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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 36 of 811

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Page 36
२०आनन्दरामायणं[ सर्गः ३

ददर्श सीतां रामोऽपि हासशोभितहृत्स्थलाम् । जहर्ष नोच्चैर्नितरां ननाम गाधिनं प्रभुः ॥१५५॥
तदा रामं समालिङ्ग्य विश्वामित्रो मुनीश्वरः । निवेशयाञ्चाङ्के तं प्रेम्णाऽऽघ्राय मस्तके ॥१५६॥
तदा स जनकः सीतां गाधिजाङ्के न्यवेशयत् । सीतया रघुनाथेन शुशुभे स मुनिस्तदा ॥१५७॥
मानयामास स मुनिर्जन्मसाफल्यतां हृदि । ततः सभायां जनको विश्वामित्रं वचोऽब्रवीत् ॥१५८॥
प्रसादात्तव रामस्य लाभो जातोऽद्य मे मुने । धन्योऽस्म्यहं कुलं धन्यं धन्यौ तौ पितरौ मम ॥१५९॥
योऽहं श्रीरामश्वशुरश्चेति लोके प्रथां गतः । इत्युक्त्वा गाधिनं नत्वा प्रजगाम रघूत्तमम् । १६०॥
तदा ते पार्थिवाः सीतां दृष्ट्वा नयनडिण्डिमाम् । बिम्बोष्ठीं चन्द्रवदनां नक्षत्रैर्जगताऽऽवृताः । १६१॥
बभूवुर्विकलास्तत्र दुर्देवं मेनिरे निजम् । केचिन्मूर्च्छा पपुस्तत्र तान्समाश्वास्य मैथिलः । १६२॥
प्रार्थयामास नृपतीन्निषण्णान् सदसि स्थितान् । बद्धाञ्जलीन्म्लानवदनान् लज्जया नतकन्धरान् । १६३॥
युष्माभिर्मेऽद्य कन्याया विवाहं विनिवर्त्य च । गन्तव्यं स्वपुराण्येव करणीया कृपा मयि ॥ १६४॥
तदा ते पार्थिवाः सर्वे मंत्रांचक्रुः परस्परम् । यदि युद्धे विजेतव्यः श्रीरामोऽद्य रणांगणे । १६५॥
तदास्मिन् समये दुष्टे जयो नो न भविष्यति । कुमुहूर्ते वय यातास्तूष्णीं गत्वा पुराणि हि ॥ १६६॥
मुहूर्ते पुनर्यातुं यास्यामः सकला बलैः । भविष्यति तदाऽस्माकं जयो युद्धे विनिश्चयात् ॥ १६७॥
यदा रामं बाणभिन्नं पश्यामः पतितं रणे । भविष्यामः कृतकृत्यास्तदा सर्वे वयं नृपाः ॥ १६८॥
तदैतस्योपमानस्य दुःखं मर्मस्थलं गतम् । त्यजामः पार्थिवाः सर्वे जेष्यामो राघवं यदा १६९।
किमर्थमधुना वैरं दर्शनीयं वृथाय वै । इति संमंत्र्य ते सर्वे तथेत्युक्त्वा नृपोत्तमम् ॥ १७०॥
कृत्वा सीताविवाहं च गच्छामः स्वस्थलानि हि । तदा तान् सकलं वस्तु गृह्णन्वै जनको मुदा १७१॥


...पश्चात् रामके चरणोंपर अपना सिर रखा तथा नमस्कार करके सभाके लज्जावश कुछ नीचा मुख किये हुए खड़ी हो गयी ॥ १५४॥ उस हास्य सुशोभितहृदय रामने भी सीताकी ओर देखा और अत्यन्त सन्तुष्ट होकर उन्होंने विश्वामित्रजीको प्रणाम किया ॥ १५५ ॥ मुनियोंके ईश्वर विश्वामित्रने रामको आलिङ्गन करके प्रेमसे गोदमें बिठाया और उनका सिर सूँघा ॥ १५६ ॥ तब राजा जनकने सीताको भी ले जाकर विश्वामित्रजीकी गोदमें बैठा दिया। उस समय सीता तथा रामके सहित विश्वामित्रजी बड़ी ही शोभाको प्राप्त हुए ॥ १५७ ॥ वे मन ही मन अपने जन्मको सफल समझने लगे। तदनन्तर राजा जनकने सभामें विश्वामित्रसे कहा- ॥ १५८ ॥ हे मुनिराज ! आपकी कृपासे आज मुझे रामचन्द्र जैसा दामाद प्राप्त हुआ है। मैं धन्यहो, अपने माता पिताका तथा अपने कुलको धन्य समझता हूँ ॥ १५९ ॥ क्योंकि मैं रामचन्द्रके श्वशुरनामसे संसारमें विख्यात हुआ। ऐसा कहकर उन्होंने विश्वामित्रको तथा रघुकुलशिरोमणि रामचन्द्रको प्रणाम किया ॥ १६० ॥ उस समय वहाँ एकत्रित अन्यान्य राजगणोंके समान चमकनेवाले विरह अर्थात् पके हुए कुंदरूफलके सदृश ओष्ठ और चन्द्रमाके सदृश मुखवाली सीताको देखते ही उनके नेत्ररूपी बाणसे घायल होकर व्याकुल हो गये और अपना दुर्भाग्य समझने लगे। कुछ वहीँ मूर्च्छित हो गये। तब मिथिलाके अधिपति राजा जनकने वहाँ जाकर उन कान्ति नष्ट हो जानेसे म्लानमुख, दुःखी, लज्जासे नीची गरदन करके सभामें बैठे हुए राजाओंसे प्रार्थना की- ॥ १६१-१६३ ॥ कृपा करके मेरी कन्याके विवाहका उत्सव समाप्त करके ही आपलोग अपने-अपने नगरोंको जाइयेगा ॥ १६४ ॥ तब वे राजे विचार करने लगे कि यदि रामको युद्धमें जीतना ही हो तो भी इस कुसमयमें हमलोगोंको विजय लाभ नहीं होगा । क्योंकि हमलोग कुमुहूर्तमें आये हैं। अतएव अभी यहाँसे चुपचाप अपने-अपने स्थानोंको जाकर फिर किसी अच्छे मुहूर्तमें दलबलके सहित आयेंगे। उस समय रामको रणभूमिमें घायलकर और विजय प्राप्त करके हम सब कृतकृत्य होंगे तथा अपमानजनित हृदयगत दुःखको शान्त करेंगे। इसलिए इस समय राजा जनकसे वैर करना अच्छा नहीं है। सीताके विवाहको करवाकर ही चलेंगे। ऐसा विचार करके सब राजाओंने राजा जनकसे 'बहुत अच्छा' ऐसा कहा ॥ १६५-१७० ॥ इधर राजा जनकने सहर्ष रघुत्तम