श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in context| ५५० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १० |
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दत्त्वा गेहमुल्लूकाय ययौ रामो निजां पुरीम् । विवेश नगरीं नृत्यवाद्यगीतपुरःसरम् ॥१४१॥
शिशुं विप्रं क्षत्रियं च वैश्यं चापि चतुर्थकम् । तैलकारं पञ्चमं च लोहकारस्नुषां तथा ॥१४२॥
चर्मकारदुहितरं सप्तैतान्हि सुजीवितान् । दृष्ट्वा रामः समायातानात्मानं द्रष्टुमादरात् ॥१४३॥
तुतोष नितरां पत्न्या तैः सर्वैः संस्तुतो मुहुः । ततः संपूज्य तान् सर्वान् विससर्ज रघूद्वहः ॥१४४॥
तदा महोत्सवश्चासीदयोध्यायां समन्ततः । एवं नानाचरित्राणि चकार रघुनन्दनः ॥१४५॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे
यतिशूद्रगृध्रशिशूपाकरणं नाम दशमः सर्गः ॥१०॥
एकादशः सर्गः
( चार विप्रकन्याओंको रामका वरदान )
श्रीरामदास उवाच
अथैकदा रामचन्द्रो मृगयार्थं वनं ययौ । सीतया बन्धुभिः सैन्यैर्हस्त्यश्वरथपत्तिभिः ॥१॥
पश्यन् वनानि सर्वाणि मृगयारसिको भृशम् । कौतूहलसमाविष्ट आखेटव्यूहसंवृतः ॥२॥
उपानद्गूढपादश्च नीलोष्णीषी हरिच्छदः । नीलगोधांगुलित्राणो धनुष्पाणिः शरी नृपः ॥३॥
अश्वारूढः खङ्गचर्मधारी भूपै पदातिभिः । वेष्टितः कवची रामो विवेश गहनं वनम् ॥४॥
सीतया जालरन्ध्रैश्च वारं वारं निरीक्षितः । स रामो बन्धुवर्गैश्च पुत्राभ्यां नृपसत्तमैः ॥५॥
क्रीडां तदाऽकरोत्तत्र कुञ्जेषु मृगयन्मृगान् । इम्यतां इम्यतामेषो मृगो वेगात्पलायते ॥६॥
इति जल्पन् स्वभृत्येषु स्वयमुत्पत्य हन्ति च । गंधारेषु च रम्येषु वनेषु विपुलेषु च ॥७॥
उल्लङ्घितमहाश्रोता युवा पञ्चास्यविक्रमः । इतस्ततः पुनर्याति क्वचित्पश्यन् वनस्थलीम् ॥८॥
दण्ड देकर घोंसला उलूकको दे दिया और वहाँसे अपनी अयोध्या नगरीकी ओर चल पड़े। अयोध्यामें पहुँचे तो क्या देखा कि वहीं नाच-गान हो रहे हैं। ब्राह्मणका लड़का, मधुरपुरवाला ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तेली एवं लोहारकी पतोहू तथा चमारकी लड़की ये सब जीवित होकर रामके दर्शनोंको खड़े हैं। उनको जीवित देखकर सीता समेत राम अत्यन्त प्रसन्न हुए । वहाँ पहुँचे तो लोगोंने रामकी स्तुति की और रामने भी उनका सत्कार करके उनके ग्रामोंको भेज दिया। उस समय अयोध्या घरमें चारों ओर उत्सव ही उत्सव दीखता था। इस तरह राम अनेक प्रकारकी लीलायें करते रहते थे । १३६-१४५॥ इति श्रीमत्कोटिराम-चरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे दशमः सर्गः ॥१०॥
श्रीरामदास कहने लगे—इसके बहुत दिनों बाद रामचन्द्रजी एकसमय शिकार खेलनेके लिए सीता तथा भ्राताओं और बहुतसे हाथी-घोड़े आदिको साथ लेकर वनमें गये। मृगयाके आनन्दसे आनन्दित होकर वे बहुतसे वनोंको देखते हुए इधर-उधर घूम रहे थे। उस समय उनके साथ शिकार खेलनेवाले भीलोंका एक बहुत बड़ा दल था । रामचन्द्रजी जूता पहने थे, नीले रङ्गकी पगड़ी मस्तकपर बँधी थी हरे कपड़े पहने हुए थे और नीले ही रङ्गकी गोधांगुली उँगलियोंमें बँधी थी। हाथमें धनुष-बाण धारण किये थे, १-३॥ वे घोड़ेपर सवार थे, तलवार और ढाल बगलमें झूल रही थी। बहुतसे पैदल चलनेवाले राजे उनके साथ थे और उनके शरीर पर कवच पड़ा था। इस प्रकारका वेश धारण किये वे गहन वनमें जा पहुँचे। उस समय सीता पालकीकी खिड़कियोंसे रामकी ओर निहार रही थीं और रामचन्द्रजी अपने भ्राताओं और मित्रोंके साथ कुञ्जोंमें मृगोंको ढूँढ़ते हुए हर्षपूर्वक मृगया कर रहे थे। कभी-कभी 'मारो-मारो, यह मृग वेगसे भागा जा रहा है' इस प्रकार चिल्ला पड़ते । यदि कोई उसे मारनेको नहीं पहुंच पाता तो वे उसे स्वयं मार दिया करते थे। एक