श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 375 of 811
Read in contextसर्गः ३ ] विवाहकाण्डम् ३५९
सीतादिभिर्वारिणीषु संस्थिताभिन्मवा पथि । प्रासादोपरि मध्याभिर्नारीभिः पुष्पवृष्टिभिः । ६६॥
हरिद्रापीतधान्यैश्च माङ्गल्यैर्मौक्तिकैरपि लाजभिर्हेमपुष्पैश्च वर्षितावीक्षितौ मुहुः ॥ ६७॥
जग्मतुर्वालकावेवं पश्यन्तौ कौतुकानि हि । ददर्शतुरवाटिकाश्च सुवर्णवृष्टिविनिर्मिताः ॥ ६८॥
तथा कृत्रिमवृक्षांश्च पताकाश्च ध्वजांस्तथा तथौषधिमयान्वृक्षांन् वह्निस्पर्शविदीपितान् । ६९॥
घाटस्थानौषधीभिः पूरितान्कृत्रिमान् जनान् ।
तथा व्याघ्रादिकान््रहिंस्रान्नेपथ्यैश्च प्रपूरितान् ॥७०॥
तडित्समभ नां न रूपने प्रासादानौषधीमयान् ।
केकिचक्रोपमादींश्च चन्द्रज्योत्स्नास्तु कृत्रिमाः ॥७१॥
एवं ददर्शतुर्नानाकौतुकानि नृपात्मजौ तन्पत्नौ भूरिकीर्तेश्च मन्त्रा मण्डपमुत्तमम् ॥७२।
नानामहोत्सवैर्यक्तौ नानच्छत्रमण्डितौ अवतीर्य गजेन्द्राभ्यां नस्थतुर्मण्डपांगणे ॥७३।
मधुपर्कविधानादि विधानेनि वै क्रमात् । विर्धुरू चक्रतुस्तौ ब्राह्मणैः पारेवेष्टितौ ॥७४।
ततो वद्ध्वोः पूजनं च र्मात्यः रघुनन्दनः चकार गुरुणा युक्तस्तदा स मण्डपांगणे ॥७५॥
ततो लग्नमुहूर्ते नं कुत वशिष्ठस्य गुरुः । नया त्वं मुफ्यापि पृथग्वेदिकयोस्तदा ॥७६।
कृत्वा सुसंस्थितौ चौतौ दम्पत्योरन्तरे पटो । धून्तोमयैः पृथक् चित्रौ नूतनौ हेमतन्तुजौ ॥७७॥
नानामगलरोषांश्च मुनेर्विक्रममुद्रैः । अगन्तवे जनास्तृष्णीं शृण्वंतो मंगलस्वनम् ॥७८।
इति श्रीशतकोटिकामचरित्रांर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
विवाहकाण्डे सुरासुरविवाहवर्णनं नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
एवं वन्दोजनोंकी स्तुतियां सुनते हुए राजा भूरिकीत्तिके महलोंकी ओर चले जा रहे थे ॥ ६५ ॥ सीतादिक माताएं हविशियोंपर बैठी थीं। प्रासादोंपर बैठी हुई नगरवासिनी नारियां उनपर फूल बरसा रही थीं। साथ बीचमें हल्दीसे रंगे पीले रंगके अन्न, मागुल्य मोक्तिक, धानके लावे और सुवर्णके बने फूल भी बरसते जा रहे थे। वे नारिया तृण लकी प्रेमभरी दृष्टिसे निहार रही थीं। इस तरहके कौतुक दखत हुए वे दोनों बालक चले जा रहे थे। रास्तेमें सुवर्णको वनी हुई स भी वाटिकाएं, कृत्रिम वृक्ष, पताका, ध्वजा, इस तरह बने जिसे देख जा आपकी चिनगारी पाकर जलने लगत थे ॥ ६६-६९ ॥ उन्हें और राहोंपर बैठे हुए ओषधिपूण बनावटी मनुष्यों, मसालेसे भरे हुए व्याघ्र आदि हिंस्र जन्तुओं, औषधि के संयोगसे बिजलीकी नाई चमकते हुए महलोंतथा मयूर आदिके छूटते हुए चत्रोको वे राज कौतूहल भरी आंखोंसे देखते जा रहे थे । ७० । ७१ । इस प्रकार मार्गमें अनेक कौतुकोंको देखते हुए वे राजा भूरिकीर्तिके उत्तम मंडपमें पहुंचे उस समय लाग में महान् उत्साह दिखायी पडता था। उन बच्चोंपर छत्र लगे थे और दिव्य चमर ढुल रहे थे। यहां पहुँचकर वे हाथी से उतरे और मण्डपाङ्गणम पहुंचे ॥ ७२॥ ७३ । उनके गुरुजनोने ब्राह्मणोंके साथ मधुपर्क विष्टर आदि विधि सम्पन्न किये । ७४ ।। इसके अनन्तर रामने सीता तथा गुरुजनोंके साथ उस मण्डपमें उन दोनों वधुओं की पूजा की ॥ ७५ ॥ तदनन्तर लग्नका मुहूर्त आनेपर गुरु वसिष्ठने कुशकी यम्विकाके साथ एवं लवको नृपतिके साथ अलग-अलग वेदीपर बिठाला ॥ ७६ ॥ इस तरह दोनों वर-वधुआंकी अच्छी तरह बिठाकर उनके बीचमें एक-एक पर्दा डाल दिया और सब लोग चुपचाप गुरु वसिष्ठके मुखसे उच्चरित नाना प्रकारके मागलिक श्लोकों सुनने लगे ॥ ७७ । ७८ । इति श्रीशतकोटिराम-चरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित 'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥