श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in context३४० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
वेद्याः कार्या ह्यसमग्रग्यो वस्त्रैर्नानाथ मंतपाः भूषणीया ह्ययोध्यायाश्चत्वराः सदसस्तथा ॥८३॥
अन्यच्चापि यथायोग्यं यद्यज्जानासि लक्ष्मणः । तत्कुरुष्व त्वया नैव मया तत्र रघूत्तम ॥८४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा च लक्ष्मणः । तथा चकार तत्सर्वं यथा रामेण शिक्षितः ॥८५॥
ततो मुहूर्ते श्रीरामः स्नानमभ्यङ्गपूर्वकम् । कृत्वा कुमारैर्देव्या च पुत्रैश्चैव वधूभिः ॥८६॥
नानालंकारवस्त्राणि परिधायाथ तैः सह । पुण्याहवचनं चक्रे गुरुं पूज्य ऋषींस्तरान् ॥८७॥
नांदीश्राद्धादिकं कृत्वा प्रतिष्ठां देवतास्य च । चकार मङ्गलैस्तूर्यैर्नादैः सीतासमन्वितः ॥८८॥
ततो ययुः कोटिशस्ते पार्थिवाश्च मुनीश्वराः । यमद्रोपांतस्त्स्याश्च यच्छोभाः सराङ्गनाः ॥८९॥
तैः साऽयोध्या तदा व्योम्ना विरेजे नितरां यदा । ततो महूतेदिवसे वसिष्ठो ब्राह्मणैर्युतः ॥९०॥
रामस्याथ कुशस्याथ मध्ये धृत्वा वरं पटम् । उवाच मन्त्रान्तेऽथ सुस्वरैर्मधुरक्षरैः ॥९१॥
ध्यान्ता श्रीगणनायकं विधिसुतां शंभुं विधिं माधव
लक्ष्मीं शैलसुतां विधेस्तु दयितामिन्द्रं सुरैस्नान् ग्रहान् ।
पुण्यान्स्थावरनिम्नगाश्च मुमुनीन्भूमीपां कुलस्यांबिकां
तात मातग्मादरेण वटवे भूयात्सदा मङ्गलम् ॥९२॥
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव नागबलं चन्द्रबलं तदेव ।
विद्याबलं दैवबलं तदेव सीताफ्तेर्यत्स्मरणं विधेयम् ॥९३॥
इति नानामंगलवाद्यैस्तूर्यघोषैर्मनोहरैः । ॐकारघोषैः स गुरुर्मुमोचांतःपटं तदा ॥९४॥
ततस्तं राघवस्याङ्के निवेश्य हवनादिकम् । विधिं कृत्वाय कौपीनं दण्डं चाथ कमण्डलुम् । ९५॥
बबन्धौदी रुक्मजां मौञ्जीं बबन्धेणाजिनं तदा । ततः कुशाय स गुरुर्गायत्रीमुपदिश्यरात् ॥९६॥
ब्रह्मचर्यव्रतादीनि स कुशायापदिश्यवान् । कुव्वोक्तावोघेता श्वीच कुर्यादाचमनं तथा ॥९७॥
लगवाओ और जगह-जगहपर ध्वजा आरोपित करो। सुवर्णकी वेदियाँ बनवायी जावें ॥ ८२ । ८३ ॥ इनके
सिवाय भी जो-जो बात तुम्ह मालूम हो और मैंने न बतलायी हो, उन्हें भी ठीक कर देना ॥ ८४ ॥ इस प्रकार
रामकी बात सुनकर 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर लक्ष्मण चल गये और रामने जैसा बतलाया था, वह सब
प्रबन्ध कर दिया ॥ ८५ ॥ जिस दिन मुहूर्त था, उस रोज उबटन लगाकर उन कुमारों तथा सीता और
भाइयोंके साथ रामने स्नान किया। नाना प्रकारके वस्त्र-अलंकारोको पहन । ब्राह्मण तथा निमन्त्रणमें
आय हुए ऋषियोंका पूजन करके पुण्याहवाचन नान्दीश्राद्ध, देवताओंकी स्थापना आदि कार्य गृहकी
और नगाडेके मङ्गलमय निनादके साथ राम तथा सीताने सम्पादित किय ॥ ८६-८८ ॥ इसके बाद सातों
द्वीपोंके करोड़ों राजे तथा ऋषि अपने-अपने परिवार एवं वाहनाके साथ वहाँ आ पहुंच। उन लोगोसे सारी
अयोध्या भरकर बड़ी सुन्दर मालूम पड़ने लगी। पञ्चोपवीत मुहूर्तके अवसरपर बहुतसे ब्राह्मणोके साथ
बसिष्ठजी राम ओर कुशके मध्यमे एक सुन्दर कपड़ेका पर्दा बाँधकर मांड़े तथा स्पष्ट स्वरमें मङ्गलपाठ
करने लगे ॥ ८६-६१ ॥ उन मङ्गलमय श्लोकोंका अर्थ इस प्रकार है-गणेश, सरस्वती, शिव, ब्रह्मा, विष्णु,
लक्ष्मी, पार्वती, ब्रह्माणी, इन्द्र, समस्त देवता, सम्पूर्ण ग्रह, पवित्र पर्वत तथा नदियाँ, अच्छे-अच्छे ऋषि, अपनी
कुलदेवी तथा माता पिता इन सबको प्रणाम करके आपलोग प्रार्थना करें कि जिस बच्चेका यज्ञोपवीत संस्कार
होनेवाला है, उसका कल्याण हो ॥ ९२ ॥ वही लग्न लग्न है, वही दिन दिन है, वही विद्याबल तथा दैवबल
है, जिसमें सीतापति रामचन्द्रका स्मरण किया जाय। ९३ । इस तरह विविध प्रकारके मङ्गलमय मन्त्रोंका
पाठ करके गुरु वसिष्ठने ॐकार शब्दके साथ पर्दा डाल दिया। तदनन्तर वसिष्ठने लव-कुशको रामकी गोदमें
बिठाकर हवनादि विधियोंको सम्पन्न किया । इसके अनंतर कुशका मुञ्जक तागस बनी करधनी पहनायी,
मृगचर्म बाँधा और कौपीन पहनायी । फिर उस ब्रह्मयज्ञ कराके वसिष्ठजीने कुशको गायत्री मन्त्रका उपदेश
दिया । ६४-९६ ।। फिर ब्रह्मचर्यव्रतके नियम आदि बतलाते हुए कहने लगे कि शास्त्रोम जो नियम बतलाये