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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

Page 33 of 811

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Page 33

सर्गः ३ ] सारकाण्डम् १७

मुक्कारत्नपुष्पमालान्यस्तमप्यतिशोभितम् । न्यस्तहारं न्यस्तवस्त्रं बद्धपीताम्बगन्वितम् ॥ १०४॥
दिव्यमुद्राङ्गुलिलसत्कङ्कणप्रभङ्करम् । एवं दृष्ट्वा स्त्रियो रामं सभासद्मविराजितम् ॥१०५॥
न्यस्तकोदण्डतूणीरं शिवचापाभिमुखम् । प्रार्थयामासुस्ताः सर्वा ऊर्ध्वास्या ऊर्ध्वसत्कराः ॥१०६॥
पश्यन्त्यो गगने शंभुं मोहान्नारायणं विधिम् । साक्षान्नारायणं शर्म न ज्ञात्वा ताश्च वै स्त्रियः ॥१०७॥
हे शंभो हे रमाकान्त हे विधेऽस्मत्पुराहृतैः । व्रतदानादिपुण्यैश्च चापं सज्जीकरोत्वयम् ॥१०८॥
युष्माभिर्नः सुकृतैश्च कर्तव्यं पुष्पवल्लघुः । अद्यास्य कण्ठदेशेऽत्र मालां सीता दधात्वियम् ॥१०९॥
नो भवत्वद्य नेत्राणां साफल्यं दर्शनेनहि । सीतया रामचंद्रस्य वेदिकायां स्थितस्य हि ॥११०॥
एतस्मिन्नन्तरे सीता रामं दृष्ट्वा सभागणे । दिव्यप्रासादसंरूढा सखीभिः परिवेष्टिता ॥१११॥
प्रोन्चलत्लासनाद्वेगादानन्दस्वेदसंप्लुता ।
सख्यास्तुलस्याः कण्ठे स्त्री दोर्लतां क्षिप्य सादरम् ॥११२॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं रत्नालंकारमण्डिता । किंपणोऽत्र कृतः पित्रा मम शत्रुरूपिणा ॥११३॥
क्व रामः सुकुमाराङ्गः क्वेवेदं चापं नगोपमम् । हा विधे किं कृतोपद्य कियत्स्यंतर्गतं तव ॥११४॥
रामादिनान्यं पुरुषं मनसाऽहं न रोचये । यदि तातो बलादन्यं मां दास्यति तदा ह्यहम् ॥११५॥
त्यजामि जीवितं त्वद्य प्रासादात्पतनादिना । हे शम्भो हे विधे दुर्गे हे सावित्रि सरस्वति ॥११६॥
हे गायत्रि रवरे मान्नो मघवन्पम वोयप । हे कुवेरानल रमे हे विष्णो खगनायक ॥११७॥
हे फणीन्द्र निशानाथ हे सर्वे निर्जरादयः । युष्माकं प्रार्थयाम्यद्य प्रसार्य करपल्लवम् ॥११८॥
सर्वै रेतन्महच्चापं करणीयं तु पुष्पवत् । प्रवेशनीर्थं युष्माभिः श्रीरामभुजदण्डयोः ॥११९॥
धनुर्भङ्गं यन्मगपि मुनिवृत्त्याऽनुवर्तिनी । विशामि रने चाहं धनुः सज्जं करोत्वयम् ॥१२०॥


पन्ना, लाल, पुखराज, मुक्ता तथा हरे-नीले अनेक रत्नका पुष्पमालाओंसे मनोहर, पीताम्बर आदि सुन्दर वस्त्रोंको पहिन हुए, शङ्ख चक्र गदा पद्म आदि शुभ चिह्नोंसे चिह्नित करकमलवाले, सभामण्डपके बीच खड़े, दोनों कन्धोंपर धनुष और तूणीरको बाँधे तथा शिवधनुषके सामने मुख किये हुए रामको देख-कर उन्हें साक्षात् नारायण न समझती हुई वे महिलाय आकाशमे स्थित शिव, विष्णु और ब्रह्माको देख उनसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगीं-॥ १०४-१०७ ॥ हे शंभो ! हे रमाकान्त ! हे ब्रह्मन् हमारे पूर्वोपाजित व्रत-दानजन्य पुण्योंसे यह बालक धनुष चढ़ानेमे समर्थ हो । १०८। आप लोग हमारे पुण्यप्रतापसे इस धनुषको फूलके समान हल्का बना दें। जिससे हमारी सीता आज इनके गलेमे वरमाला डाले ॥ १०९ ॥ हमलोग सीतासहित रामचन्द्रका विदाहकी वेदीपर बैठे देखकर अपने नेत्रोंको सफल करें ॥ ११० ॥ उसी समय बच्ची हवा अलङ्कारोंसे सुशोभित सखियोंके साथ दिव्य भवनकी छतपर बैठी हुई सीता रामको सभाके बीच खड़े देख आनन्दके स्वेदसे परिप्लुत होकर शीघ्र आसनसे उठ खडी हुई । अपनी प्रिय सखी तुलसीके गलेमे हाथ डाल तथा तनिक अगाडी बढ़कर आदरपूर्वक यह मधुर वाक्य बोलीं-शत्रुस्वरूप मेरे पिताने यह कैसो प्रतिज्ञा की है ? कहाँ ये कमल अङ्गवाले बालक राम और कहाँ यह पर्वतके समान भारी तथा कठिन धनुष । यह इनमें कैसे चढ़ सकेगा ? हा ईश्वर ! तुमने यह क्या किया और क्या करनेका विचार है ? चाहे जो हो, मै रामको छोडकर दूसरे किसीको नहीं वरूँगी । यदि मेरे पिता मुझे दूसरे किसीको देंगे तो मै महाश्वरसे गिरकर अथवा विष आदिके द्वारा शीघ्र प्राण त्याग दूंगी। हे शम्भो ! हे विधे ! हे दुर्गे ! हे सरस्वतो ! हे सावित्री ! हे रवरे ! हे सूर्य ! हे इन्द्र ! हे जलपति वरुण ! हे कुबेर ! हे अग्ने ! हे रमे ! हे विष्णो ! हे गरुड ! हे फणीन्द्र ! हे चन्द्र ! हे समस्त देवताओं ! मै आंचल फैलाकर प्रार्थना करतो हूँ कि आप सब इस धनुषको फूलके समान हल्का बना दें और रामचन्द्रके भुजदण्डमें प्रवेश करके उन्हें बल प्रदान करें । जिससे राम धनुष चढ़ानेमें समर्थ हों और मुनिवृत्ति धारण करके रामकी