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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 424 of 811

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Page 424

४०८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

तदा पिंडं स्पृशेन्मे न त्वेवैरन्त्या स्पृशेत् स्त्रिया । अन्यच्चैकं वरं दद्मि लिपिमात्रे तु पुस्तके ॥१७॥
यत् किञ्चिल्लेखकैश्च विस्मृतं तत्र मद्भयात् । कुर्वन्तु पदचिह्नं ते सर्वत्र जगतस्तले ॥१८॥
स्वपदं पुस्तकं दृष्ट्वा वरात् ज्ञास्यतु विस्मृतम् । लिखितं पार्श्वभागेषु लेखकैः पुस्तकस्य यत् । १९॥
इति दत्त्वा वरान् रामस्तूष्णीमासीन्निराकुलान् । काकोऽपि तुष्टः श्रीरामं नत्वा द्रोणं प्रनन्वदा ॥२०॥
एवं नानाचरित्राणि चकार रघुनन्दनः । एकदा शयने रात्रौ पारिजातसरोरुहः ॥२१॥
निद्रितो ह्यभवत्के जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तयः विना एतस्मिन्नन्तरे तस्यां रात्रौ ते गन्धर्वकाः ॥२२॥
दृष्ट्वाश्चापि दास्यश्च दास्यानः सकलास्तदा । ययुश्च संनहनं श्रोतुं कापि रामस्य भक्तितः ॥२३॥
एता न ममयं वेगात्कामाज्जगप्रपीडितः । पीवरा स्तनभारनता सर्वामलङ्कारभूषिताः ॥२४॥
तारुण्यमदमत्प्रौढाः दम्भकुम्भपयोधराः चन्द्राननाः शुकघ्राणाः कम्बुकण्ठ्यो मृगीदृशः ॥२५॥
पीतकौशेयवसना रुणन्नूपुरनिःस्वनाः ।
परस्परं ताः संमन्त्र्य प्रथमे वयसि स्थिताः । ययुः सरोः पृथक्ते श्रीराघव रहसि स्थितम् ॥२६॥
काचिन वीजयामास श्रीरामं व्यजनेन हि । कंचिद्धार रामार्थे स्वकरे पुष्पचारिकाम् । २७॥
काचिन्ताम्वूलपात्रं च काचिद्गन्धं हस्ते या । पात्रं निहितवन्त्यन्या या दधार विलासिनी ॥२८॥
दधार चन्दनं काचित्काञ्चिद्विज्ञानपूजनम् । काचित्फलानि नैवेद्यं काचिद्राक्षाफलादिकम् ॥२९॥
एतस्मिन्नन्तरं कश्चित् तत्रागत्य शनैः । रामस्य कर्तुमुद्युक्ता तत्पदं पाणिनाऽस्पृशत् । ३०॥
नेत्ररामः प्रबुद्धोऽभूत्दृष्ट्वाऽदृश्यतः विदेहजान् । केन मे स्वपितः पदस्पर्शश्चेत्यमुद्यविशत् ॥३१॥
नावदर्श श्रीरामः स्वकक्षं शु० स्थिताः । पीवरा प्रमदाः सर्वा मन्द्वालङ्कारमण्डिताः । ३२॥
राम मभ्युत्थितं दृष्ट्वा प्रणेपुस्तास्तदा भुवि । स्वशिरांसि निधायाथ तुष्टुवुर्विविधोक्तिभिः । ३३॥


उसकी अधूरी समझकर जब तक न करे, तब तक उस अन्त्य स्त्रीद्वारा उसकी सद्गति प्राप्त होगी। तुमको उसके दशाङ्गुपिण्डको तभी छूना, जब उसका मृतक कर्म पूर्ण हो जाय। तुमको इमण वरदान यह भी देता हूँ कि जो संसार लिग्वत समय पद भूल जाय, वे संसार तुम्हारे पैरका चिह्न बना दिया करेंगे ॥ १७-१८॥ पुस्तकोंके पार्श्वभागमें पुस्तक देखकर ऐसा विचार आप समझ जायें कि यहाँपर श्लोक छूट गया है ॥ १९ ॥ इस प्रकार दृढ सोचकर वरदान देकर सत्वकर्मयुक्तों द्वारा पूजे गये श्रीरामजी भरत भ्राताको प्रणाम करके वहाँसे उठ गया ॥ २० ॥ इस प्रकार रघुनन्दन विविध प्रकारका नाटक किया करते थे । एक दिन रात्रिके समय पारिजात सुधार नाम शयनस्थान के बीच शय्यापर अकेले शयनकर सो रहे थे। उसी रात्रिमे जिनने भी दास्यवर्ग या, वे सब भक्तिपूर्वक श्री रामके तंबगान के लिए चले गये थे । २१-२३ । उसी समय मौका पाकर वे नारियां विविध प्रकारके शृंगारभूषण धारण किये कामके बाणसे पीडित होकर रामचन्द्रजीके पास जा पहुँचीं। २४। वे सब तरुणाईके मदसे भरी थीं, मदोन्मत्तके समान उनके स्तन थे, चन्द्रमाकी भाँति उनका मुख था, तोतेकी तरह समान उनकी नासिका थी, कम्बुकी तरह उनके पाँव थे और मृगियोंके समान उनके नेत्र थे॥ २५ ॥ वे सब पीले वस्त्र धारण किये थीं। छनक-छनक रुनझुन करके बोल रहे थे। उनकी उमर भी बहुत थोड़ी थी। वे सब परस्पर सम्भाष एकान्तमें सोये हुए रामचन्द्रजीके पास जा पहुँचीं । २६ ॥ कोई पंखा लेकर कोई पंखा करने लगी और कोई अपने हाथमें फूलोंकी माला लेकर उनके उठनेकी प्रतीक्षा करने लगी। किसीने पानदान लिया और किसीने जलका भरा झारी थी, किसीने पाण्डान उठाया, किसी दूसरी विलासिनाने चन्दन लिया, किसाने दिया एकपात्र और कोई नाना प्रकारके फल लेकर रामचन्द्रजीके जागनेकी प्रतीक्षा करने लगी ॥ २७ २९ ॥ इसी बीचमें एक स्त्रीने रामचन्द्रजीका पैर दबानेकी इच्छासे धीरे-धीरे उनका पैर उठाया ॥ ३० ॥ इससे वे चौंक पड़े और सोचने लगे कि सीता तो इस समय अनुध्याय है, तब यह कौन पैर उठा रहा है। यह विचार करते-करते चकित भावसे वे उठ बैठे ॥ ३१ ॥ सब अपने सामने उपस्थित उन सौ नारियोंपर इनकी दृष्टि पड़ी। तब रामने