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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 470 of 811

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Page 470

४५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ११

वसन्तेऽग्रे नृपाणां च वैश्यानां बालिकाः प्रभो । वायुपर्णाशनाः सर्वाः श्रीविष्ण्वर्पितमानसाः ॥५७॥
तत्तासां वचनं श्रुत्वा भिन्नरूपैः पुनः प्रभुः । ता उवाच स्त्रियः सोऽहं विष्णुरेव न संशयः ॥५८॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा पुनस्ता भपमब्रुवन् । दर्शयस्व निजं विष्णुरूपं चेन्मन्यवागसि ॥५९॥
ततस्ता दर्शयामास विष्णुरूपं निजं प्रभुः । तानि चत्वारि रूपाणि पगवर्थ्य रघूत्तमः ॥६०॥
ततस्ताः पुरतो विष्णुं दृष्ट्वा नेमुः स्वमस्तकैः । ततो विष्णुः स ताः प्राह वः संदेहो गतो न वा ॥६१॥
ता ऊचुर्दर्शनात्तेऽद्य भवक्लेशा गता हि नः । कियत्किंतु तत्र संदेहस्त्वज्ञानाजजनितः प्रभो ॥६२॥
ततः पुनः क्षणाद्रामो रूपं ता दर्शयन्मुदा । एकमेव हि सर्वासां मध्ये जनकजापतिः ॥६३॥
ततो रामोऽब्रवीत्ताः स वरं वरयतामिति । ता ऊचुः कामबाणेन पीडिता राघवं मुदा ॥६४॥
भव भर्ता त्वमेवाद्य गांधर्वविधिना वने ।
अस्माभिश्च कुरुष्वात्र सुखं क्रीडां चिरं प्रभो ॥६५॥
ततो नय पुरीं स्वीयां नस्त्वं भाव्यद्यद्विचितप । तत्तासां वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥६६॥
एकपत्नीव्रतं मेऽस्ति न शक्नोम्यत्र वै मृषा । ततस्ता विह्वला भूत्वा निपेतुर्जगतीतले ॥६७॥
पुनस्ताः प्राह रामः स शृणुध्वं वचनं मम । द्वापरे कृष्णरूपेण यूयं क्रीडां भजिष्यथ ॥६८॥
मित्रविंदा नाग्नजिती भद्राऽन्या लक्ष्मणाव्हया एवं नामानि युष्माकं भविष्यंति तदा मया ॥६९॥
भविष्यंति विवाहाश्च सर्वासां नात्र संशयः । तदा नानाविधान् भोगान् भजध्वं वै मया सह ॥७०॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा किंचित्तुष्टमनाः स्त्रियः । रामं प्रोचुः पुनर्वोक्यं त्वमग्रे गन्तुमर्हसि ॥७१॥
ताभिः शनैस्ततो रामो ययौ तुरगमस्थितः । योजनोपरि सः सर्वाः सहस्रं षोडशाः शुभाः ॥७२॥

था कि जिस आपके सिवाय किसी अन्य व्यक्तिम हटनेका सामर्थ्य नहीं था, वह हम लोगोंका इस कन्दराम डालकर कहीं चला गया है। तदनन्तर हम ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्योंकी कन्याएं यहां पड़ी हुई हैं। वायु तथा वृक्षोंका पत्तियां हमारा भाजन है और श्रीविष्णुभगवान्‌के चरणाम हमन अपने मन लगा दिया है। इस प्रकार उनकी बात सुनकर सबके समक्ष एक-एक स्वरूपसे खड़े श्रीरामचन्द्रजीने कहा कि जिस विष्णुम तुमने अपना मन लगा रखा है, वह मैं ही हूं। रामका बात सुनकर उन स्त्रियोने कहा कि यदि तुम यह सच कह रहे हो तो अपना विष्णुरूप हम दिखाओ, इसके अनन्तर भगवान्‌ने अपने उन चारों स्वरूपोंको अपनम समट लिया और विष्णुरूपसे सबका दर्शन दिया। जब उन्होंने विष्णुभगवान्‌को अपन सम्मुख देखा तो मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। विष्णुभगवान्‌ने उनसे पूछा कि अब तो तुम्हारा सन्देह निवृत्त हुआ? उन्हान कहा कि आपके इन पुनीत दर्शनास मग सब क्लेश दूर हा गया तो फिर अज्ञानसे जायमान सन्देहक विषयम क्या कहना है ॥ ५५-६२ ॥ क्षणभरके बाद में फिर रामके स्वरूपस उनके सम्मुख खड़े दिखाई दिये और उनसे बाल कि तुम लागोकी जा इच्छा हो, वह वर मांगो। तब कामबाणस पीडित होकर उन स्त्रियान कहा कि यदि आप हमारे ऊपर प्रसन्न हैं तो हम लागांक साथ गान्धर्व विवाह करके हमारे पति बनिये और अधिक समयतक आनन्दपूर्वक इस कन्दराम हम लागोंके साथ विहार कीजिए। उनके यह प्रार्थना सुनकर रामन कहा कि ऐसा ता नहीं हा सकता। क्योंक मे एकपत्नीव्रतवचारी हूं। मै कभी झूठ नहीं बाल्ता, तुमस सच कह रहा हूं यह बात सुनते ही व स्त्रियां मूछित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ६३-६७ ॥ ऐसी दशाम राम उनका समझाते हुए कहन लगा- इस प्रकार अधीर न होकर मेरी बात सुनो । अभो तो नहीं द्वापर युगमें कृष्णरूपसे मैं तुम लोगोंक साथ विहार करूंगा। मित्रविन्दा, नाग्नजिती, भद्रा तथा लक्ष्मणा इस प्रकार तुम लाग का नाम पड़ेगा और उस समय तुम सबका विवाह मेरे साथ होगा। इसम कोई सन्देह नहीं है। उस समय तुम सद मेरे साथ नाना प्रकारके सुख भोगना। रामकी बातोंको सुनकर उनका मन कुछ सन्तुष्ट हुआ और कहा कि अब आप चाहे तो जा सकते हैं। राम उन चारों कन्याओंके साथ धीरे-धीरे आगे बढ़। एक योजन आगे जाकर गण्डका नदाक किनार एक झाड में