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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 45 of 811

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Page 45

मर्गः ३ ] बालकाण्डम् २९

तथा कृत्रिमवृक्षांश्च पताकाश्च प्रजांस्तथा । वह्निप्रद्योतदीर्घाणां पुष्पवृक्षविनिर्मिताम् ॥३०६॥
तडिन्प्रभोषमांश्चापि गगनान्तर्विगर्जिनन् । वह्निप्रद्योतधाम्न्याः प्राकारान् विविधान् वरान् ॥३०७॥
चंद्रज्योत्स्नाकृत्रिमांश्च दीपवृक्षांन् सहस्रशः । हारमालाश्च व्याघ्रादीन्कृत्रिमान् रशमींस्तथान् ॥३०८॥
औषधीभिः पूरितांश्च केकोचकोपमादिकान् । ददृशुस्तंगणेंद्रव्या एवं ते राघवादयः ॥३०९॥
तदा देवा विमानस्था ददृशुः कौतुकं मुदा । एव नानोत्सवैरैतान् पपुर्जनकमंदिरम् ॥३१०॥
अवरुह्य गजेन्द्रेभ्यस्तस्थुस्ते मंडपांगणे । मधुपर्कविधानानि विष्टरादीन् च क्रमात् ॥३११॥
तयोर्गुरू चक्रतुस्तां वसिष्ठगौतमत्मजौ । वाल्मीक्यादिमुनिगणैर्वेष्टितौ तुष्टमानसौ ॥३१२॥
ततः पूजां वधूनां च पुत्रा दशरथो नृपः । चकार गुरुणा युक्तस्तदा स मंडपाङ्गणे ॥३१३॥
ततो लग्नमुहूर्ते तान् वशंमिश्र पुरस्कृतन् । वेदिकासु स्थितान् कृत्वा दम्पत्योरंतरे पटान् ॥३१४॥
कृत्वा मंगलघोषांश्च मुनिभिश्चकृतुर्गुरुः । तदा तूष्णीं सभायां ते शुश्रुवुःसकला जनाः ॥
दूर्वाद्यैः क्षीरधान्यैश्च वधूपुत्रन्वतीन् स्त्रियः ॥ ३१५ ॥
ओंडैवातपयो शिवः सुखकरो मित्रः शशा रूपनः सर्वं ते मुनयश्चना दद्यु दिशः सर्वा मृगेंद्राः खगाः ।
नद्यःपुण्यसरोवरोर्गण दितिजास्तीर्थानि कंजामनश्चेंद्रा वह्नमरा नटी जलधयः कुर्वंतु वो मंगलम् ३१६॥
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चंद्रबलं तदेव । विद्याबलं दैवबलं तदेव कार्यः पतैर्यत्स्मरणं विधेयम् ३१७
एवं मंगलाशब्दैश्च महावाद्यपुरःसरम् । तेषांमतःपटान्मुक्त्वा ॐपुण्योऽस्त्वन्वतूर्गुरू ॥३१८॥
तासां ते पाणिग्रहणविधानं विधिपूर्वकम् । लाजाहोमादिकं सर्वं चक्रुर्मंगलपूर्वकम् ॥३१९॥
तदा महावाद्यघोषा निनेदुर्मंडपांगजे । ननृतुर्वारनार्यश्च जगुर्मागधवन्दिनः ॥३२०॥

मनोहर गिट्टी आदिके बने हुए गमलों, वृक्षों तथा फूल पत्तियोंसे बनी हुई वाटिकाओंको, कृत्रिम वृक्षोंको, पताकाओंको, ध्वजाओंको, बधिक समान जलवान, तडितके समान शभानबल और आकाशमें गरजनेवाले नाना प्रकारके आतिशवाजात सब पुष्पवृक्षतया वाटिका, हजारों चन्द्रमाओकी चान्दनीके कृत्रिम दीपवृक्षोंका, रश्मीमात्राओंका, रशामेरख हुए बनावटी व्याघ्रादिमृग वाटिका, ओषधिसं भरे हुए मोर तथा पक्षी आदिको देखने लगे ॥३०६-३०९॥ सब देवता भी आनन्दसे उस कौतुकको देख रहे थे। इस प्रकार विविध उत्सवों सहित वे राम आदि बालक राजा जनकके भवनको गये । ३१०॥ वहाँ जा तथा हाथियोंस उतरकर वे मण्डपके आँगनम खड हा गय। वाल्मीकि आदि मुनियांस घिर हुए दोनो वधक गुरु वशिष्ठ तथा श्रीमद्गुरु शतानन्दने प्रसन्नतास मधुपर्क (मधुमिश्रित दधि) का विधान और आसन आदिका विधान सम्पन्न करवाया । ३११॥३१२॥ पश्चात् राजा दशरथने गुरु वशिष्ठका साथ लेकर महर्षि बांधी पुत्रवधुओंकी पूजा की। फिर शुभ मुहूर्त तथा शुभलग्न मुनियो तथा गुरुतन उन-उन वधुओं ओर उन उन चार बालकोंको पृथक् पृथक् वेदियोपर बैठाकर उन दम्पत्याक बाचम बन्धक बहकर गङ्गलमय श्लोकोंका उच्चारण किया। सभाके सभ मनुष्य चुप होकर उसे सुनत लगे। दुवाय कलशम् गङ्गोपान चावल तथा फूल वरवधूके ऊपर बरसने लगे ॥ ३१३-३१५॥ तरुदाता दयालय गणपति, सुखकारक शिव, सूर्य, ग्रह राहु, सब मुनि, चल-अचल जीव, दशा दिशाय, सर्प, मृगन्द्र, खग, नदी, पवित्र सरोवर, दत्य, तीथ, ब्रह्मा, इन्द्र, अग्निसहिता तथा नदी-समुद्र आदि तुम लोगांका कल्याण करें ॥ ३१६॥ कोटिपाति आदिनाथका सत्यतल्या स्मरण ही तुम्हार लिए सुन्दर लग्न, शुभ दिन, ग्रहबल, विद्यावल तथा दैवबल बन जाय ॥ ३१७॥ इस मांगलिक शब्दो और मांगलिक बाजाके ध्यान हान लगा। उसके बाद बीचमें धरे हुए बस्त्रोंको हटा दिया गया और दानों बारके गुरुओने "ॐपुण्योऽस्तु" ऐसा कहा ॥ ३१८ ॥ इस प्रकार उन लोगोंने मिलकर विधिपूर्वक उनका विवाहकार्य तथा लाजाका हवन आदि सभी कृत्य मङ्गलपूर्वक संपादित कर दिया ॥ ३१९॥ तब मण्डपकी डंगराडम बडे-बडे बाजोका विनाद होने लगा, वेश्यायें नाचने लगी, भांट और बन्दीजन यशगान करने लगे ॥ ३२० ॥