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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 380 of 811

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Page 380

३६४ आनन्दरामायणे [ सर्ग ५


तदा तत्तपसा तुष्टाऽऽविर्बभूव सुरेश्वरी । ददौ तस्मै पाथवेन पूरितं पात्रमुत्तमम् ॥ ५ ॥
अन्नपूर्णा मुनिं प्राह स्थाल्यास्मान् विद्धिधान हि । पक्वान्नानि यथेष्टानि निष्कास्य तव भामिनी ॥ ६ ॥
सर्वेषामग्रतः शीघ्रं करोतु परिवेषणम् । इत्युक्त्वा साऽन्नपूर्णा तं मुनेरन्तर्दधे तदा ॥ ७ ॥
लोपामुद्रा पुनः पत्नी स्थाल्या निष्कास्य वेगतः । दिव्यान्नानि विचित्राणि सर्वेषां पुरतस्तदा ॥ ८ ॥
सर्वार्चितानां विप्राणां चकार परिवेषणम् । अथ तुष्टो मुनेष्टुष्ट्यै कंकणं रत्ननिर्मितम् ॥ ९ ॥
ददौ मुदा कुम्भजन्मा सीतायै दिव्यकुण्डले । एव संपूजितस्तेन मुनिना रघुनन्दनः ॥ १० ॥
सहितोऽगस्तिना स्थित्वा पुष्पकै पूर्वकं पुनः । पश्यन्तौ दण्डकारण्य कौतुकानि समन्तः ॥ ११ ॥
विचचार रघुश्रेष्ठो दर्शयामास मैथिलीम् । नानादृक्षांश्चपर्वतांश्च नदीः पक्षिगणान्मृगान् ॥ १२ ॥
पञ्चाप्सरभगे नाम ददर्शाम्रे भ्रमन् सरः । तत्तटे राघवो रात्रौ निवासमकरोन्मुदा ॥ १३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे रात्रौ नृत्तमप्सरसां शुभम् । शुश्राव मधुरं गीतं सीतया मंचके प्रभुः ॥ १४ ॥
तेऽपि सर्वे शुश्रुवुस्तन्नृत्यं गीतं च सुस्वरम् । अदृष्टाऽप्सरसस्तत्र तदा स रघुनन्दनः ॥ १५ ॥
पप्रच्छ कुमजन्मानं गीतं नृत्यं कुतस्त्विदम् । श्रुतं मुनिशार्दूल वदस्व त्वं सविस्तरम् ॥ १६ ॥
इति रामवचः श्रुत्वा तमगस्त्योऽब्रवीन् । राम राजीवनेत्र त्वं किन्तं वेत्सि न वै स्विद्म् ॥ १७ ॥
सर्वानेतान्मन्मुखेन वृत्त श्रोतुमितुं मुदा । चेन्मां पृच्छसि महांश्र्व तवाग्रे प्रवदाम्यहम् ॥ १८ ॥
पुरा गन्धर्वराजस्य पुत्र्यः पञ्च मनोरमाः । अगञ्जुका मुदा कीडां चक्रुश्च सरोवरे ॥ १९ ॥
एतस्मिन्नन्तरे राम नागकन्याः सरोवरात् । क्रीडार्थ निर्ययुः सप्त बहिरप्राप्तयौवनाः ॥ २० ॥
तासां परस्परं मैत्री बभूव रघुनन्दन । तत्र ता नागकन्याश्च तथा गन्धर्वकन्यकाः ॥ २१ ॥
यथागतं सदा चक्रुः क्रीडार्थं मग्म्यतटे । तपसा मुनिना तत्र मुहुर्वाक्यैनिवारिताः ॥ २२ ॥

उसी समय उनका तपस्यासे प्रसन्न होकर देवलोकाध्यक्षी अन्नपूर्णा प्रकट हो गयीं। उन्होंने अगस्त्यजीको खीरसे भरा एक पात्र दिया ॥५॥ और कहा कि इस बटलोईमैसे विविध प्रकारके पक्वान निकाल-निकालकर तुम्हारी स्त्री सबको आगे परस दे। इतना कहकर अन्नपूर्णा अन्तर्धान हो गयीं ॥६-७॥ इसके अनन्तर जब कि अगस्त्यजी ने ऋषियों तथा विप्रों समेत रामकी पूजा कर ली, तब अगस्त्यजी की पत्नी लोपामुद्रान उसी पात्रमेसे पक्वान्न निकाल निकाल कर सबके आगे परस दिया। भोजनोपरान्त प्रसन्न मनवाले रामको अगस्त्याने एक जोडा कङ्कण और सीताको कुण्डल दिये ॥८-१०॥ इस प्रकार अगस्त्यसें सत्कृत होकर राम अगस्त्यको अपने साथ बिठा सबके साथ पुष्पक विमानपर जा बैठे और दण्डकारण्यम चारों ओर विविध प्रकारके कौतुक देखते हुए इधर-उधर घूमने लगे ॥११-१२॥ रामने नाना प्रकारके वृक्ष, पर्वत, नदी, पक्षी आदि सीताको दिखाये। दूर में पंचाप्सर नामक सरोवरपर पहुंचे और वहांपर रामने रात्रिभर निवास किया ॥१३॥ रात्रिके समय जबकि राम सीताके साथ अपनी शय्यापर सोयेथे, तब उन्ह मीठे-मीठे गीत और नृत्यकी ध्वनि सुन पड़ी १४। उनके सिवाय सबके मायकेवालोंने भी वह सुन्दर ध्वनि सुनी किन्तु अप्सरायें नहीं दीख पडी । तब रामने अगस्त्यसे पूछा हे मुनिश्रेष्ठ ! आप मुझ यह बतलाइये कि यह नृत्य गानकी ध्वनि कहाँसे आती सुनायी दे रही है म विस्तारपूर्वक मुझे बतलाइये ॥१५॥१६॥ रामकी बात सुनकर महर्षि अगस्त्यने कहा हे राजीवलोचन राम ! क्या आप यह वृत्तान्त नहीं जानते ? ॥१७॥ अथवा यदि व्योममरीलता चाहते हैं तो मै आपको सुना रहा हूँ ॥१८॥ प्राजन बहुत दिनों पहिले गन्धर्वराजकी पाँच सुन्दर कन्या जिनका कि रजोधर्म भी नहीं हुआ था, आनन्दपूर्वक इस सरोवरमे जलक्रीडा किया करती थी ॥१९॥ हे राम ! उसी समय एक बार उस सरोवरसे सात नाग-कन्यायें भी जलक्रीडा करनेको निकलीं। उनको भी वय-वय थी और यौवनका रंग अभी नहीं चढा था ॥२०॥ तदनन्तर उन गन्धर्वकन्याओं और नागकन्याओमें परस्पर मित्रता हो गयी और वे नित्य उस सरो-वरमें जलक्रीडा करनेको आनेजाने लगीं । उसी सरोवरपर तपस्या करते हुए एक तपस्वीने उनको कई बार