॥ ९६ ॥
ततोऽत्र श्लोकरूपं च यन्मया हरके वने । चतुर्दशवत्सरैश्च कैकेयीदुष्टभावतः ॥ ९७ ॥
कृतं चरित्रं सीताया विरहादि च गद्यत । तत्र किञ्चित्क्षेपभूतं हि चतुर्विंशत्सहस्रकम् ॥ ९८ ॥
तावन्मात्रं वदिष्यन्ति यद्वाल्मीकेः कृतं स्थिति । तन्मत्रं सकलं ज्ञात्वा भावि वृत्तं रघूत्तम ॥ ९९ ॥
श्लोकसङ्ख्यायोगश्च पूर्वमेव मयेरितः । युद्ध प्रयाने भातस्य श्लोकश्चैवोपरागके ॥ १०० ॥
रतिनिशायां श्रोतव्याऽऽनन्दरामायणं सदा । युद्धं ज्ञेयं भारतं हि रतिर्भागवतं स्मृतम् ॥ १०१ ॥
शेषभूतं चतुर्विंशत्सहस्रं शोक उच्यते । तव भाविबरेणैतदानन्दचरितं तव ॥ १०२ ॥
शतकोटिमितं पूर्वं यन्मयैव विनिर्मितम् । नवकाण्डमितं रम्यं षयुद्रादशसहस्रकम् ॥ १०३ ॥
नवोत्ताशतं सर्वं क्वचिन् स्थास्यति भूतले । तव भाविदरान्नाय न कोऽप्येनां मनोरमाम् ॥ १०४ ॥
अष्टोत्तरशतैः सर्गैर्निर्मितां मेरुणाऽन्विताम् । तव कीर्तनमालां नो खण्डयिष्यति भूतले ॥ १०५ ॥
नवकाण्डयुतं रम्यं दृष्टा स्तरणहेतवे । एतद्धि स्थापयिष्यति यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ १०६ ॥
यदा तत् खण्डितं पूर्वं व्यासेन मुनिना तत्र । शतकोटिमितं रामचरितं यन्मया कृतम् ॥ १०७ ॥
तदा किञ्चिद्धितं दृष्ट्वाहं तूष्णीमेव संस्थितः । भविष्यति कलौ मन्दमतयोऽल्पायुषो नराः ॥ १०८ ॥
न समर्था मम ग्रन्थं विमलं श्रोतुं कदापि हि । अतो व्यासेन मुनिना मत्कार्यं यत्पृथक् कृतम् १०९
सन्तस्याभिन्यहं मत्वा परां तृप्ति गतः प्रभो । अनस्त्वं प्रार्थयाम्यद्य नवकाण्डमितं त्विदम् ॥ ११० ॥
जानन्दरामचरितं न विरूपय राघव । वर्जयिष्यामि खेट्ठाख्यं तदा दुःखमय प्रभो ॥ १११ ॥

है। मैंने जो सौ करोड़ श्लोकोंमें आपके चरित्रका वर्णन किया है, उसे हे रघुनन्दन ! आप कुछ समय पहले कई भागोंम बाँट चुके हैं। ८२-६३ ॥ उनमेंसे जो भाग भारतवर्षके लिये चुना था, उसके सार अंशको लेकर जो कथानक अच्छे थे, सुननेमात्रसे समझमें आ जाते वा कानोंको प्रिय लगते थे, उन्हींके आधारपर व्यासदेवने अष्टादश पुराणों तथा उपपुराणोंको बना दिया है। इनके अतिरिक्त भी बहुतसे ऋषि उन्हींकी सहायतासे षट्शास्त्र आदि कितने ही शास्त्र बनायेंगे ॥ ९४-९६ ॥ कुछ ही समय बीतनेके बाद कैकेयीकी दुष्टतासे आपको चौदह वर्ष पर्यन्त जो दुःख झेलने पड़े थे, सीताके विरह आदिका दुःख जो चौबीस हजार श्लोकोंसे कुछ कम है, उतने ही चरित्रकी नींव मुझ वाल्मीकिका बनाया हुआ मानेंगे। इस भावी स्थितिको समझकर ही मैने आपके उतने श्लोकमय चरित्रको विशेष उत्साहके साथ लिखा है। सब लोगोंको चाहिये कि सबेरे युद्ध-चरित्र तथा दोपहरके बाद शोक-चरित्रका श्रवण करें युद्धचरित्रका मतलब महाभारत, रति-चरित्रका श्रीमद्भागवत तथा बाकी चौबीस हजार श्लोकोंका मतलब शोकचरित्र माना गया है। आपके भावी वरदानके प्रभावसे आपका यह आनन्दरामायण, सौ करोड़ श्लोकोंवाला मेरा बनाया रामचरित्र, नौ काण्डोंवाला द्वादश सहस्रात्मक रामचरित्र एवं एक सौ नौ श्लोकोंवाली रामायण ये सब पृथ्वीतलमें कही न कही रहेंगे ही। आपके भावी वरदानसे एक सुन्दर कीर्तनमाला, जिसमें १०८ सर्ग हैं, सुमेरुकी मनकासदृश अग्यसे लगी है, इसका कोई भी खण्डन नहीं कर सकेगा। इस नौ काण्डोंवाले चरित्रको लोग आपकी प्रसन्नताके लिए तबतक सम्हालेंगे, जब तक कि संसारमें सूर्य-चन्द्र विद्यमान रहेंगे ॥ ९७-१०६ ॥ मेरे बनाये सौ करोड़ श्लोकोंवाले रामचरित्रका खण्डन करके जब व्यासजीने १८ पुराण बनाये थे, तब उससे किसी प्रकारका कल्याण देखकर ही मैं चुप रह गया था। उस समय मेरे विचारमे आया कि आगे चलकर कलियुगमें लोग मन्दबुद्धि तथा अल्पायु होंगे। इस कारण वे मेरे इतने बड़े ग्रन्थको कभी नहीं सुन सकेंगे। व्यासजीने मेरे काव्यसे कथायें अलग करके जो पुराणोंको बनाया, सो बहुत अच्छा किया। इससे