श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 476 of 811
Read in context४३० आनन्दरामायणे [ सर्ग ११
अस्माभिर्यच्चञ्चलभावादापराधं कृतं त्वं नः स्मर एवं करुणातः ।
तः प्राणास्ते दर्शनहेतोस्तनुमध्ये तिष्ठन्ति त्वां पदशङ्खत्रयाच्ञा क्रियतेऽद्य ॥६२॥४॥
भो भो राघव मा रुषं त्वं क्रोधं मा मत्र दर्शयश्च ।
पर्याप्तं न हि दर्शनार्थं वाञ्छामो न हि त्वत्तः कामम् ॥६३॥५॥
देहि त्वं निजदर्शनलाभं जन्मान्तरेऽर्पय नो वरदानम् ।
पाहि न्द शरणं प्रपन्नानां सर्वाङ्गाग्र्यै र्नः प्रणामार्थः ॥६४॥६॥
राम त्वं किं निर्दयहृदयस्त्वयि नः किं नायान्येष स्त्रीजनकरुणा हृदये ते ।
इत्थं क्रोधं त्यज्यदयुगले पतितासु कर्तुं विष्णो नार्हसि वरदो भव नोऽद्य ॥६५॥७॥
बाले दीने स्त्रीजनविमले तनये श्व नो कुर्वन्त्यन्यं बहुविभवज्ञा मतिसंतः ।
क्रूरं क्रोधं त्वं त्यज वरदो भव नोऽद्य बार बार करकमलैस्त्वां प्रणामम् ॥६६॥८॥
हे नाथ राघव रमेश्वर रावणारि सीतापते रिपुनिषूदन कञ्जनेत्र ।
त्वं देहि राम निजदर्शनमद्य विष्णो दुःखार्णवान्नस्तर नय कामिनीर्नः । ६७॥९॥
भवत्पादपद्मवरसेवनमर्थयामो जन्मान्तरे कुरु दयां करुणासमुद्र ।
नोचेत्तवाद्य विरहाद्विजनास्तितानि त्यक्ष्याम एव नियतं महताऽद्य नद्याम् ॥६८।१०॥
श्रीरामदास उवाच
नारीगीतं राघवोऽपि श्रुत्वा प्रत्यक्षीऽभूत्कामिनीनामथाग्रे ।
दृष्ट्वा रामं ताः स्त्रियाऽतिसंतुष्टाः प्रोत्फुल्लास्यास्तं प्रणेमुः शिरोभिः ॥६९॥११॥
नारीगीतं मानवश्चापि श्रुत्वा समान् कामान्प्राप्नुयान्निश्चयेन ।
तस्मादेतन्सर्वदा कीर्तनीयं श्लोकार्धाद्यं प्राप्य छन्दांश्चतस्रः ॥७०॥१२॥
अच्छे वरदान देकर हमारी भी कामना पूर्ण कर। हम किया अगले जन्ममें ही आपकी सेवा करना चाहती हैं ॥६२। ३॥ हमने करुणावश अथवा चञ्चलतास कोई अपराध किया हो तो उस आप भूल जायें । मेरे प्राण आपके दर्शनार्थ आकुल हैं। इस समय हम आपके दर्शन का ही भीख मांग रही हैं ॥६२ ॥ ४ ॥ हे राघव ! आप नाराज न हों और दाक्षिण्योपर क्रोध न दिखलायं । हम सब आपस कामवासनाकी पूर्ति नहीं चाहती ॥ ६३ ॥ ५ ॥ इस समय आप हमें अपना दर्शन और दूसरे जन्मके लिय वरदान दें। हम सब आपकी शरणमे हैं। आप हमारी रक्षा करक हमारा निस्तार करिए। हम आपको प्रणाम करती हैं ॥ ६४ ॥ ६॥ हे राम ! क्या आप इतने निर्दयो हैं कि जो हम स्त्रियोंको इस प्रकार दुःखी देखकर भी आपके हृदयमे दया नहीं आती ? हे विष्णो ! आपके पैरोंमे पड़ी हुई हम अबलाओपर आपको इस प्रकार कोप नहीं करना चाहिए। हमपर दया करके हमें वरदान दीजिए । ६५ । ७ । बुद्धिमान् लोग बच्चोंपर, गरीब स्त्रियोंपर तथा अपनी सन्तानपर इस प्रकार कोप नहीं किया करने, इस कारण अपने क्रूर कोपका प्रत्याहार कीजिए । हम सब हाथ जोडकर प्रणाम करती हैं, हमें वरदान दीजिए । ६६ ॥ ७॥ हे नाथ ! हे राघव ! हे रमेश्वर ! हे रावणारि ! हे सीतापते ! हे रिपुनिषूदन ! हे कञ्जनत्र ! हे विष्णो ! हे राम ! अपना दर्शन देकर आप हम कामिनियोंको दुःखसंसारसे पार कीजिए॥६७॥६॥ हे करुणाके समुद्र ! अब दया कीजिए। हम दूसरे जन्ममें आपकी सेवा करनेकी इच्छुक हैं । हम आपसे यही भिक्षा माँगती हैं। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो आपके विरहदुःखसे दुःखित हम सब स्त्रियाँ इसी गण्डकी नदीमें कूदकर अपन प्राण त्याग देंगे ६८ । १० ॥ रामदासने कहा- इस प्रकार उन कामिनीयोंका विलाप सुनकर रामचन्द्रजी उनके सामने प्रकट हो गये। रामको प्रत्यक्ष देखकर वे स्त्रियाँ बहुत प्रसन्न हुई ओर विकसित वदन होकर बार बार प्रणाम करने लगीं ॥ ६९ ॥ ११ ॥ प्रत्येक मनुष्य इस नारीगीतको सुनकर अपनी अभिलषित कामनाएं पूर्ण कर सकता है। इसलिए लोगोको चाहिए कि सदा इस नारीगीत-