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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 410 of 811

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Page 410
३९४आनन्दरामायणे[सर्गः २]

ऊचुः परस्परं सर्वे रामन्यस्तेक्षणाः शनैः। किं याचितं हि मुनिना किं रामोऽग्रे करिष्यति ॥१८॥
विना गोवह्निमणिभिः कथमन्नं प्रदास्यति । ततो गते मुनौ रामः पत्रं सौमित्रिणा तदा ॥१९॥
विलिख्य बद्ध्वा बाणे तन्मुमोच शरमुत्तमम् । स शरो वायुवेगेन शीघ्रं गत्वाऽमरावतीम् ॥२०॥
सुधर्मायां सुरैर्युक्तस्येन्द्रस्याग्रे पपात ह । तं शरं सहसा दृष्ट्वा चकितो भयविह्वलः ॥२१॥
कस्यायमिति चोक्त्वा तद्बाणनाम व्यलोकयत् । सुवर्णाङ्कितं बाणपुच्छस्थं पापदारकम् २२॥
ततो ज्ञात्वा राघवस्य शूरोऽयमिति देवराट् । तस्मिन्ग्रन्थं विमुच्याथ पत्रं नत्वा पपाठ च ॥२३॥
एतस्मिन्नन्तरे बाणः पुन श्रीराघवं ययौ । त्रिदशं समनुज्ञाप्य पूर्वस्तूणीगतोऽभवत् ॥२४॥
मघवाऽपि सुधर्मायां श्रावयामास निर्जरान् । राममुद्राङ्कितं पत्रं भयाद्विस्मयसंयुतः ॥२५॥
मघवंस्त्वं सुखं तिष्ठ स्वर्गेऽहं त्वां सदा स्मरे । मन्नियोगं शृणुष्वाथ याचितोऽस्म्यधुना त्वहम् ॥२६॥
विना गोवह्निमणिभिरन्नं शिष्यैर्युतेन च । वरैः षष्टिसहस्रैश्च तथाऽन्यैर्मुनिसत्तमैः ॥२७॥
सहस्राब्दक्षुधितेन क्रोधिनाऽतितपस्विना । दुर्वाससा मुहूर्त्तात्तु मध्यात्त्वंगीकृतं हि तत् ॥२८॥
याचितान्यपि पुष्पाणि तेनादृष्टानि मानवैः । मयाङ्गीकृत्य सकलं स्नानार्थं ते विसर्जिताः ॥२९॥
अतः शीघ्रं कल्पवृक्षपारिजातौ समुद्रजौ । प्रेषयस्व क्षणान्मां त्वमादरात्स्वेन सादरम् ॥३०॥
मा रावणशिरश्छेत्तुः प्रतीक्षां त्वामिषोः कुरु। एवं संश्राव्य तद्यन्त्रं सुरेन्द्रः सुरैः सह ॥३१॥
समभ्याय कल्पवृक्षपारिजातौ विबुद्धमः । विमानेन सुरैर्युक्तः श्रीरामाग्रं ययौ ॥३२॥
इन्द्रागमनमाज्ञाय तं प्रत्युद्गम्य लक्ष्मणः। प्रायोध्यायां विनायेन्द्रं सभास्थं रघुनन्दनम् ३३॥
कल्पवृक्षपारिजातौ मधवा रघुनन्दनम् । समर्प्य नत्वा श्रीरामं स उपाविशदासने ॥३४॥
एतस्मिन्नन्तरे शिष्यं दुर्वासा मुनिरब्रवीत् । गत्वा त्वं पश्य रामं तु किं करोत्यधुना गृहे ॥३५॥


भेज दिया ॥ १८ ॥ इधर लक्ष्मणादिक भ्राता, जानकी और सभासद् आदि भयके मारे सब भयभीत हो गये और वे रामकी ओर निर्निमेष दृष्टिसे देखते हुए अपने मनमें कहने लगे कि मुनिने बड़ी अद्भुत वस्तुएँ मांगी हैं। देखें, राम अब क्या करते हैं। बिना गौ, मणि तथा अग्निके किस प्रकार भोजन तैयार करके देते हैं ॥१७-१८॥ मुनिके चले जानेपर रामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे एक पत्र लिखवाया। उसे बाणके सामने बाँध कर धनुषपर चढ़ाया और छोड़ दिया। वह बाण वायुके समान वेगसे अमरावतीपुरीमें जाकर सुधर्मा नामकी देवसभामें इन्द्रके सामने गिरा। उस बाणको इन्द्रने देखा तो वे चकित होकर बोले ॥१९-२०॥ 'यह बाण किसका है !' यह कहकर उसपर लिखे रामके नामको देखा और पत्र संभालकर पढ़ा। पत्र से जान गया बाण वहाँसे फिर रामजीके तूणीरमें लौट आया । २१-२४॥ भय और विस्मय युक्त इन्द्रने वह पत्र सभामे बैठे हुए देवताओंको सुनाया। २५। उस पत्रपर लिखा था—'हे इन्द्र तुम स्वर्गमें सुखी रहो। मैं सदा तुम्हारा स्मरण किया करता हूँ। हाँ, इस समय तुमसे सहाय मांगा दे रहा हूँ। आज एक हजार वर्षके भूखे एवं उग्र क्रोधी दुर्वासा मुनि अपने साठ हजार अच्छे शिष्योंके साथ मेरे यहाँ आये हुए हैं वे ऐसा भोजन चाहते हैं कि जो गौ, मणि अथवा अग्निके द्वारा न बना हो। साथ ही उन्होंने शिवपूजनके लिए ऐसे फूल मांगे हैं, जिन्हें अबतक मनुष्योंने न देखा हो। मैंने उनकी गति स्वीकार करली है इस समय मैंने उन्हें स्नान करनेको भेज दिया है । २६-२९॥ इससे तुम सत्वर कल्पवृक्ष और पारिजात, जो कि क्षीरसागरमें निकले हैं, क्षणभरमें आदरपूर्वक मेरे पास भेज दी। ३०। देखो, कहीं रावणका विनाश करनेवाले मेरे बाणकी प्रतीक्षा न करने लगना,' इस प्रकार वह पत्र देवताओं को सुनाकर इन्द्रदेव गुरुके सबने साथ मन्त्रणा करके कल्पवृक्ष और पारिजात ले तथा देवताओंके समेत विमानपर चढ़कर अयोध्यापुरीमें जा पहुँचे ॥ ३१-३२॥ लक्ष्मणने जब यह जाना कि देवराज इन्द्र आ गये हैं तो उनके पास गये और आदरपूर्वक अयोध्यामें रामके पास ले आये ॥ ३३ ॥ इन्द्रने पारिजात तथा कल्पवृक्ष रामको अर्पण करके प्रणाम किया। फिर एक