श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 317 of 811
Read in contextसर्गः २ ] जन्मकाण्डम् ३०१
एवं मनोहरं गेहं सीताथं जनकोऽकरोत् । श्रीः साक्षाद्..तमुद्युक्ता यस्मिन्वसितुं चिरम् ॥५२॥
किं दुर्लभं हि तत्रास्ति वर्णनीयं मयाऽथ किम् । यस्या नेत्रकटाक्षेण शक्रादीनां विभूतयः ॥५३॥
वाल्मीकये सर्ववृत्तं जनकोऽपि न्यवेदयत् । मुनिधाप्यतिमंतुष्टो मेने स्वसपसः फलम् ॥५४॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे द्वितीयः सर्गः । २ ।
तृतीयः सर्गः
( राम द्वारा सीताका त्याग )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामं तु कौसल्याऽब्रवीद्रहसि संस्थिता । सीतां सीमोल्लङ्घनार्थं शीघ्रं प्रेषय राघव ॥१॥
तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा सत्रिस्तरात् । सलक्ष्मणां निजांपत्नीं प्राह सम्मन्त्रिनं पुरः ॥२॥
वाल्मीकेराश्रमं सीतात्यागादि च सकारणम् । अथ मासेऽष्टमे प्राप्ते राधो राजीवलोचनः ॥३॥
एकान्ते जनकीं प्राह रीजयन्ता लक्ष्मणेन हि । कम्पयित्वा मिषा देवि रजकोक्तं त्वदश्रयम् ॥४॥
त्यजामि त्वां वने लोकवादाद्भीता इवापरः । त्रिमान्मार्ध्वञ्चमासाद्वाः सम् मामामुयुदाद्भिः ॥५॥
अन्तर्वत्नी न गच्छेति शास्त्राज्ञां रजकच्छलात् । त्वां त्यक्त्वा पालयिष्यामि निकटे वस्तुमक्षमाः ॥६॥
त्वां दृष्ट्वा संवदन्त्यां कामो मेन्मान बाधते । त्वद्वियागस्तु निर्बन्ध्वानिना मन्त्र कथं भवेत् ॥७॥
तस्मात्कृताऽयं निर्ग्रन्थः सत्यं विद्धि मनोरथं । पञ्चवर्षानन्तरण पुनरागत्य मण्डलेऽकम् ॥८॥
लोकानां प्रत्ययार्थं त्वं शपथं हि करिष्यसि । भूमेर्धिवरमार्गेण स्थित्वा मिहायसोपरि ॥९॥
वह आश्रम शब्दरायमान हो रहा था। यत्र तत्र मोतियोंका झालरवाली चाँदनियाँ टॅगी हुई थीं और बहुत-सी तसवीर भी जहाँ-तहाँ टॅगी थीं ॥ ५१ ॥ जनकजी ने सीताके लिए इस प्रकारका सुन्दर भवन बनाकर तैयार करवाया। यदि ऐसा दिव्य भवन सीताजीके वास्ते बन गया तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। जहां निवास करनेके निमित्त साक्षात् लक्ष्माजी जन्मवाला हा, वहाँ कौन वस्तु दुर्लभ हो सकती है। जिसके कटाक्षमात्रसे इन्द्रादि देवनाओंकी भा सम्पत्तियां बनतानबगटता है। उसके विषयमें मैं कहाँ तक वर्णन करूंगा। जनकजीने महर्षि बाल्मीकिको भी वह सब बात बतला दी, जिसे सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए और सीताके उस भावी आगमनको उन्हान अपनी तपस्याका फल समझा ॥ ५२-५४ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयात्मजविरचित ज्योत्स्ना भाषाटीकासमन्वित जन्मकाण्ड द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
श्रीरामदासने कहा—एक दिन एकान्तमे कौसल्याने रामसे कहा कि अब समय हो गया है। शीघ्र सीताको अपनी सीमासे कहीं अलग भेज दो। माताकी बातको रामने स्वीकार किया और वह भी बतलाया, जिसका निर्णय बहुत दिनों पहले कर चुके थे ॥ १ ॥ २ ॥ फिर यह भी कहा कि मेरा इस समय सीताका त्याग करना उचित है। कुछ दिन बाद आठवाँ महीना लगनेपर रामने सीताको एकान्तमें बुलाकर समझाते हुए कहा—देवि ! उस दिन एक धोबीने तुम्हारे विषयमें बड़ा कुत्सित आलोचना की थी उसीके बहाने मैं तुम्हें कुछ दिनोंके लिए वनमें छोड़ दूंगा। इससे दुनिया समझेगी कि मैं लोकापवादसे बहुत डरता हूँ। दूसरी एक बात यह है कि गर्भसे तीसरे, पाँचवे अथवा सातवे महीनेमें स्त्रीका सङ्ग नहीं करना चाहिए। यह शास्त्रोंकी आज्ञा है। इसलिए उस धोबीकी बातके व्याजसे तुम्हें दूर रखकर मैं शास्त्रकी आज्ञाका पालन करूंगा और पास रहनेमें यह न हो सकेगा कि मैं तुमसे न बोलूँ ॥ ३-६ ॥ क्योंकि तुमको देखनेसे मुझे काम सताने लगता है। तुम्हारा वियोग भी बिना किसी बहानेके नहीं हो सकता था। इसलिए मैंने ऐसा प्रबन्ध किया है और इस समय मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसे अक्षरशः सत्य समझो। पाँच वर्षके बीतते ही तुम फिर यहाँ आओगी और संसारको दिखानेके लिए तुम्हें शपथ लेनी होगी ॥ ७ ॥ ८ ॥ ९ ॥