Skip to content
SarvaKosh
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished811 pages

Page 331 of 811

Read in context
Page 331

सर्गः ५ ] अरण्यकाण्डम् ११५


गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम् रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ॥३६॥
अशेष तिष्ठ दूरे त्वं रोगास्तिष्ठतु दूरतः । शरीरात् मदाऽस्माकं हृदि रामो धनुर्धरः ॥३७॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३८॥
राम राम तव पादपङ्कजं चिंतयामि भवबन्धमुक्तये ।
वंदितं सुरनरैर्मौलिभिर्ध्यापितं मनसि योगिभिः सदा ॥३९॥
रामं लक्ष्मणपूर्वं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तिमूर्ति वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ।
एतानि रामनामानि प्रातःरुत्थाय यः पठेत् , अपुत्रो लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् ॥४१॥
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुनान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥४२॥
श्रीरामनामामृतमन्त्रराजसंजीवनी चेन्मनसि प्रविष्टा ।
हालाहलं वा प्रलयानल वा मृत्योर्मुखं वा विशतां प्रविष्टा ॥४३॥
श्रीशब्दपूर्वं जयशब्दमध्यं जयद्वयेनापि पुनः प्रयुक्तम् ।
त्रिःसप्तकृत्वो रघुनाथनाम जपंस्त्रिहन्त्याद्द्विजकोटिहत्या ॥४४॥
एतद्गिरीजै प्रोक्ता रामरक्षा मया तव । मयोपदिष्टा या स्वाप्न्येविश्वामित्राय वै पुरा ॥४५॥

श्रीरामदास उवाच
इति शिवेनोपदिष्टां श्रुत्वा देवीं गिरीन्द्रजा । रामरक्षां पठित्वा सा स्कन्द समभिमन्त्रयत् ॥४६॥


वन्दना करता हूँ ॥ ३५ ॥ जिन्होने समुद्रको गोके खुरभर जलवाला बनाया, राक्षसोंको मच्छड़ोंके समान नष्ट किया और जो रामायणरूप महामालाके पुखरत्न हैं, ऐसे पवनकुमार हनुमान्जीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥३६॥ हे पापोंके समूह ! तुम हमसे दूर रहो और हे रोगाण ! तुम हमारे पासस भाग जाओ क्योंकि हमारे हृदयमें धनुर्धारी रामचन्द्रजी बैठे हुए हैं ॥ ३७ ॥ मनके सदृश जिनकी गति है, वायुके सदृश जिनका वेग है, जिन्होने इन्द्रियोंको वशमें कर लिया है जा बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ है ऐसे वायुके पुत्र, वानरी सेनाके सेनापति और श्रीरामचन्द्रजीके दूत हनुमान्की मै शरणमें हूँ ॥३८॥ हे राम ! हे राम ! सांसारिक बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिए सुर-नर इत्यादि सकल मस्तक से पूजित आपके चरणोंका मैं सदा ध्यान करता हूँ। क्योंकि योगी लोग भी सदा सर्वदा उन चरणोंके चित्तरूप ध्यान रखते हैं ॥ ३९ ॥ लक्ष्मणके ज्येष्ठ भ्राता, रघुकुलमे श्रेष्ठ, सीताके पति, परमरूपवान्, ककुत्स्थके वंशज, करुणाके वारिनिधि, गुण के निधि, ब्राह्मणोंके प्रिय, धर्मके तत्त्वज्ञ, राजाओंके राजा, सत्यप्रतिज्ञ दशरथके पुत्र श्यामरूप, शांतिके मूर्त्तिस्वरूप, संहारक आनन्ददाता, रघुकंशके तिलक-स्वरूप, रघुकुलश्रेष्ठ एवं रावणके शत्रु रामचन्द्रजीको मै प्रणाम करता हूँ ॥ ४० ॥ जो प्राणी सबेरे उठकर इन नामोंका पाठ करता है, वह यदि अपुत्र हो तो उसे पुत्र मिलता है और धनकी इच्छा रखनेवाला हो तो धन मिलता है ॥ ४१ ॥ राम ही मेरे पिता हैं, राम ही माता हैं, वे ही मेरे स्वामी और सखा हैं। दयालु श्रीराम-चन्द्रजी ही मेरे सर्वस्व हैं। उन्हें छोड़कर मै और किसीको नहीं जानता — किसीको नहीं जानता ॥ ४२ ॥ जिसके हृदयमें रामनामामृतमन्त्ररूपी संजीवनी विद्यमान रहत है, वह हलाहल, प्रलयानन्द अथवा मृत्युके मुखमें भी क्यों न कूद जाय, उसको कहीं भी भय नहीं है ॥ ४३ ॥ पहले श्रीशब्द, बादमे रामनाम फिर जय शब्द, फिर रामनाम, फिर दो बार जयशब्द जोड़कर, अर्थात् श्रीराम जय राम जय जय राम ) इक्कीस बार जप करनेवाला प्राणी करोड़ों ब्रह्महत्याओं जैसे महान् पातकोंको भी नष्ट कर देता है ॥ ४४ ॥ हे पार्वती ! मैंने तुम्हें यह रामरक्षामन्त्र बतलाया है, जिसे एक बार स्वप्नमे मैंने महर्षि विश्वामित्रको बतलाया था । श्रीराम-दासने कहा— इस प्रकार शिवजीके बतलाये हुए रामरक्षामन्त्रको सुनकर पार्वतीजीने स्वामिकार्तिकेयका उन्हीं