श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 416 of 811
Read in context| १४० | आनन्दरामायणे | [ सर्ग ३ |
|---|
नग्नस्त्रीदर्शनं वह्निप्राशनं दामबन्धनम् । उन्मूलनं च यमयोर्धूपर्युषितसेवनम् ॥३१॥
रोदनं नवनीतार्थं मृन्मात्रा प्रताडनम् । गोपोपिकासु चास्नेहः पूर्वस्थलविसर्जनम् ॥३२॥
कृता रजकहत्या च युद्धं क्षत्रियवत् कृतम् । गजहत्या मल्लहत्या युद्धं मातुलमर्दनम् ॥३३॥
नैष्ठुर्यमाप्तवर्गेषु राज्यप्राप्तिस्तथैव च । नृपाज्ञायतनं चापि क्रीडा दास्या कुरूपया ॥३४॥
युद्धात्पराजयाश्चापि रिपवे पृष्ठदर्शनम् । गिरौ दग्धः परैर्ज्ञातः स्वांयस्थलविमोचनम् ॥३५॥
अब्धितीरनिवासश्च परस्त्रीहरणं कृतम् । भौमासुरपरद्रव्यहरणं परखनूनतः ॥३६॥
स्वीयगोत्रवधार्थं हि पांडवाग्र्योपदेशितम् । स्तेनैः स्तेयापरोपाश्च वृक्षार्थं सङ्गरः सुरैः ॥३७॥
कृष्णोपासक उवाच
किं त्वं जल्पसि शृण्वद्य तव रामस्य कामिनः । कस्य सा दुहिता ब्रूहि कुतः स वर्णसङ्करः ॥३८॥
शिवचापस्य भङ्गेन शिवस्याप्यपराधितम् । जामदग्न्यमानभङ्गकरणं मुद्गलस्य च ॥३९॥
आज्ञां विना लक्ष्मणेन तदन्वयलटिताः शुभाः । सदारण्यचरः स्वार्थं पशुहिंसापरायणः ॥४०॥
वनाश्रमी वन्यजीवी मांसाहारी धनुर्धरः । व्याधकर्मरतः शीतपर्जन्योष्णप्रपीडितः ॥४१॥
पादगामी चर्मवासा जटावल्कलशाखवी । श्मश्रुधारी तरुच्छाय श्रयी पात्रविवर्जितः ॥४२॥
राक्षसेन हृता पत्नी तव रामस्य कानने । पत्न्यर्थं हि कृतः शोकस्तथा दास्या प्रपूजितः ॥४३॥
रामोपासक उवाच
शरेण मोचिता पत्नी कृता छायामयी पुरा । न सा दासी तु शबरी मुनिसेवनतत्परा ॥४४॥
और अपनेसे बड़ी स्त्रियोंके साथ खेलते फिरते थे। वे नङ्गी नारियोंको देखते थे। उन्होंने मिट्टी खायी और कितने ही बार तो लोगोंके जूठन तक खाये थे। रस्सीसे बाँधे गये तो यमल-अर्जुन नामके दो वृक्षोंको उखाड़ डाला ॥ ३० ॥ ३१ ॥ घोटसे माखनके लिए रोने लगते थे और माता यशोदाके द्वारा बार बार पीटे भी गये। अन्तमें अपनेसे अतिशय प्रेम रखनेवाली गोपिकाओंके प्रति निष्ठुरता करके उस पवित्र वृन्दाबनको छोड़ दिया ॥ ३२ ॥ मथुरामें रजककी हत्या की और (ग्वाले होकर ) क्षत्रियोंके समान युद्ध किया। उन्होंने गजहत्या और मल्लहत्या करक मामाकी भी हत्या की ॥ ३३ ॥ अपनोंके साथ निष्ठुराई करके उन्होंने राज पाया। फिर भी एक दूसरे राजाकी आज्ञामे बंधकर रहे । बादमे एक कुरूप दासीके साथ क्रीड़ा की ॥ ३४ ॥ युद्ध हुआ तो उसम पराजित होकर शत्रुको पीठ दिखायी और पर्वतपर जाकर छिपे। शत्रुओंने अपनी समझसे उन्हें जला ही दिया था। फिर अपन स्थान मथुराको छोड़कर समुद्रके किनारे जाकर रहन लगे। वहाँ भी बरबस बहुतेरी स्त्रियोंका हरण किया। भौमासुरके द्रव्योंका उन्हांने चुराया ॥ ३५ । ३६ ॥ अपन भाइयो तथा कुटुम्बियोंको मारनेके लिए पाण्डवोंको उपदेश दिया। लोगोंपर उन्ह स्यमन्तक मणिकी चोरी लगायी। एक वृक्षके लिए उन्होंने देवताओंके साथ संग्राम किया ॥ ३७ ॥ कृष्णोपासक बोला—क्या व्यर्थ बकवास करते हो, सुनो। आज मैं तुम्हारे कामी रामकी करनी तुम्हें सुनाता हूँ। बताओ, जिसको उन्होंने अपनी भार्या बनायी थी वह वर्णसंकर कन्या थी या नहीं ? ॥ ३८ ॥ शिवजीका धनुष तोड़ करके शिवका अपराध किया। परशुरामका मान भङ्ग किया। मुद्गलकी आज्ञाके बिना ही लक्ष्मण द्वारा उन्होंने लतायें तोड़ मंगवाईं। जङ्गलमे इधर-उधर घूमते हुए पेट भरनेके लिए पशुहिंसा करते थे ॥ ३९ ॥ ४० ॥ बहुत दिनों तक वनमें आश्रम बनाकर रहे। वनके फल-मूल तथा मांस खाने और धनुष धारण किये बहेलियाका काम करते रहे। सर्वदा बेचारे शीत-आतप तथा मेहके सताये रहते थे ॥ ४१ ॥ पैदल चलते, चमड़ा पहिनते, बड़े-बड़े नख तथा जटा-वल्कल धारण किये रहते थे। बड़ी-बड़ी दाढ़ी-मूँछ रखाये पेड़ोंकी छायामें रहकर समय बिताते थे। उनके पास एक पात्र भी नहीं रहता था कि जिसमे खा-पी सकें ॥ ४२ । वनमें उनकी स्त्रीको एक राक्षस चुरा ले गया। उसके लिए विविध प्रकारका विलाप करते रहे और उनकी पूजा एक दासी शबरीने की ॥ ४३ ॥ रामोपासकने