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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 439 of 811

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Page 439

सर्गः ६] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४२३


न्वन्मुखेक्षणसङ्गात्संपतिः प्राप मध्वर्यं रामसन्निधौ ।
त्वन्मुखेक्षणालाज्जिता मृगी त्वत्पदोङ्गुष्ठाग्रिः शिरोऽस्तु मे ॥३२॥
कुशलयन्त्रिके जलरुहानने जलरुहेक्षणे पापदारिके ।
मधुरसुस्वने नूपुरस्वने त्वत्पदभृङ्गालिः शिरोऽस्तु मे ॥३३॥
प्रहसनयुते स्मितवदने नेत्रभ्रुः शुभो बिम्बोष्ठिः ।
अद्य वै त्वया मन्दरप्रसुतो मारितो रणे तद्विधातम् ॥३४॥
ब्रह्मणेरितं स्तवमुत्तमं मान्यस्त्वह्ये पठति यः पुमान् ।
सर्ववाञ्छितं लभति सोऽत्र ना प्राप्नुयात्सुखं गरुडसिद्धिम् ॥३५॥
इति स्तुत्वाऽथार्चयित्वा वस्त्रकुण्डलमण्डनैः । सीतां रामं च सम्पूज्य राघवेणापि पूजितः ॥३६॥
प्रययौ राघवमनु सम्यक् च स्वलोकम् । ततो विभीषणः प्राह लक्ष्म्या न स्वया पुरा ॥३७॥
ममागतमिदानीं त्वं मां कृतं कुरु प्रभो । गच्छेति प्रतिज्ञाय तद्वाक्यं रघुनन्दनः ॥३८॥
विमानेन ययौ लङ्कामध्ये मित्रगृहं प्रति । ततो विभीषणं राज्ये लङ्कायां त्वभ्यषेचयत् ॥३९॥
तदा महोत्सवश्चासील्लङ्कायां नृपतेर्गृहे । ततो विभीषणो रामं सीतां च लक्ष्मणादिकान् ॥४०॥
वस्त्रै रत्नैश्च विविधैः पूजयामास सादरम् । शेषमस्मै सर्वस्वं स्वीयं रामाय राक्षसः ॥४१॥
ददौ कपिलावराहमूर्तिः शम्भुपूजिताम् । रामस्तां रोचयामास सोऽपि रामाय तां ददौ ॥४२॥
मनसा कपिलेनैव पुरा मूर्तिर्विमानिता । चिरकाले कदाप्यथ लब्ध्वा मघवना तु या ॥४३॥


हे रामप्राणप्रिये ! तुम्हे देखने से सम्पाती का शरीर सुन्दर काट हो गया। तुम्हारी आँखोंकी शोभा देखकर मृगी लज्जित हो जाती है, इस प्रकार आदर के साथ, हे सीते ! हमें यह आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सदा तुम्हारे चरणकमलका भ्रमर बना रहे ॥३२॥ हे कुशलकारी माता ! हे कमलके समान मुखवाली, हे कमलके समान आँखोंवाली ! हे पाप का नाश करनेवाला ! हे मीठे स्वरवाली ! हे नूपुर सदृश मधुर स्वर-वाली सीते ! हमें आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सदा तुम्हारे चरणकमलोका भौंरा बना रहे ॥३३॥ हे मुस्कुराहट भरे मुखवाली सीते ! तुम्हारे नासिका बहुत सुन्दर है। बिम्बफलके समान तुम्हारे लाल ओष्ठ हैं। आज तुमने संग्रामभूमिमें मन्दोदरी को मार डाला इस प्रकार, संसारका उद्धार हो गया ॥३४॥ श्रीरघूदासने कहा या प्रातःकालके समय जो कोई मनुष्य इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसकी समग्र कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं और अन्त समयमें उस रामचन्द्रजीके समीप स्थान मिलता है ॥३५॥ इस तरह ब्रह्माने स्तुति करके विविध प्रकारके वस्त्रभूषणोंसे राम और सीताकी पूजा की। रामने भी ब्रह्माजीका विधि-वत् पूजन किया ॥३६॥ तदनन्तर रामसे आज्ञा पाकर समस्त देवताओंके साथ ब्रह्मा अपने लोकको लौट गये। तब विभीषणने भगवान्‌से प्रार्थना की कि पहले जब आप रावणको मारनेके लिए लंकामें आये थे तो पिताकी आज्ञा न होनेके कारण आपने नगर में प्रवेश नहीं किया था ॥३७॥ किन्तु अबकी बार आप मेरे घर पधारकर मुझे कृतार्थ कीजिए। रामने यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और अपने पुष्पक विमानपर बैठकर लंकाके अपने मित्र विभीषणके भवनमें पधारे। वहाँ पहुँचकर रामने विभीषणका अभिषेक करके लंकाके राजसिंहासनपर बिठाया। उस समय लंकामें बड़ा उत्सव मनाया गया। इसके बाद विभीषणने राम, सीता तथा लक्ष्मणादिका विविध रत्नों और वस्त्राभूषणोंसे सत्कार किया। तदनन्तर उन्होंने अपना सारी सम्पत्ति रामको अर्पण कर दी ॥३८-४१॥ उस समय विभीषणकी सारी सम्पत्तिमेंसे रामको कपिलवाराहकी मूर्ति अच्छी लगी। जिसको पूजा रावण स्वयं करता था। विभीषणने रामको वह मूर्ति दे दी ॥४२॥ उस मूर्तिके विषयमें ऐसा सुना जाता है कि कपिल भगवान्‌ने अपने मनःशक्तिसे उस मूर्तिकी रचना की थी। बहुत दिनों तक कपिल मुनिने स्वयं उसको पूजा की। उसके बाद वह इन्द्रके हाथ लग गयी।