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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 433 of 811

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Page 433

सर्गः ६] भव्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४१७

भवेदिति सखीयुक्ता ददौ सर्वान्मुरेशतः। कदा पत्युर्न संत्रा न ययौ राघवं विना ॥१९॥
नैका तस्थौ क्वापि सीता स्वाम्यने दर्शनं जहौ। न मिष्टान्नं न ताम्बूलं न तैलं केशबंधनम् ॥२०॥
अंगीचकार श्रीगमविरहानलकर्शिता। सम्भाषणं न चान्येन गुरूणाञ्चाप्यनेकधा ॥२१॥
सास्रतोन्मुस्मितं वक्त्रं रोक्षणाञ्चाऽप्य ददर्श सा। अन्यार्थमोधितः पश्यन् बहुदुःखमवाप्नुयात् ॥२२।
पर्यंङ्के शयनं सीता नाकगेद्राघवं विना । मुहूर्तं न ददर्शान्यं मुखं विरहपीडिता ॥२३॥
न दधौ वसनं चित्रं न चित्रां कंचुकीं दधौ। न पत्यौ शयने सा दम्पत्याणभूमिषु ॥२४॥
न ययौ सरयं स्नातुं ययौ नोपवनं वनम् । ग्रामं न ययौ सीता न तथा पुष्पवाटिकाप् ॥२५॥
न सकार स्नतो दूरं माङ्गल्यानि विदेहजा । वस्तुभि द्विजवर्येभ्योऽतोषयामास जानकी ॥२६॥
नियमानाकरोन्नाना देवीनां च पृथक् पृथक् । निःशेषं व्रतसामर्थ्यं दध्यं नित्यं विदेहजा ॥२७॥
षट्कं वा पट्ट माल्यमर्पयामि हनूमते । षोडशापू वगणां च दास्यामि पुष्पान्वितान् ॥२८।
मिष्टान्नेनापि नैवेद्यं ते दास्यामि गणाधिप दुर्गे त्वां बलिदानं च करिष्यामि प्रसीद मे ॥२९॥
चण्डिके त्वां प्रदास्यामि रक्त जिह्वोद्भवं त्यहम् । सुद्रव्यञ्च समायुक्तं वलिदीपसमन्वितम् ॥३०॥
शीघ्रं रामो जयं प्राप्य शिशुभियांतु वै पुरम्। मंदवारे करिष्यामि वृत्तं सोपोषणन्वहम् ॥३१॥
नोपभोक्ष्यामि मधुरं नोपभोक्ष्याम्यहं घृतम् । यावन्नैकं करिष्यामि व्रतान्येवं मनिन्नृशन् । ३२॥
कृष्णपक्षे तृतीयायां चतुर्थ्यां वा महेश्वरि । किञ्चित्किञ्चिन्मामिष्यामि तिल्वाटं विजयाय वा ॥३३॥
गुडेनाहं तिलुन्मेष्ये यावच्छ्रीरामदर्शनम् । भविष्यति कृपार्थेऽथ लक्ष्मणार्येण बंधुभिः ॥३४॥
मन्दरे नवरात्रं च सखीभिश्च करोम्यहम् । एकस्मिन्नेव दिवसे नवभिः प्रचुरस्तनैः ॥३५॥

शकुन अच्छा उठ जाता तो बड़ा हर्ष होता था । वे समझती कि अब ही रामचन्द्रजीके दर्शन होंगे । इसी खुशीमें सखियों को वे मिठाई भी बाँटती थीं । जबसे राम परदेश गये, तबसे वे किसके घर नहीं गयीं ॥ १८ ॥ १९ ॥ कहींपे सीता कभी अकेली नहीं बैठतीं, अपने रूपपे घमण्ड नहीं ल्यातीं, मिठाई नहीं खाती, ताम्बूल नहीं चरबती और अपने केशोंका संस्कार नहीं कराती थी जबसे राम गये, तबसे उन्होंने किसी पुरुषके साथ सम्भाषण नहीं किया ॥ २० ॥ २१ ॥ क्या किसीने दुरवलोकन नहीं बोली, ऊपर मुँह उठाकर किसीकी ओर नहीं निहारा, कभी किसी पक्षने देखातो वह दया पाया और कभी भी उनकी आत्माको चैन नहीं मिली । २२ । राघव विरहसे पीड़ित सीताने कभी शय्यापर शयन नहीं किया और विरहसे दीन पड़ हुए अपने मुखारविन्दक भी न कोई देखा न उन्होंने कभी रङ्ग बिरङ्गे कपड़े पहने और न रङ्ग बिरङ्गी चाली ही धारण की । सबस वे कभी दम्पत्यारुक सोभटेपर नहीं पड़ी हुई ।। २३ ॥ २४ ॥ सरयू-स्नान करनेको नहीं गयीं और किसी वन या उपवनमें सैर करने नहीं गयी । किसी बगीचे तथा पुष्पवाटिकापे भी नहीं गयीं ॥ २५ ॥ उसम उन्होंने कोई माङ्गलिक कार्य नहीं किया । अनेक प्रकारकी वस्तुयें दे देकर उन्होंने ब्राह्मणिणयोंका प्रसन्न किया और कितने ही तरहके व्रत करके अनेक देवियोंकी सुप्रती कीं । इस तरह बहुतसे व्रतोंको करके व अपने उस समस्त व्रतोंको बिचारती रहीं ॥ २६ ॥ २७ ॥ सदा इस तरह मनौती मानती थीं— हे ईश्वर और पवन भी यदि रामचन्द्रजी विजयी होकर अपने भाइयों और सेना समेत शीघ्र अयोध्या वापस आये तो हे हनुमान ! मैं चंपा की माला बनवाकर आपको पहनाऊँगा । हे गणपती ! आपको पूरी और हलुवा भात तथा और अनेक प्रकारके पक्वान बनवाकर आपको समर्पण करूँगी । हे दुर्गे ! मेरे ऊपर प्रसन्न हंओ । यदि राम लौट आएँ तो आपके लिए बलिदान करूंगी । हे चण्डिके, ! मैं आपको विविध प्रकारके स्वादिष्ट अन्नो तथा बलिदीपके साथ अपनी जीभका रक्त चढ़ाऊँगी ! रविवारका व्रत करूंगी । एक महिने तक मिठाई और घृत न खाऊंगी । २८-३२ ॥ हे महेश्वरी ! कृष्णपक्षकी तृतीया तथा चतुर्थीको थोडे थोडे गुड़के साथ तिल खाऊंगी यह व्रत तब तक चलता रहेगा, जब तक मुझे लक्ष्मणादि भ्राताओके साथ श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन नहीं मिलेंगे ॥ ३३ ॥ हे चण्डिके ! यदि मुझे