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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 473 of 811

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Page 473

सर्ग १२] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४१०


श्रीरामचन्द्र उवाच

वरान् दास्यामि युष्माकं नान्यं श्रोष्यामि किंचन । इत्युक्ताः पुनरूचुस्ताः किं त्वं वदसि राघव ॥२५॥

ता ऊचुः

दिव्यौषधं ब्रह्मविद्यो रसायनं सिद्धिनिधिः साधुकुला वरांगनाः ।
मन्त्रस्तथा ऽन्नजले च धर्मतो नेमे निषेध्याः सुधिया मयागताः । २६॥
कार्यं तु देवाद्यदि सिद्धिमभ्येतं तस्मिन्नुपेक्षां न च यान्ति नीतिगाः ।
यस्मादुपेक्षा न पुनः फलप्रदा तस्मान्न दीर्धीकरणं प्रशस्यते ॥२७
स्नेहानुगताः सुजनजन्मनिर्मलाः स्नेहार्द्रचित्ताः सुगिरः स्वयङ्गताः ।
कान्ताः सुरूपाः परिपूर्णयौवना धन्या लभन्तेऽत्र नरास्तु नेतरे ॥२८।
क्व वयं भूमिपादेयंः क्वैकपत्नीव्रतं तव । तस्मादस्मानिदानीं त्वं न निराकर्तुमर्हसि ॥२९॥
गान्धर्वेण विवाहेन नान्यथा भोऽस्तु जीवितम् । श्रुत्वा वाक्यं तु तासानां राघवः प्राह ताः पुनः ॥३०॥
भो मृगाक्ष्यः कथं त्यक्त्यो धर्मो धर्मविचक्षणैः । धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चैतत्चतुष्टयम् ॥३१॥
यथोक्तं सकलं ज्ञेयं विपरीतं तु निष्फलम् । तस्मान्मयोक्तं यत् पूर्वमेकपत्नीव्रतं निजम् ॥३२॥
अस्मिन् जन्मनि तन्नाहं त्यक्तुमिच्छामि भोः स्त्रियः ।
एवं श्रुत्वाऽऽशयं तस्य ताः सर्वाश्च परस्परम् ॥३३॥
करात्कराम् प्रमुच्याथ जगृहुर्धरि ततःपदाः । अन्येष्वपि तथारभ्य हुती तु जगृहुश्च ताः ॥३४॥
एवं तैर्विनिवार्यमात्मानं वीक्ष्य राघवः । अन्तर्धानमगात्तत्र तासां मध्ये क्रमात् प्रभुः । ३५॥
किं कुर्वन्ति स्त्रियः सर्वा हन्तर्धाने गते मयि । एवं रामा कौतुकं हि गुरुपुत्रे ददर्श कः ॥३६॥


इसकी प्रबलतासे स्वयं प्राप्त हुआ । २२ ।। २३ ।। विविध प्रकारके भोगोंका उपभोग करेंगे तो इसमें सन्देह नहीं है कि वह मर्त्यलोक ही आपके लिये स्वर्ग बन जायगा । उनकी बात सुनकर घबराये हुए रामचन्द्रजी कहने लगे कि सिवाय वर मांगनेके मैं तुम्हारा एक बात भी नहीं सुनूँगा । रामके ऐसा कहनेपर उन स्त्रियोंने कहा— हे राघव ! आप यह क्या कह रहे हैं ? ॥२४।२५॥ दिव्य औषधि, ब्रह्मको जाननेके सम्बन्ध रखनेवाली वाणी, रसायन, सिद्धिके खजाने, निधियां, अच्छी कलायें, अच्छी स्त्री और अन्न-जल पाकर सज्जनजन कभी नहीं छोड़ते ॥ २६ ॥ जो कोई कार्य दैवात् सिद्ध हो सकता है तो नीतिज्ञ जन उसकी कभी उपेक्षा नहीं करते । फिर उसकी उपेक्षा करनेसे कोई लाभ नहीं हो तो उसकी उपेक्षा ही क्यों की जाय । अथवा आडम्बर बढ़ानेकी क्या आवश्यकता ? ॥ २७॥ बड़े प्रेमयुक्त, अच्छे कुलमें उत्पन्न, जिनका चित्त स्नेहस आर्द्र हो गया हो, जो अच्छी-अच्छी बातें करती हों, जो वरके पास स्वयं आ पहुँची हों, जिनका सुन्दर स्वरूप हो और जिनका यौवन भी पूरी तरह उमड़ आया हो। ऐसे स्त्रियोंको जो लोग पाते हैं, वे धन्य हैं। साधारण श्रेणीके लोग ऐसी स्त्रियोंको नहीं पाते ॥ २८ ॥ कहाँ हम जैसी सुन्दरी स्त्रियां और कहाँ आपका एकपत्नीव्रत । इस कारण हम फिर भी कहती हैं कि आप हमारा निरादर न कीजिए ॥ २९ ॥ बिना आपके साथ गन्धर्व विवाह किये हम लोग नहीं जी सकेंगी । उनका बात सुनकर रामने कहा। श्रीराम बोले— हे मृगके समान नेत्रोंवाली स्त्रियो ! तुम- कैसे यह कह रही हो कि कामको मुख्य देखकर धर्मका परित्याग कर दो। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पदार्थ हैं। यदि एकके बाद एकका अच्छी तरह साधन किया जाता है तो वह सफल होता है। अन्यथा निष्फल हो जाता है अथवा विपरीत फल देनेवाला होता है । अतः जो मैंने अपने एकपत्नीव्रतका कारण बतलाया है, उसका परित्याग नहीं कर सकता। इस प्रकार रामका आशय जानकर वे आपसमें एक दूसरेका मुँह देखने लगीं ॥ ३०-३३ ॥ तदनन्तर हाथ छोड़कर स्त्रियोंने रामका पैर पकड़ लिया, किन्तु कुछ स्थिति होने भी पकड़ न पा ॥ ३४ ॥ इस तरह उन लोगोंसे अपनीको घिरा हुआ देखकर राम वहाँ ही अन्तर्धान हो गये ।