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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 442 of 811

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Page 442

४२६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

लवणं नाशयिष्यामि गच्छंतु विगतज्वराः । इत्युक्त्वा प्राह रामोऽपि शत्रुघ्नं सदसि स्थितम् ॥७८॥
अद्य त्वामभिषेक्ष्यामि मधुरागाज्यकारणात् । तद्रामवचनं श्रुत्वा शत्रुघ्नो वाक्यमब्रवीत् ॥७९॥
नाङ्गीकरोम्यहं राज्यं त्वं मा निजपदात्प्रभो । न दूरं कुरु राजेन्द्र प्रार्थयामीति ते मुहुः ॥८०॥
तत्तस्य वचनं श्रुत्वा शत्रुघ्नस्य रघूत्तमः । तथैव भरतं प्राह न सोऽप्यङ्गीचकार तत् ॥८१॥
ततो रामः सुबाहुं च यूपकेतुं द्विजैर्नृपैः । अभिषिच्याब्रवीद्वाक्यं शत्रुघ्नं पुरतः स्थितम् ॥८२॥
दत्त्वा तस्मै शरं दिव्यं निजनामाङ्कितं शुभम् । अनेनैव हि बाणेन लवणं लोककंटकम् ॥८३॥
हनिष्यसि क्षणादेव वृत्रं देवपतिर्यथा । स तु संपूज्य तं शूलं गेहे गच्छति काननम् ॥८४॥
भक्षणार्थं हि जंतूनां धार्यं कर्तुं समुद्यतः । स तु नायाति सदनं यावद्धनचरो भवेत् ॥८५॥
तावदेव पुरद्वारि तिष्ठ त्वं धृतकार्मुकः । योत्स्यते स त्वया क्रुद्धस्तदा बाणेन घानय ॥८६॥
अनेनैकेन बाणेन क्षणादेव मरिष्यति । तं हन्त्वा लवणं क्रूरं तद्वने मधुमन्दिते ॥८७॥
निर्माय मथुरानाम्नीं नगरीं यमुनातटे । तस्यां स्थाप्य सुबाहुं वै पत्नीभ्यां बालकैः सह ॥८८॥
यूपकेतुं च विदिशानगरे ऽशत्रुनिषूदन । संस्थाप्य दयिताभ्यां च सैन्येन बालकैः सह ॥८९॥
ततो ममान्तिकं याहि शीघ्रं शत्रुनिषूदन । अश्वानां पञ्चसाहस्रं रथानां च तदर्द्धकम् ॥९०॥
गजानां षट्सतान्येव पत्तीनामयुतत्रयम् । आगमिष्यन्ति त्वत्पश्चादग्रे साधय राक्षसम् ॥९१॥
मागते त्वयि पश्चाद्धि नृपान् जेतुं पुनस्त्वहम् । गन्तुमिच्छामि तस्मात्त्वं शीघ्रमागच्छ मां प्रति ॥९२॥
इत्युक्त्वा मूर्द्धन्यवघ्राय शत्रुघ्नं रघुनन्दनः प्रेषयामास तैर्वैप्रैराशीर्भिरभिनन्दितः ॥९३॥
शत्रुघ्नोऽपि नमस्कृत्य रामं मधुवनं ययौ । निनाय पूजनात्थं तां मूर्ति सोऽप्यात्मनः प्रियाम् ॥९४॥
अग्रे संप्रेष्य शत्रुघ्नं ततः श्रीरघुनन्दनः । सुबाहुयूपकेतू तौ स्वस्वस्त्रीभ्यां च बालकैः ॥९५॥

हैं । मुनिश्रेष्ठ च्यवनकी बात सुनकर रामने कहा हे ऋषियों आप लोग मत डरें ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ आप सब अपने-अपने आश्रमको जाते जायें । मैं उस दुष्ट लवणासुरको मारूँगा । उनसे इतना कहकर राम शत्रुघ्नसे बोले—शत्रुघ्न ! आज मैं तुम्हारा अभिषेक करके तुम्हें मथुरा राज्यको भेजूँगा। उत्तरमें शत्रुघ्नने कहा- हे राजेन्द्र ! मुझे राज्य नहीं चाहिए । मेर ऊपर कृपा करके आप मुझे अपने चरणोंसे दूर न कीजिए । इसके बाद रामने वही बात भरतसे कही और उन्होंने भी अस्वीकार कर दिया ॥ ७८-८१ । तब रामने सुबाहु और यूपकेतुको तैयार करके अनेक ब्राह्मणोंके साथ उनका अभिषेक किया और सामने बैठे हुए शत्रुघ्नको अपने नामसे अङ्कित बाण देते हुए कहा कि लोगोंके लिए कंटकस्वरूप लवणासुरको तुम इसी बाणसे क्षण भरमें उसी तरह मार डालोगे, जैसे इन्द्रने वृत्रासुरको मारा था। वह लवणासुर सदा घरमें उस त्रिशूलका पूजन करके जङ्गलमें पशुओंको मारनके लिए चला जाया करता है। सो तुम ऐस ही समय उसके घर पहुंचो, जब वह वनको चला गया हो । उनके द्वारपर तबतक बैठे रही, जबतक वह वनसे न लौट आये । जब वह आये तो उसे भीतर जानेका अवसर मत दो, द्वारपर ही छेड़-छाड़ करके युद्ध शुरू कर दो। वह भी तुरन्त क्रोधातुर होकर लड़ने लगेगा सब तुम इसी बाणसे उसे क्षणभरमे मार डालोगे। उस दुष्ट लवणासुरको मारकर मधुवनमें ॥८२-८७॥ यमुना नदीके तटपर मथुरा नामकी नगरी बसा तथा उसमें स्त्री-बच्चों समेत सुबाहुको बिठाकर विदिशा नगरीमें बच्चों तथा सेनाके साथ जाकर यूपकेतुको राजगद्दीपर बिठा देना। यह सब काम करके हे शत्रुनिषूदन ! तुम फिर मेरे पास लौट आओ । तुम आगे-आगे जाओ, तुम्हारे पीछे पांच हजार घोड़े, ढाई हजार रथ, छः सौ हाथियाँ और तीस हजार पैदल सैनिक तुम्हारी सहायताके लिए भेजता हूँ। जब तुम वहाँसे लौट आवोगे, तब मैं एकवार फिर राजाओंको जीतनेके लिये यात्रा करूँगा ॥ ८८-९२ इतना कहकर रामने शत्रुघ्नका माथा सूंघा और अनकझ आशीर्वाद देकर उन ब्राह्मणोंके साथ भेज दिया ॥ ९३ ॥ शत्रुघ्न भी रामको प्रणाम करके मधुवनकी ओर चल पड़े । साथमें रामकी दी हुई वह कपिल वाराहीकी मूर्ति भी लेते गये। रामने उन दोनोंके साथ