श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 451 of 811
Read in context| सर्गः ९ ] | राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) | ४३५ |
|---|
वर्षे सरिच्छैलाः सन्ति बहवः ॥ ४५ ॥ तद्यथा मलयो मङ्गलप्रस्थो मैनाकस्त्रिकूटः ऋषभः कूटकः सह्यो देवगिरिर्ऋष्यमूकः श्रीशैलो वेंकटो महेंद्रो वारिधरो विंध्यः शक्तिमानृक्षगिरिः पारियात्रो द्रोणश्चित्रकूटो गोवर्धनो रैवतकः ककुभो नीलो गोकामुख इन्द्रकीलः कामगिरिरित्यन्ये च शतसहस्रशः शैलास्तेषां नितम्बप्रभवा नदा नद्यश्च संत्यसंख्यताः ॥ ४७ ॥ चन्द्रवशा ताम्रपर्णी अवटोदा कृतमाला वैहायसी कावेरी वेणी पयस्विनी शर्करावती तुंगभद्रा कृष्णा वेणा भीमरथी निर्विन्ध्या पयोष्णी तापी मही सुरसा नर्मदा चर्मण्वती सिंधुः शोणश्च नदौ महानदी वेदस्मृतिः ऋषिकुल्या त्रिसामा कौशिकी मंदाकिनी यमुना सरस्वती दृषद्वती गोमती सरयू रोधस्वती सप्तवती सुषोमा शतद्रुश्चन्द्रभागा मरुद्वन्धा वितस्ता असिक्नी विश्वेति महानद्यः । ४८ । एवं शिष्य रघुनायको नायकः सोपदीपं जम्बूद्वीपं स्ववशं कृत्वा लक्षयोजनविस्तीर्णं जंबूद्वीपपरिखोपमं समुल्लंघ्य पुष्पकस्थः प्लक्षं नाम द्वितीयं द्वीपं ददर्श ॥ ४९ ॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकांडे पूर्वार्धे जंबूद्वीपजयो नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
नवमः सर्गः
( राम द्वारा प्लक्षादि छः द्वीपोंकी विजय )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामो ययौ श्रीमान् प्लक्षद्वीपं मनोरमम् । द्विलक्षयोजनमितं सप्तवर्षसमन्वितम् ॥ १ ॥
उपास्यो यत्र वै सूर्यो ब्राह्मणैश्च शुपामकाः । द्वीपाख्याकृच्च यत्रास्ति प्लक्षवृक्षो हिरण्मयः । २ ॥
यथाऽऽरामाद्बहिर्नीयाः परिखाश्च समंततः । जंबूद्वीपाच्च क्षारोदोऽद्विद्व्रीपस्तथा त्वयम् ॥ ३ ॥
॥ ४४ ॥ उनमेंस सीता पूर्व समुद्रमें, चक्षुर्भद्रा पश्चिम समुद्रमें और अलकनन्दा दक्षिण समुद्रमें जाकर मिलती है ॥ ४५ ॥ भारतवर्षमें भी बहुत-सी नदियां और पर्वत हैं, ४६ ॥ मलय, मंगलप्रस्थ, मैनाक, त्रिकूट, ऋषभ, कूटक, सह्य, देवगिरि, ऋष्यमूक, श्रीशैल, वेंकट, महेन्द्र, वारिवर, विन्ध्य, शक्तिमान्, ऋक्षगिरि, पारियात्र, द्रोण, चित्रकूट, गोवर्धन, रैवतक, ककुभ, नील, गोकामुख, इन्द्रकील और कामगिरि ये पर्वत हैं। इनके अतिरिक्त और भी बहुत से पर्वत हैं, जिनकी तलैटीसे बहुतसे नद और नदियां निकली हैं। जैसे— ॥ ४७ । चन्द्रवशा, ताम्रपर्णी, अवटोदा, कृतमाला, वैहायसी, कावेरी, वेणी, पयस्विनी, शर्करावती, तुङ्गभद्रा, कृष्णा, वेणा, भीमरथी, गोदावरी, निर्विन्ध्या, तापी, मही, सुरसा, नर्मदा, चर्मण्वती। सिंधु और शोण ये दोनों महानद हैं। वेदस्मृति, ऋषिकुल्या, त्रिसामा, कौशिकी, मन्दाकिनी, यमुना, सरस्वती, दृषद्वती, गोमती, सरयू, रोधस्वती, सप्तवती, सुषोमा, शतद्रू, चन्द्रभागा, मरुद्वन्धा, वितस्ता, असिक्नी और विश्वा ये महानदियां हैं ॥ ४८ । हे शिष्य ! इस प्रकार उपद्वीपों समेत जम्बूद्वीपको अपने वशमें करके राम एक लाख योजन विस्तृत लवणसमुद्र, जो कि जम्बूद्वी पकी खाईके समान था उसे पार करके पुष्पक विमान द्वारा प्लक्ष नामके एक दूसरे द्वीपमे जा पहुंचे ॥ ४९ । इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते आनन्दरामायणे राज्यकांडे पूर्वार्धे अष्टमः सर्गः । ८ ॥
श्रीरामदासने कहा—इसके बाद श्रीमान् रामचन्द्र अतिशय मनोरम प्लक्षद्वीपको गये, जो दो लाख योजन विस्तृत था और उसमे सात देश थे । १ ॥ वहां सबके आराध्य देवता सूर्य और देवाराधक ब्राह्मण थे। वहाँ सुवर्णका एक बड़ा-सा प्लक्ष (पाकड) का वृक्ष था और उस प्लक्षके ही कारण उसका प्लक्षद्वीप नाम पड़ा था ॥ २ ॥ जिस तरह किसी बगीचेके चारों ओर खाई बना दी जाय, ठीक उसी तरह उसको चारों ओरसे