श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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जन्यकाण्डम्
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कौटिल्यबुद्धिं कैकेय्याः समग्रं वेद्म्यहं प्रिये । इत्युक्त्वा राघवः सीतामालिङ्ग्याग्रे चुचुम्ब सः ॥५९॥
प्रीत्या हेमपर्यङ्के भुक्त्वा भोगाननुत्तमान् । विनोदार्थं रघुपतिः प्राह रात्री विदेहजाम् ॥६०॥
स्त्रीणां माने सगर्भाणां वाञ्छितं वाञ्छते मनः । का ते वाञ्छा वदस्व त्वं तं ते दास्यामि निश्चितम् ॥६१।
इति रामवचः श्रुत्वा भाविकार्येण गर्भिणी । सा प्राह राघवं राम गङ्गास्तीरस्थितान्बहून् ॥६२।
मुनीनामाश्रमांश्चापि ऋषिपत्नीश्च तद्गतान् । वाञ्छते मे मनो द्रष्टुं शीघ्रं प्रेषय तत्र माम् ॥६३।
इति सीतावतः श्रुत्वा तथास्त्विति रघूत्तमः । प्राह प्राप्ते दिने लक्ष्मणः श्वा नेष्यति त्वां ममाज्ञया ॥६४।
पुनः प्राह रघुश्रेष्ठः सीते ने क्रीडनादिभिः । जपश्चादिकं सर्वं विस्मृतं तन्मया पुरा ॥६५।
तत्कुरुष्वार्य्यपुत्रा माते गतायां त्वयि काननम् । इत्युक्त्वा जनकीं रामः सुष्टं सुप्ताए मंचके ॥६६॥
सीताऽपि चिंतयामास यत्र माता पिता मम । किं मां न्यूनं हि तत्रास्ति किंचिद्वस्त्रादिकं महत् ॥६७।
नाहनेष्या मय्यनूणीं सख्या दास्या समन्विता । लक्ष्मणेन रथे स्थित्वा गन्ध्यामि मुदिता सुखम् ॥६८।
इति निश्चिम्य सा रात्री सुप्त सुष्टुए मंचके । अथ प्रभाते मात्याय स्नाता स्नानं रघूत्तमम् ॥६९॥
पक्वान्नादानि सन्द्रात्रे पर्य्यवेपदनुत्तमम् उपहारे कृते भर्त्रा स्वय कुन्चोपहारकम् ।.७०।
पृष्टोर्मिलादिकाः स्त्रीश्च ततः श्वश्रूः प्रणम्य च । गङ्गातीरस्थितान् दृष्ट्वा मुनीन्द्रष्टुं समुद्यता ॥७१।
ताः पप्रच्छ यनीयुक्ता दास्या मम्भार लक्ष्मणम् । ततोऽसौ लक्ष्मणो भ्रात्रा चोदितम्त्वां ययौ जवात् ७२॥
दाश्या सख्या तुलस्याद्य सीता कृत्वा स्थित्वाऽथाम् गयौ दक्षिणमार्गेण वायुवेगात्त्व जाह्नवीम् ॥७३॥
इन्द्राय्रा निर्जगत्वक्रः सीतामन्वाये पत्त्रिकथाम् । उल्लङ्घ्य तमसां पुण्यां गोमतीं जाह्नवीमपि ॥७४॥
यमुनां तां महापुण्यां तथा मंदाकिनीं नदीम् द्वितीयां तमसां पुण्यां समुल्लङ्घ्य स लक्ष्मणः ।७५।
बाद उन्होंने वह वृत्तान्त बतलाया, जो मध्यान तथा कैकेयीके भवनमें हुआ था। सीताने कहा कि माता कैकेयीके बहुतसे में केवल रामका पेटका अङ्ग बनाया था। बाकी अङ्गा अपना इतनाम गयाका सारा शरीर बना दिया। इस तरह सीताके वचन सुनकर रामने कहा प्रिये ! मैं कैकेयीकी कुटिलताको भली-भाँति जानता हूँ। इतना कहकर रामने सीताको अपना हृदयसे लगा लिया और बड़े दम्पक उनका मुँह चूमते रहे। फिर विनोद करते करते रात्री बिट गयी। थोड़ी देर बाद रामने सीतासे कहा—प्रिये ! मैं जहाँतक जानता हूँ, गर्भिणी स्त्रियों चित्तमें कई न कई चाह रहती है। तुम्हारी भी किसी वस्तुकी इच्छा है? यदि हो तो बतलाओ, मैं अवश्य दूँगा ॥५९-६१॥ इस प्रकार रामके बोल सुनकर भाविभावश सीताने गङ्गातटनिवासी ऋषियोंके आश्रमों और मुनीकी सन्ध्या देखनेकी इच्छा प्रकट की और कहा कि मुझे शीघ्र वहाँ भेज दीजिये। राम सीताका प्रति स्वीकार करके कहा कि—प्रातः काल ही लक्ष्मण तुम्हें गङ्गातटपर ले जायेंगे। थोड़ी देर बाद फिर बोले—सीते बहुत दिनसे तुम्हारे साथ भोग-विलासमें मैं इतना लीन हो गया कि जप, तप, ध्यान, धारणा आदि सब कुछ भूल गया था। यदि तुम कुछ दिनके लिए वहाँ चली जाओगी तो मैं कुछ भजन-ध्यान करूँगा। इस प्रकार बातें करके राम सो गये । सीता भी अपने मनमें सोचने लगीं कि जहाँपर मेरे पिता माता आदि परिवारके सब लोग विद्यमान हैं वहीं किस वस्तुकी न्यूनता हो ही नहीं सकती। अब मैं साथ कुछ न ले जाऊँगी ॥६२-६७॥ अब केवल रित ही मैंम नहीं चलना दूँगी, बल्कि अपनी सखियो दासियों और तुलसाके साथ ईसें; सुखी उनकी अवश्य जाऊँगी । यह निश्चय करके सीता जी आनन्दपूर्वक सो गयी ॥६८॥६९॥ सबेरे होकर उठकर स्नान किय और भोजन बनाया। उधर रामने भी स्नान कर लिया और भोजन करने बैठे । सीताने बड़े प्रेमसे सम्हारकर उन्हें भोजन कराया । तदनन्तर आप भोजन किया । ७०॥ फिर उर्मिला आदि बहन से पूछकर सासजीको प्रणाम किया और गङ्गातट के बनाय रहनेवाले मुनियोंको देखनेके लिए जानेको तैयार हो गयीं । ७१॥ उन्होंने रथ लानेके लिए लक्ष्मणजीको बुलाया। रामचंद्रके आज्ञानुसार लक्ष्मण शीघ्र रथ लेकर आ पहुंचे ॥७२। सीता अपनी सखियो, दासियो तथा तुलसावृक्षके साथ रथमें बैठीं और लक्ष्मणने दक्षिण मार्गमें गङ्गातटकी ओर पवनवेगके समान रथको चलाया ॥७३॥७४।