श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in contextआनन्दरामायणे [ सर्गः ८ ]
शिखरशिरोऽग्रमानं पुष्पकसधिष्ठितो रघुनाथ उपजगाम । ३ । अथ तृतीयं वर्षं नाम नवसहस्र-
योजनपरिमितं नृसिंहोपास्यप्रह्लादोपासकविराजमानमतिकमनीयं दाशरथस्तनयः समनुययौ । ४ ।।
तद्वर्षवासिनृपवरवृन्दतुङ्गसमग्राममप्यादितजयश्रीविपुलोक्षादिसहितनृपदयितागर्भनर्त्तनारिजननजनक-
जादाशितमानकीर्तुकध्वजतोरणतोरणघण्टाकिंकिणीविराजमानपुष्पकमधिष्ठितः श्रीरघुनन्दन उपज-
गाम ।। ५ ।। अथ निषधं नाम पर्वतं द्विसहस्रयोजनविपुलं नवनिंसहस्रायोजनदैर्घ्यमतिकमनीयं स
रघुनन्दनो नयनगोचरं चकार । ६ ।। अथ सुवर्णद्रिमंडनतश्चतुर्दिक्षु समानमानमिलावृतं नाम
चतुर्थं वर्षं चतुस्त्रिंशत्सहस्रयोजनपरिमितं स रघुनायक उपजगाम ।। ७ । तत्र ह वात्र मेरोराश्रय-
भूते मेरोर्दक्षिणदिक्स्थिते मेरुमदारपर्वतेनेतिविराजमाने मयुकृतजम्बूवृक्षमभिविशालं जंबूद्वीपाख्यसूचकं
सफलमपूर्वमतिकमनीयं स रामचन्द्रोऽवनिदुहित्रे दर्शयामास । ८ ।।
ततो मेरुपश्चिमतो मेरोराश्रयभूते सुपार्श्वपर्वते विराजमानकदम्बवृक्षमभिममुन्नतमतिविपुल-
मतिकमनीयं पुष्परराजितं स रघुनायको नेत्रविषयं चकार । ९ ।। अथ मेरोरुत्तरतस्तस्याश्रयभूते
कुमुदनाम्नि पर्वते विराजमानमतिसमुन्नतं वटवृक्षमभिविशालमतिवृद्धं स कौसल्यानन्दनो नृपसमूह-
विराजितो जनकर्जायै दर्शयामास ।। १० ।। अथ मेरुपूर्वतस्तस्याश्रयभूते मन्दरपर्वते विराजमानमति-
विशालमतिसमुन्नतमतिस्थूलं सहकारवृक्षमतिमनायं सुपक्कमधुरघटतुल्यफलभारविनम्रं पश्यन्म
रघुवंशभूषणो जनकज ज निः ।। ११ ।। तत्रेलावृते विराजमानमरूपणोपास्यरुद्रोपासकः स रघुनायको
दयितासहायः शिरसा प्रणनाम ।। १२ ।। तद्वर्षवासिनृपप्रबद्धकमलशिरोवंदितपदजलहृद्वरः स
रघुनायकः पूर्वदिशमनुजगाम । १३ ।। अथ स गन्धमादनपर्वतं द्विसहस्रयोजनविपुलं चतुस्त्रिंशत्-
हस्रयोजनदीर्घं नयनगोचरं चकार ।। १४ ।। अथ भद्राश्वं नाम पञ्चमं वर्षमेकत्रिंशत्सहस्रयोजनदीर्घं
हयग्रीवोपास्यभद्राश्वोपासकसमधिष्ठितं स रघुनायक उपजगाम । १५ ।। तत्र कश्चित्संग्रामस्तद्वर्ष-
विराजमाननृपसमूहैभ्यः कश्चिच्छरणागतप्रबद्धकरायुगलावर्तिपतिभ्यः स्वकरभारामत्समपाद स
तथा इतना ही हजार योजन लम्बा था, जिसपर अनेक प्रबन्नों के थान विद्यमान् थीं। जिसके ऊंचे-ऊंचे शिखर आकाशसे बात कर रहे थे ।। ३ ।। उसके आगे तीसरे वर्षमें गये, जो नृसिंह भगवान्के भक्त प्रह्लादका बसाया हुआ था । ४ ।। उस देशके राजाओंका बहुत संग्राम करके राम उनको परास्त करत हुए शत्रुओकी सम्पत्ति अपने अर्थ में करते सीतोके मार्गमें दिखाय उस देशके राजाओंके दिये हुए बहुत ही ध्वजा पताका, तोरण, घंटा और किंकिणीसे मण्डित पुष्पकविमानपर बैठकर आगे बढ़े ।। ५ ।। इसके अनन्तर दो हजार योजन विस्तृत तथा नौ हजार योजन लम्बा अति सुन्दर निषध नामक पर्वतको देखा ।। ६ ।। उसके आगे चारों ओर सुवर्ण पर्वतोसे परिवेष्टित इलावृत नामक चतुर्थ देशमें गये। जो चौवालिस हजार योजन लम्बा-चौड़ा था ।। ७ ।। वहाँ सीताको समग्र देशके दक्षिण ओर खूब ऊंच और अतिशय विशाल जम्बू-द्वीपको सूचित करनेवाले एक बड़े भारी जामुनके वृक्षको दिखाया । ८ ।। इसके अनन्तर पश्चिमकी ओर सुपार्श्व पर्वतपर बड़े भारी कदम्ब वृक्षको देखा, जो बहुत ऊँचा और पुष्पोंसे लदा हुआ था । ९ ।। इसके अनन्तर मेरुके उत्तर ओर कुमुद नामक पर्वतपर अतिशय विशाल अत्यन्त एक वटवृक्ष सीताको दिखाया ।। १० ।। मेरुके उत्तर ओर एक पासवाले मंदर पर्वतपर स्थित खूब लम्बे चौड़े, खूब पके तथा घटके बराबर फलोंसे लदे एक आम्रवृक्षको देखा ।। ११ ।। उस इलावृत्तमे वलरामोपासके पूज्य श्रीभगवन्तरुद्रको सीताके साथ रामने प्रणाम किया ।। १२ ।। उस देशके निवासी राजाओंने हाथ जोड़कर रामको प्रणाम किया और राम वहाँसे आगे पूर्व दिशाकी ओर बढ़े ।। १३ ।। तदनन्तर वे गन्धमादन पर्वतपर पहुंचे, जो दो हजार योजन चौड़ा तथा चौतीस हजार योजन लम्बा था ।। १४ ।। तदनन्तर भद्राश्व नामक पांचवें देशमें पहुंचे, जो एक-तीस हजार योजन लम्बा था और वहाँ हयग्रीवके उपास्य भद्राश्व भगवान रहते थे ।। १५ ।। उस देशके बहुतसे