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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 386 of 811

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Page 386
३७०आनन्दरामायणे[ सर्ग ७

यैः साऽप्योध्यापुरी व्योम्ना विरेजे निर्मला तदा । ययौ विभीषणश्चाथ सुग्रीवोऽपि प्लवंगमैः ॥ ९ ॥
ययौ स भूरिकीर्तिश्च पुत्राभ्यां संप्रमादतः । ययौ स जनकोऽपि युधाजिन्न ययौ तदा ॥ १० ॥
कौसल्यायाः सुमित्राया बांधवाद्याः समाययुः अथ रामस्तु वैशाखशुक्ले द्विजवरैः सह ॥ ११ ॥
पुरोधसा सुहृद्भिश्च स्नानमभ्यंगपूर्वकम् । कृत्वा लवाय मांगल्यस्नानार्थं स्त्रीः प्रचोदयत् ॥ १२ ॥
ततो मुहूर्तसमये वधूच्छिष्टां निशा लवम् सम्यग् लिप्त्व मुनैलाद्यैर्मान्याश्चा मगलग्रदाः ॥ १३ ।
स्वयं मन्मथप्रदा सर्वाश्चतुर्नार्यः स्वलंकृताः । अथ रामो देवकस्य प्रतिष्ठां ब्राह्मणैः सह १४॥
आदौ कृत्वा गणपतेः पूजां सम्यग्व्यधाद्विधि। पुण्याहादित्रयं चापि कृत्वा पूर्वं सविस्तरम् । १५ ।
चकार विधिनाऽऽसून पूजयामास वै मुनीन् ततो मुहूर्तसमये गत्वा पन्नगमदिरम् ॥ १६॥
लवस्य कञ्चननयनाविवाहं विनिर्वर्तयन् । चतुर्थे दिवसे वश्यान्तरस्थे मत्नदीपकैः ॥ १७ ।
नीराजितस्तदा रामो विरेजे मंडपे स्थितः । ततो निजगृहं गत्वा पूर्वोक्तनन्मवादिभिः । १८ ॥
लवेन कारयामास लक्ष्मीपूजनमुत्तमम् । ततो दानान्यनेकानि ददौ स रघुनन्दनः ॥ १९ ॥
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे तथा ते पन्नगा अपि । मुहृदश्चाथ गंधर्वाः पौरा जानपदादयः ॥ २० ॥
पूजयामासुः श्रीरामं वस्त्रैराभरणादिभिः । तथा तान् लक्ष्मणादींश्च कुशाद्यांश्चापि बालकान् ॥ २१॥
ततस्ता नृपपत्न्यश्च सुहृत्पत्न्यः पृथक्पृथक् । नागपत्न्यश्च गंधर्वापत्यस्त्वन्याश्चतथा स्त्रियः ॥ २२॥
सीतायाः पूजयामासुर्वस्त्रैराभरणादिभिः । सीताऽपि ताः सुहृत्पत्नीस्तथा वानिककामिनीः । २३ ।
पूजयामास विधिवद्वस्त्रैराभरणादिभिः । रामोऽपि सुहृदः पौरान् गन्धर्वान्पन्नगाभटान् । २४॥
वस्त्रैराभरणाद्यैस्तैः पूजयामास सादरम् । एवं वैशाखमासे तु सिते पक्षे लवस्य च ॥ २५॥
कृत्वा विवाहं रामः स कृष्णपक्षे तु माधवे । चकार पूर्वोक्तविवाहं अंगदस्य च ॥ २६॥
चित्रकेतोः पुष्करस्य विवाहो रघुनन्दनः ज्येष्ठमासे शुक्लकृष्णपक्षयोश्चक्रे मुदा ॥ २७॥

गयी और वह बहुत ही सुन्दर दीखने लगी। बहुतस वानरोंको साथ लिए हुए सुग्रीव, अपने दोनों बेटोंके साथ राजा भूरिकीर्ति, इनके सिवाय विभीषण, जनक, युधाजित्, कौसल्या तथा सुमित्राके बन्धु-बान्धव आदि भी अयोध्यामे आ पहुँचे। इसके बाद वैशाखके शुक्लपक्षमें पुरोहितों तथा विप्रोंके साथ रामने अभ्यङ्ग-पूर्वक स्नान किया और लवको मङ्गलस्नान करानेके लिए स्त्रियोंसे कहा ॥ ९-१२ ॥ सात दिक माताओंने जब मुहूर्त्त आया, तब वधूके जूठे हल्दी-तैल तथा उबटन लेकर लवके शरीग्मे लगाया और तदनन्तर वस्त्र गहने आदि माताक साथ अलङ्करण मन्त्र स्वयम् ही किया । विवाह से प्रथम श्रीमहाराजने शाख कुलदेवताका स्थापना का । १३ ॥ १४ । स्थापनाके पूर्व यथाविधि गणपतिजी की पूजा की और निम्नाशय तीन प्रकारका पुण्याहवाचन किया इसके अनन्तर मेहूपानीमे आये हुए मुनियोंका पूजन करके उन्हें सन्तुष्ट किया । शुभ मुहूत्तमे पन्नगोंके यहाँ गये और वहाँ कञ्चननयनाके साथ लवका विधिवत् विवाह सम्पन्न किया, चौथे दिन वामकों छिटनांमे बैठे हुए रत्न-दीपकाश रामकी आरती उतारी गयी । उस समय राम सीताके साथ बहुत ही सुन्दर दीख रहे थे। इसके अनन्तर पूर्वोक्त उत्सवोंके साथ राम अपने घर गये वहाँ लवके हाथोंसे अच्छी तरह लक्ष्मीपूजन कराया और अनेक प्रकारके दान दिये । १५-१९ ॥ इसके बाद उन देश देशान्तरस आये हुए राजाओ, पन्नगो, सम्बन्धियो, पुरवासिया और जनपदवासियोने विविध प्रकारके वस्त्रों और आभूषणोंसे राम-लक्ष्मण तथा सब बालकोंकी पूजा की। इसके पश्चात् रानियों, सम्बन्धियोकी स्त्रियों, नागपत्नियों तथा गंधर्व आदिकी स्त्रियोंको सीता आदि स्त्रियान वस्त्र और आभूषण देखकर विधिवत् सस्कृत किया । रामने भी सम्बन्धियों, पुरवासियो, गन्धर्वो और पन्नगोंकी वस्त्राभूषणसे भली भाँति पूजा की। इस तरह वैशाख मासके शुक्लपक्षमे लवका विवाह सम्पन्न किया और कृष्णपक्षमें पूर्ववत् उत्साह समेत अङ्गदका विवाह किया ॥ २०-२६ ॥ उसी प्रकार ज्येष्ठ शुक्ल और कृष्ण-