Skip to content
SarvaKosh
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished811 pages

Page 326 of 811

Read in context
Page 326

२१० आनन्दरामायणे [सर्ग ४

अकृष्टपक्तताञ्चकार स्वर्णलाङ्गलैः। यस्याश्रमस्य सान्निध्ये भागीरथ्यप्युदङ्मुखा ॥४७॥
रुक्ममय्याऽथ जानक्या यज्ञारम्भं चकार सः। अज्ञातसंख्यां द्रष्टुं वै चकार स्वर्णनिर्मिताम् ॥४८॥
वामांगस्थां शुभरूपां शान्तहृद्यञ्च सात्त्विकीम्। विभ्रन्देवैः श्रीरामो जानकीं लोकमातरम् ॥४९॥
यज्ञान्ते स्वर्णजां सीतां ददौ स्वगुरवे प्रभुः। एवं यज्ञशतैश्चत्र गुरवे शतमूर्तयः ॥५०॥
याः समर्पिता रामेण तासां दानफलेन हि षोडशस्त्रीसहस्रेभ्योऽप्यूर्ध्वं स्त्रीणां शत पुनः ॥५१॥
द्वारकायां कृष्णरूपो विग्रहेनोद्वहिष्यति । प्रतियज्ञं श्यामकर्णमश्वं रामो मुमोच ह ॥५२॥
चतुर्दिनाच्चतुर्दिक्षु परिक्रम्य ययौ हयः। एवं सर्वेषु यज्ञेषु वयौ वाजी पृथग्जवात् ॥५३॥
पुष्पकस्थः स शत्रुघ्नो हयरक्षां चकार वै। एवं सदा यजराजे विरेजे दीक्षया विभुः ॥५४॥
एवं च नवतिसंख्या रामेण नर वै कृताः। सप्तमस्यापि प्रारभ्य रामो यज्ञस्य सोऽकरोत् ॥५५॥
गंगाया दक्षिणे तीरे मुद्गलस्याश्रमोऽस्ति हि तत्र नद्यान्तिके गंगोदक्तीरे च तद्गृह् ॥५६॥
दिनानि दश वाल्मीकिर्निशायां सन्ध्ययोरपि । भोगमङ्गल्या चक्रे बालकस्र्याभिमंत्रणम् ॥५७॥
कुशं नाम तदा चक्रे मुनिरेकादशे दिने चकार सर्वसंस्कारान् मुनिः श्रीराघवाज्ञया ॥५८॥
एवं स बालकस्तत्र ववृधे मातृलालितः जनकश्च सुमेधा च नानावस्त्रैः सुभोजनैः ॥५९॥
तोषयामास दौहित्रं नानाश्चाश्चन्नखादिभिः । बालोऽपि रंजयामास स्वक्रीडा भर्विदेहजाम् ॥६०॥
एकदा निद्रितं प्रेखे दृष्ट्वा बालं मुनेः पुरः अन्यकर्मणि व्यग्रा साऽथ सीताऽस्मातम् ॥६१॥
जनक वापि सा सीता दृष्ट्वा मत्रीं बहिर्गतान्। आश्विने रविवारे च नदीं स्नातुं समुद्यता ॥६२॥
मुनिं तं बालरक्षार्थं कृत्वाऽथ तमसां ययौ । दृष्ट्वा मार्गेण गच्छन्ती ददर्श पथि वानरीम् ॥६३॥
कटिसंस्थमथस्कंधेषु बिभ्रतीं पञ्च बालकान् तां दृष्ट्वा स्वशिगुं स्मृत्वाऽचितयज्जानकी हृदि ॥६४॥


ठहराया गया। प्रयागस लेकर मुद्गल मुनिके आश्रमपर्यन्त जितना स्थान था, वह सुवर्णके हलसे जोता गया। जानकी उस यज्ञशालाके पास न गई थीं। उक्त उनका और बढ़ रहा था । ॥४१-४७॥ इसके अनन्तर अपने सुवर्णमयी सीताके साथ यज्ञकार्य प्रारम्भ किया वह सुवर्णकी सीता अज्ञानी लोगोंको देखनेके लिए रखी गयी थी, किन्तु अज्ञानियोंका दृष्टिम तासीवको जानकी सदा रामके वामभागम निवास करती थी ॥४८-४९॥ प्रत्येक यज्ञके समाप्त हो जानेपर राम वह स्वणमयी सीता अपने गुरु वसिष्ठको दान दे दिया करते थे। इस प्रकार प्रत्येक यज्ञकी पूर्णतापर स्वर्णमयी सीता दानकरके मत सीताओका दान किया। उस दानके फलस्वरूप आगे कृष्णावतारम उनका मान्दुह हजार एक सो नियटी मिली। प्रत्येक यज्ञम राम अपना श्यामकर्ण घोड़ा दिग्विजयके लिए छोड़त थ। वह चार दिनों में चारों ओर घूमकर लौट आया करता था। साथमे शत्रुघ्न पुष्पक विमानपर बैठकर घाड़की रक्षाके लिए जाया करते थे और रामचन्द्रजी दीक्षा लेकर यज्ञशालामें बैठे रहते थे ॥ ५०-५४ । इस प्रकार रामचन्द्रजीने निन्यानवे यज्ञ पूर्ण किया और अन्तिम सोवां यज्ञ का प्रारम्भ कर दिया । ५५ ॥ गंगाक दक्षिण तटपर मुद्गल नामक एक ऋषिका आश्रम था और उत्तरवाहिनी गंगाके तटपर ही बाल्मीकि सन्ध्या के समय रामके पुत्र कुशका रामरक्षामन्त्रस अभिषेक कर रहे थे ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ ग्यारहवें दिन वाल्मीकिन बालकका नामकरण करके रामके आज्ञानुसार सब सस्कार किया ॥ ५८ ॥ बच्चा भी बड़े लाड़-प्यारक साथ समय बिताता हुआ बढ़ने लगा । जनक और सुमेधा अनेक प्रकारके सुन्दर वस्त्रों और स्वादुअन्न आदि तरह तरहके बहुमूल्यवान् आहुत करत रहत थे । बच्चा अपन कौतुक से जानकीजीको प्रसन्न किया करता था । एक दिन कुश वाल्मीकिक पास पालनेपर सो गया । सखियां अन्य कामम व्यस्त थीं । सीताके माता-पिता कहीं घूमन चल गये थ । उस रोज आश्विन मासके रविवारका दिन था। इसलिए सीताने नदाम स्नान करनकी इच्छा की । सीताने वाल्मीकिजीसे बच्चेको दखने रहनेके लिए कह दिया और स्वयं एक दासीको साथ लेकर तमसाकी ओर चल पड़ी । रास्ते में सीतान देखी कि एक वानरी अपने पाच बच्चोंको कमर-कन्धे और मस्तकपर बैठाये चली जा रही है। उसे