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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 422 of 811

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Page 422
४०६आनन्दरामायणम्[ सर्ग ३

शतकोटिप्रमितं श्रेष्ठं यस्मिन् रामायणं कृतम् । कृष्णादीनां चरित्रं हि संति ह्यन्तर्गतानि हि ॥ १०६ ॥

श्रीश्रीमद उवाच

"तथ तयोर्विवदतोस्तत्रोभयोः परस्परम् । बभूवाकाशजा वाणी तां तौ सर्वे च शुश्रुवुः ॥ १०७ ॥
रामस्यात्र स्तुतिः केषाञ्चित् कृते घटेन न इति तां खेचरीं वाणीं श्रुत्वा सर्वे सभासदः ॥ १०८ ॥
चक्रुर्जयाश्वानान्दंर्तन्नांदयंतिति स्म नास्तिकाः । तं रामोपासकाः सर्वे ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥ १०९ ॥
निर्जरा अपि ते सर्वे विमानस्था मुदान्विताः । तं रामोपासकं प्रीत्या ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥ ११० ॥
तदा कृष्णोपासकः स लज्जया नतमस्तकः तं रामोपासकं नत्वा प्रार्थयामास वै मुहुः ॥ १११ ॥
तदा रामोपासकोऽपि तं नत्वाऽऽश्लिष्य च हृद्यम् । उवाच मधुरं वाक्यं शृणु कृष्ण द्विजोत्तम ॥ ११२ ॥
न नन्दनन्दनोः पृथग्विधो रामो न रामतोऽन्यो वसुदेवसूनुः ।
तथाऽप्ययोध्यापुरपालकाले मल्लक्ष्मणे धावति मे मतीषा ॥ ११३ ॥
अतः स्तुतो मया रामः कृष्णस्य निदनं कृतम् । तवेर्ष्यया द्विजश्रेष्ठ वेद्मि तौ द्वौ ममाविनि ॥ ११४ ॥
राम एवात्र कृष्णश्च कृष्ण एवात्र राघवः । उभयोरन्तरं विप्र कौतुकाच्च मयेरितम् ॥ ११५ ॥
मानयत्यन्तरं यो वा तयोः श्रीरामकृष्णयोः ।
परम्परा स निरये पतिष्यति न संशयः । मल्लक्ष्मणेक्षणार्थाय खेचर्या गद्यशः स्तुतः ॥ ११६ ॥
इत्युक्त्वा तोषयित्वा तं रामः कृष्णाह्वयं द्विजम्। तूष्णीं तस्यौ सभामध्ये सभासद्भिः सुपूजितः ॥ ११७ ॥
ततस्तौ माघमासान्ते स्वं स्वं देशं प्रजग्मतुः । तस्माच्छिष्यावतारेषु न रामसदृशः परः ॥ ११८ ॥
अतस्त्वं भज भावेन तस्यैव चरितं शृणु । यदन्मद्रणयाम्यग्रे महामङ्गलकारकम् ॥ ११९ ॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे
श्रीरामकृष्णोपासकयोर्विवादो नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥


बहुत दिन पहले वाल्मीकिने रामायण बनाया था । १०५ ।। जिसकी श्लोकसंख्या सौ करोड़ है और तुम्हारा समस्त कृष्णचरित्र उसमें समा जाता है ॥ १०६ ॥ श्रीरामदासजी बोले- जिस समय वे दोनों इस प्रकार परस्पर विवाद कर रहे थे, तभी आकाशवाणी हुई—'रामके समान मूर्ति कल्पना सामर्थ्य विश्वमें नहीं है' । उसे उन दोनों तथा अन्य लोगोंने सुना । इस प्रकारकी आकाशवाणी सुनकर बन्धी हुए समस्त सभासद रामकी जय-जयकार करते हुए तालियां बजाने लगे और उस रामोपासक पर पुष्पवृष्टि की ।। १०७-१०९ ॥ इतना ही नहीं, देवतागण भी विमानोंपर आ-आकर हर्षमें रामोपासकपर पुष्प बरसाने लगे । तब लज्जासे नतमस्तक होकर कृष्णोपासकने रामोपासकको प्रणाम करके बार-बार विनती की ॥ ११० ॥ १११ ॥ रामोपासकने भी उसे प्रणाम करके छातीसे लगा लिया और कहा— ।। ११२, हे द्विजोत्तम ! न कृष्णसे पृथक राम हैं, न राम-से पृथक् कृष्ण हैं । फिर भी अयोध्या नगर के बालक मल्लक्ष्मणसहित वात्सल्यद्वारा रामकी ही भलाईकी मेरी इच्छा होती है ।। ११३ ।। इसी कारण अपनी रीतिसे रामकी स्तुति की और कृष्णकी निन्दा । यह सब केवल तुम्हारी ईर्ष्यासे कहा-सुनी हुई । नहीं तो वास्तवमें मैं दोनोंको समान समझता हूँ ।। ११४ ।। राम ही कृष्ण हैं और कृष्ण ही राम हैं। इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। अभी मैंने जो कुछ कहा, वह सब कौतुकमात्र था ॥ ११५ ॥ जो मनुष्य राम और कृष्णमें अन्तर मानता है उसे नरकगामी होना पड़ेगा इसमें कोई संशय नहीं है। केवल तुम्हारा गर्व दूर करनेके लिए अभी आकाशवाणीने भी रामकी स्तुति की थी ॥ ११६ ॥ ऐसा कह तथा कृष्णनामक द्विजको सान्त्वना देकर सभासदोंसे पूजित होता हुआ राम विप्र सभा में चुपचाप बैठ गया ।। ११७ ।। माघमास व्यतीत हो जानेपर वे दोनों अपने-अपने देशको लौट गये । इसलिये मैं कहता हूँ-हे शिष्य ! समस्त अवतारोंमे रामावतारके सदृश कोई भी अवतार नहीं है ॥ ११८ । अतएव तुम उन रामका भजन करो और उनकी वह कथा सुनो जो आगे चलकर मैं सुनाऊँगा ।। ११९ । इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेज पाण्डेयविरचित ज्योतिष्मतीभाषाटीकासमन्वित राज्यकाण्ड पूर्वार्द्धे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥